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मां ऐसी ही होती है....

8 वर्ष पहले
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जिगर के टुकड़े के लिए..
एक मां अपने जिगर के टुकड़े की सलामती के लिए क्या कुछ कर सकती है, इसकी मिसाल हैं चेन युरांग। चीन के हुबेई प्रांत की चेन ने बेटे को प्राणघातक लिवर रोग से उबारने के लिए अपने लिवर का एक टुकड़ा देने का फ़ैसला किया। लिवर एक छोटे हिस्से से अपनी पूरी रचना कर लेता है। लेकिन डॉक्टरों ने बताया कि ख़ुद चेन के लिवर की हालत अच्छी नहीं है और उसे काटा जाता है, तो उनकी जान को भी ख़तरा हो सकता है। तब 51 वर्षीय चेन ने जतन शुरू किए। उन्होंने खानपान में तमाम परहेज किए और रोजाना दस किलोमीटर दौड़ना शुरू किया। उन्होंने क़रीब दस माह तक इस कठोर दिनचर्या का पालन किया। आख़िरकार, चौदह घंटे के ऑपरेशन के दौरान उनके लिवर का एक हिस्सा काटकर उनके बेटे के शरीर में लगाया गया।
जब कवच बन गई मां...
जापान की बात है। वहां आए विनाशकारी भूकंप के बाद बचाव का काम चल रहा था। एक जगह बचाव दल को दरार के बीच से एक महिला दिखी। वह महिला प्रार्थना की मुद्रा में घुटनों के बल थी। जब दल के मुखिया ने हाथ बढ़ाकर उसे छुआ, तो उसका शरीर पूरी तरह ठंडा था। जीवन का कोई लक्षण नहीं था। बचाव दल आगे बढ़ गया। कुछ देर बाद पता नहीं मुखिया को क्या लगा, वह अपने
साथियों को लेकर वहां लौट आया। दल ने धीरे-धीरे मलबा हटाया। जब उस महिला के शव को हटाया गया, तो उसके नीचे कंबल में कुछ लिपटा हुआ था। यह तीन-चार महीने का बच्च था। साफ़ था कि जब भूकंप आया, तो मां ही बच्चे का कवच बन गई थी। मां ने
अपनी जान दे दी, पर बच्च बच गया। यह घटना चीन की भी बताई जाती है।
सब्र और साथ से चमत्कार...
किसी मां की तपस्या का इससे अच्छा फल नहीं हो सकता। अमेरिका की एंजिली वैलिस ने कोमा में चले गए अपने पुत्र के जागने का 19 साल तक इंतजार किया। और जब बेटे की चेतना लौटी, तो उसने पहला शब्द कहा 'मॉम'। 1984 में एक दुर्घटना के बाद हैरी कोमा में चला गया था। उसका इलाज चलता रहा, लेकिन चेतना लौटने की उम्मीद कम ही थी। बहरहाल, मां के दिल का यक़ीन कभी कम नहीं हुआ। बेटा रिहैबिलिटेनश सेंटर में डॉक्टर और नर्सों की देखरेख में था, लेकिन मां उसे हर सप्ताहांत, त्योहार के मौक़ों पर सबके बीच ले जाती थीं। उन्होंने कभी नहीं सोचा कि दुर्घटना के बाद बेटे में जरा भी बदलाव आया है। डॉक्टरों का कहना है कि हैरी यदि कोमा से लौट पाया, तो इसकी एक अहम वजह मां का सकारात्मक व्यवहार है।