एक समय ‘टीआईई’ यानी थिएटर इन एज्युकेशन से जुड़े मुकेश छाबड़ा आज मुंबई में बतौर फिल्म कास्टिंग-डायरेक्टर एक बड़ा नाम हैं। हाल में उन्होंने विले पार्ले स्थित ‘साठ्ये कॉलेज’ के प्रेक्षागृह में अपना पहला रंगमंचीय महोत्सव ‘खिड़कियां’ आयोजित किया। उनसे विशेष बातचीत :
दि ल्ली में काफी सालों तक थिएटर किया है तो अपनी जड़ों की तरफ लौटने की कोशिश है हमारा यह फेस्टिवल ‘खिड़कियां’। साल 2006 में मुंबई आया था, तब यहां जमने के लिए संघर्ष कर रहा था तो थिएटर कुछ समय के लिए बंद हो गया था।
‘खिड़कियां’ के दर्शक
फेस्टिवल में आए दर्शकों को ऑब्जर्व किया तो पाया कि वे थिएटर से जुड़ने की चाह रखने वाले लोग थे। उनमें अभिनेता, लेखक, निर्देशक और सहायक निर्देशक सभी शामिल थे। कुछ दर्शक अखबार और फेसबुक में पढ़कर नाटक देखने आए थे। कुछ संगीत-प्रेमी थे, जो स्वानंद किरकिरे, कुमुद मिश्रा और मानव कौल को सुनने आए थे।
कॉरपोरेट का सहयोग
एक अखबार ने फ्री में फेस्टिवल का प्रचार किया। आर्थिक मदद किसी ने नहीं की और उसकी जरूरत भी नहीं पड़ी। जरूरत पड़ती तो हम यह फेस्टिवल करते ही नहीं। थिएटर के लिए आर्थिक मदद की जरूरत पड़ जाए तो समझिए कि आपका दिल सही जगह पर नहीं है। इसका रिटर्न मुझे यही मिला कि कई लोगों ने मिलकर रंगमंच को कामयाब बनाया।
पिता का थिएट्रीकली जुड़ाव
मेरी पैदाइश दिल्ली की है, पर हम जालंधर के मास्टर तारा सिंह नगर के रहने वाले हैं। दादी का करीबी होने के कारण मेरा बचपन वहीं गुजरा है। अब मुंबई में बस गया हूं, पर मामा-चाचा के पास जालंधर जाता रहता हूं। मेरे पिता ताराचंद छाबड़ा बचपन में ही मुझे थिएटर के करीब ले आए थे। शौमी मुखर्जी और पूनम साहनी के साथ नाटकों के चयन से लेकर उनके प्रदर्शन तक में पिताजी ने हर व्यव्स्था पर पूरा ध्यान दिया।
रंगमंच पर यौनोत्तेजकता
थिएटर को मसालेदार नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि यह विषयाधारित होता है, जिसमें संवेदना केंद्रित दृश्य प्रस्तुत किए जाते हैं। चरित्र की हद में कलाकारों के यौनोत्तेजक दृश्य पहले से होते रहे हैं। कल्की कोचलिन के प्ले ‘कलर ब्लाइंड’ में भी ऐसा एक दृश्य है, जिसमें उनके स्तन को पकड़ा गया है। स्वानंद किरकिरे-सलोनी लूथरा अभिनीत नाटक ‘ब्लैक बर्ड’ में लिप-टु-लिप किस सीन है, पर रंगकर्मी क्षणभर में अपने कथ्य पर लौट आते हैं। उसे अतिरंजित नहीं किया गया है।
थिएटर इन एज्युकेशन
थिएटर और एज्युकेशन का संबंध आज काफी आगे बढ़ा हैै। थिएटर के मनोरंजक माइंडसेट में शिक्षा पाना आसान हो जाता है। ‘टीआइई’ का यही विचार है कि एजुकेशन को हव्वा मत बनाओ। इस डर से बच्चा भागता है। टीआइई में बच्चों को थिएटर के जरिए एजुकेशन दी जाती है। ‘टीआइई’ के उत्सवों- ‘बाल संगम’ और ‘जश्न-ए-बचपन’ के अनुभवों के कारण आज मुझमें ‘खिड़कियां’ करने की हिम्मत है। अब मैं बाल-फेस्टिवल करने का विचार कर रहा हूं, जिसकी सीख मुझे ‘टीआइई’ से मिली है। मैं बाल रंगमंच के पक्ष में हमेशा से रहा हूं। जो बच्चे भविष्य में थिएटर या अभिनय जगत से नहीं जुड़ना चाहते, उन्हें थिएटर से जुड़ना चाहिए। थिएटर व्यक्तित्व विकास में सहायक होता है।
संघर्ष की ताकत है थिएटर...
मैं यह भी चाहता हूं कि जो एक्टर कुछ समय के लिए खाली रहते हैं या फिलहाल संघर्ष करते हुए खाली हैं, उन्हें अवश्य रंगमंच करना चाहिए। मुंबई जैसे शहर में संघर्ष करने की लंबी अवधि में आदमी बहुत घबरा जाता है। थिएटर से जुड़ाव उस घबराहट से निजात पाने का एक कारगर तरीका हो सकता है। मानसिक तौर पर दिमाग व्यस्त रहता है तो आप खुश रहते हैं। थिएटर करने और देखने से एक व्यक्ति के तौर पर आपका विकास होता है। अन्य महत्वाकांक्षाओं से इतर यह व्यक्तित्व-विकास बहुत जरूरी है।