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मैं मैच्योर हो रही हूं।

7 वर्ष पहले
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"आशिकी-2’ और "एक विलेन’ से श्रद्धा कपूर ने कामयाबी का सुख हासिल कर लिया है। अब उनकी तमन्ना है कि ऐसी भूमिकाएं करें, जिनसे बतौर अभिनेत्री पहचान बने। "हैदर’ को लेकर उन्हें बहुत उम्मीदें हैं।
एक मुलाकात में हमने उनसे पूछे चंद सवाल।
विशाल भारद्वाज के निर्देशन में काम करने का अनुभव कैसा रहा? "हैदर’ को लेकर कितनी उत्साहित हैं?
-बहुत ज्यादा! हर कलाकार की एक "विशलिस्ट’ होती है कि वह किन निर्देशकों और कलाकारों के साथ काम करना चाहता है। मेरी सूची में विशाल सर का नाम बहुत ऊपर है। मैं खुशनसीब हूं कि इतनी जल्दी तमन्ना पूरी हो गई। "हैदर’ एक अनूठी फिल्म है और इसमें काम करके बेहद खुश, रोमांचित और उम्मीदों से भर गई हूं। मुझे यकीन है कि "हैदर’ देखने के बाद लोग कहेंगे- श्रद्धा अब मेच्योर हो रही है और मैं भी ऐसा ही महसूस कर रही हूं।
फिल्म के संवादों में कश्मीरी ज़बान का खूब इस्तेमाल किया गया है, जबकि आप तो मुंबई में पली-बढ़ी हैं। ऐसे में कोई दिक्कत तो नहीं हुई?
- हां, यह बात सही है कि मेरी पढ़ाई-लिखाई और परवरिश मुंबई में हुई है। उर्दू तो दूर, कई बार हिंदी बोलने में भी कठिनाई होती है, लेकिन खुशकिस्मती ही कहेंगे कि "हैदर’ के संवाद बोलने में ज्यादा परेशानी नहीं हुई। विशाल सर ने सलाह दी थी कि शूटिंग शुरू होने से कुछ दिन पहले ही कश्मीर आ जाओ। वहां लोगों के बातचीत करने के तरीके पर गौर करो और ये समझो कि वे कोई शब्द किस तरीके से बोलते हैं। मैंने ऐसा ही किया और फिर स्क्रिप्ट राइटर बशारत पीर से उच्चारण की बारीकियां भी समझीं। सेट पर विशाल सर लैंग्वेज को बहुत महत्व देते हैं। हम कभी, कोई शब्द गलत तरीके से बोल भी देते तो वे शूटिंग रोककर समझाते कि इस शब्द को वैसे नहीं, बल्कि ऐसे बोलो। ऐसा करना जरूरी भी था, क्योंकि हम अपने कैरेक्टर्स के जरिए कश्मीर को रिप्रेजेंट कर रहे हैं। अगर ज़बान ही गलत होगी तो फिल्म का असर नहीं पड़ेगा।
कश्मीर की खूबसूरती की मिसाल सारी दुनिया देती है। आपको कैसा लगा धरती का ये स्वर्ग?
- मैं "हैदर’ की शूटिंग में हिस्सा लेने के लिए ही पहली बार कश्मीर गई। वहां पहुंचते ही एकदम चुप हो गई। कुछ कह ही नहीं सकी। जैसे किसी ने जादू कर दिया हो। मैं "स्पीचलेस’ थी। कुदरत इतनी खूबसूरत है कि आप उसे बयान नहीं कर सकते। मेरे लिए कश्मीर जाना इसलिए भी अनूठा रहा, क्योंकि मैं शूटिंग करने के लिए पहुंची थी। चूंकि मुझे इस प्रोजेक्ट से बहुत लगाव है, इसलिए यात्रा का और अनूठा हो जाना स्वाभाविक था। जब मैं वहां से लौटकर मुंबई आई तो कई दिनों तक आंखों के सामने बार-बार कश्मीर की छवि कौंधती रही। लग रहा है, जैसे मेरे अंदर कुछ बदल गया है। वह बदलाव क्या है, पिनप्वाइंट करके तो नहीं बता सकती, लेकिन कुछ तो है, जो नया है।
कहीं, ये कुदरत से इश्क तो नहीं?
-शायद! पर इस एहसास को मैं कोई नाम नहीं देना चाहती। गर्व है, क्योंकि कश्मीर हमारे देश का एक हिस्सा है, जो इतना खूबसूरत है। मैं चाहती हूं कि वहां फिल्मों की शूटिंग का सिलसिला और तेज हो, ताकि कश्मीरवासियों की ज़िंदगी में बेहतरी आए और हमारी फिल्मों का कैनवॉस और खूबसूरत हो सके।
कश्मीर के बाशिंदों से मिलकर कैसा लगा? खानपान की क्या खासियत है?
- कश्मीरी बहुत प्यारे हैं। उनमें कोई बनावट नहीं है। वे बेहद सरल हैं, सहज हैं। हमने वहां का लोकल फूड जीभर कर खााया। हमने पहाकसाग खाया, बाकरखानी का लुत्फ लिया, कहवा पिया। कश्मीरी खाना खाकर तो मैं पागल ही हो गई। वहां का खाना बेहद लजीज़ है।