देश 65वां गणतंत्र दिवस मना रहा है। एक लंबा सफर हमने तय किया। तरक्की के नए सोपान गढ़े। देश बदला, समाज और लोग भी। बदलाव तो अनवरत प्रक्रिया है। दुनिया पर छाई जबर्दस्त मंदी ने बदलाव एक्सप्रेस को झटके तो दिए, लेकिन बढ़ना जारी है। हमारी अर्थव्यवस्था ने अब भी विश्वास को बरकरार रखा है। आइए देखते हैं कितना बदल गया हमारा देश..
अर्थव्यवस्था में कभी उछाल, कभी सुस्ती
महज तीन-चार साल पहले जो अर्थव्यवस्था 7.5 की दर से बढ़ रही थी, वो अब घटकर पांच फीसदी रह गई है। हालांकि ये नहीं भूलना चाहिए कि पूरी दुनिया इन दिनों कुछ ऐसी ही स्थितियों का सामना कर रही है। हकीकत ये भी है कि भारत की अर्थव्यवस्था में दुनिया का विश्वास बरकरार है। भारत के वित्त मंत्री पी. चिदंबरम कहते हैं कि भारत अभी भी दुनिया की तेजी से बढ़ती हुई दूसरी अर्थव्यवस्था है। चिंताजनक पहलू मुद्रास्फीति पर नियंत्रण नहीं हो पाना है। अर्नस्ट एंड यंग की हालिया रिपोर्ट कहती है कि इस साल देश में नौकरियों की बहार फिर लौट आएगी और सबसे ज्यादा नौकरियां भारत में ही सृजित होंगी।
शहरों का हो रहा फैलाव
पिछले दो-तीन वर्षो में रियल एस्टेट सेक्टर में आई मंदी के बावजूद शहरों की सीमाएं बढ़ी हैं। बड़े मेट्रो शहर ही नहीं, बल्कि छोटे शहरों में भी फ्लैट संस्कृति तेजी से पैर पसारती दिख रही है। बदलाव के संकेत 2011 की जनगणना से और भी स्पष्ट रूप से उभरे हैं। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अमिताभ कुंडू के अध्ययन के अनुसार पिछली सदी में शहरी बस्तियों और उपनगरों की संख्या में काफी इजाफा हुआ। हालांकि दुखद पहलू है कि देश की कृषि-भूमि घट रही है, खेतीहर जमीनों का रिहायशी उपयोग होने लगा है। छोटे शहरों का बेहद तेजी से विस्तार हो रहा है और अधिकांश बड़े शहरों के किनारे मीलों तक छोटी-बड़ी रिहायश बेतरतीब तरीके से फैल रही हैं।
बदल रहे हैं गांव भी
देश की करीब 72 फीसदी यानी 80 करोड़ से ऊपर की आबादी लगभग 6,38,000 गांवों में रहती हैं। अगले एक-दो दशकों में भारतीय अर्थव्यवस्था को असली उछाल यहीं से मिलना है। सर्वे बताते हैं गांवों में कंज्यूमर सामानों, फर्नीचर, इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस, मोबाइल प्रति घर का खर्च 2011-12 में बढ़ा है। क्रेडिट स्यूज प्वाइंट आउट के सर्वे के मुताबिक अगर वर्ष 2004-05 में गांवों में खाने पर व्यय कुल आय का 55 फीसदी होता था तो वर्ष 2011-12 में ये घटकर 48.6 फीसदी रह गया। कंज्यूमर कंपनियां गांवों में नेटवर्क बढ़ाने में तेजी से निवेश कर रही हैं, जबकि बैंक वहां अभूतपूर्व विस्तार के लिए योजनाएं बना रहे हैं, लेकिन नकारात्मक पक्ष ये है कि करीब दो हजार किसान रोज किसानी छोड़कर नए पेशे से जुड़ रहे हैं।
इंटरनेट में दुनिया में नंबर तीन
90 के दशक की शुरुआत में इंटरनेट बेहद सीमित और बेहद महंगा था। बीस वर्षो बाद आज इंटरनेट इस्तेमाल में हम दुनिया में यूएसए और चीन के बाद तीसरे नंबर पर हैं। देश में जरूरी कंज्यूमर सेवाएं नेट पर उपलब्ध हैं — रेल रिजर्वेशन से लेकर बैंकिंग तक। खाने-पीने के ऑर्डर से लेकर बहुत कुछ बस एक क्लिक पर हाजिर है। ट्राई के मुताबिक 31 मार्च, 2013 तक देश में लगभग 16.47 करोड़ लोगों को इंटरनेट कनेक्शन दिया गया था, जिनमें मोबाइल व टेबलेट के जरिए होने वाली सर्फिग का आंकड़ा करीब 14 फीसदी है। यही हाल रहा तो जल्द ही हम इंटरनेट इस्तेमाल करने में इतने आगे होंगे कि हमारी संख्या यूएसए से भी अधिक होगी।
घरों में आया बदलाव
70 के दशक में घरों में आमतौर पर लकड़ी के चूल्हे थे। 80 के दशक में एलपीजी गैस चूल्हों ने यह जगह ली। तब टेलीफोन महज बेहद धनी घरों तक सीमित थे। मनोरंजन के नाम पर रेडियो पर आकाशवाणी की गुनगुनाहट थी। ज्यादा मन हुआ तो कभी-कभार सिनेमाघरों में फिल्में देख ली जाती थीं। 70 के दशक में टीवी सेट भी दूर की कौड़ी थे। समय बीतते-बीतते आज घरों में सब कुछ सजा मिलता है — टीवी, डीटीएच, फ्रिज, सोफासेट, माइक्रोवेव ऑवन, कम्प्यूटर और स्कूटर या कार। क्या अब बिना इनके हिंदुस्तानी मध्यवर्गीय ज़िन्दगी की कल्पना भी की जा सकती है? आज तो मोबाइल ने घरों में टेलीफोन को भी रिप्लेश कर दिया है।
मुट्ठी में समाई दुनिया
देश की लगभग 100 करोड़ आबादी मोबाइल का इस्तेमाल करती है। पिछले करीब डेढ़ दशकों में भारत में मोबाइल फोन ने बहुत लंबा सफर तय किया है। मोबाइल के प्रचुर उपयोग ने समाज और बाजार दोनों को फिर से परिभाषित किया है। वह देश के बदलाव का बड़ा वाहक बनकर उभरा है। एक औसत हिंदुस्तानी यूजर दिन में बातचीत के अलावा करीब डेढ़ घंटा अपने मोबाइल पर दूसरी गतिविधियों पर लगाता है। मोबाइल कहीं सामाजिकता का हथियार बन गया है तो कहीं रोजी-रोटी का जरिया। जानकारियों का समंदर बना मोबाइल आज आम भारतीय के दिमाग का बाहरी विस्तार बनता जा रहा है। कई लोग बिना मोबाइल के अब सहज महसूस नहीं कर पाते।
यातायात और आवागमन
90 के दशक के आखिर में बेहतरीन ढंग से राजमार्गो का संजाल बिछना शुरू हुआ। वर्ष 1996 के बाद से ही विमान यात्रा क्रांति-सी हुई। देश में हर साल करीब 5 करोड़ यात्री हवाई मार्ग का उपयोग करते हैं। पिछले बीस वर्षो में मोटरसाइकिल व कारों की बिक्री कई गुना बढ़ चुकी है। अब एक नई संस्कृति महानगरों में आ रही है या आ चुकी है — वो है तेज रफ्तार मेट्रो ट्रेन की। वर्ष 2002 में दिल्ली मेट्रो की शुरुआत हुई। महानगरों को आस-पास के शहरों से जोड़ने के लिए रेपिड ट्रांजिट सिस्टम के अंतर्गत तेज रफ्तार ट्रेनों की व्यवस्था की जा रही है। अब तो देश में 20 लाख से ऊपर की आबादी वाले कई शहर मेट्रो ट्रेन की परियोजना पर काम कर रहे हैं।
रोज लगता है मेला जहां
मॉल कल्चर यानी रोज मॉल्स में सजने वाला मेला। सप्ताहांत में जाइए और भीड़ का आलम देखिए। खरीददारी की आतुरता देखिए। मॉल खान-पान से लेकर फैशन और लाइफ स्टाइल के देशी-विदेशी बड़े ब्रांड्स की नुमाइश करते हैं। बेंगलुरू की एशिपैक कंसल्टेंसी की रिपोर्ट के अनुसार देश में कुल 570 बड़े मॉल हैं, जिसमें 225 तो पिछले 5 वर्षो में ही खुले हैं। एशिपैक की रिपोर्ट बताती है कि देश के 7 प्रमुख महानगरों में ही 190 मॉल हैं। मंदी के बावजूद पिछले एक साल में देश में जोर-शोर से 60 मॉल्स की शुरुआत हुई।
बदला खान-पान और पहनावा
घर से बाहर खान-पान लगातार बढ़ रहा है। भारत में भोजन पर सबसे ज्यादा खर्च 250 अरब डॉलर तक होता है, जबकि फैशन पर खर्च करीब 45 अरब डॉलर है। माना जा रहा है कि भारत का उपभोक्ता बाÊार वर्ष 2015 तक 550 अरब डॉलर तक पहुंच जाएगा। आज विंडो शॉपिंग के साथ ई-शॉपिंग भी काफी लोकप्रिय होती जा रही है।
नहीं रहीं औरतें घर का सामान
देश में तकरीबन 2.42 करोड़ वर्किग विमन हैं, जिसमें 29 लाख अविवाहित हैं। मतलब छोटे और बड़े शहरों की लड़कियां भी करिअॅर बना रही हैं, पैसा कमा रही हैं।
पर परंपरागत मूल्य बने हुए हैं
एक नए सर्वे का कहना है कि भारत में परंपरागत मूल्य आज भी मजबूत हैं। मसलन, यहां 84 प्रतिशत लोग परिवार के साथ वक्त बिताना पसंद करते हैं। यह सर्वे 57 देशों में हुआ, जिनके बीच भारत की इमेज एक परंपराप्रिय देश के तौर पर उभरी। जाहिर है भारतीयता भटकी नहीं है।
बाकी है संघर्ष अभी
देश में अब भी दुनिया की एक-तिहाई गरीब आबादी रहती है। करीब 12 फीसदी लोग बेरोजगारी, कुपोषण और बेहद गरीबी के शिकार हैं। उनकी रोज की कमाई 30 रुपए भी नहीं है। देश की इस स्थिति को बदलना ही होगा। लोकतांत्रिक चेतना का विकास हो और मिल-जुल कर अगर साथ चलें तो एक दिन हम गरीबी, भूख, बेरोजगारी और कुपोषण को पूरी तरह देश से मिटा देंगे। वह दिन दूर नहीं है जब दुनिया के तमाम विकसित देशों में भारत का नाम शान से लिया जाएगा।