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कब तक बोते रहेंगे खेतों में जहर

7 वर्ष पहले
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खेती के व्यासायीकरण से उन तमाम लोगों के हाथ से खेती चली गई है, जो वर्षों से समाज को जहरमुक्त भोजन उपलब्ध करा रहे थे। वर्ष 2014 को संयुक्त राष्ट्र संघ ने पारिवारिक खेती का वर्ष या छोटे किसानों का वर्ष घोषित किया है। अगर रासायनिक पदार्थों से मुक्ति पानी है तो हमें पारिवारिक खेती व छोटी खेती को प्रोत्साहित करना ही होगा।
सरकार ने फर्टिलाइजर बिल में संशोधन करने की इच्छा व्यक्त की है और संसद के शीतकालीन सत्र में पेस्टीसाइड्स मैनेजमेंट बिल 2008 पेश होने वाला है। यह विचार सफल होगा या नहीं यह कहना कठिन है, क्योंकि रासायनिक खाद और कीटनाशक बेचने वाली कंपनियों की लाॅबी बहुत मजबूत है। ऐसे में सरकार में बैठे एक-दो मंत्रियों की सदिच्छा का यह मतलब नहीं है कि संपूर्ण मंत्रिमंडल या संसद इस बात को मान जाएगी। पिछली सरकार में मेरा अनुभव है पूर्व ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने आंदोलनकारियों के सामने इस बात को स्वीकार कर लिया था कि हर आवासहीन व्यक्ति को आवासीय जमीन देनी ही है। उन्होंने यह भी वायदा किया कि इस दिशा में एक प्रभावी कानून छह महीने के अंदर बनाएंगे, लेकिन हम सब जानते है कि उन वायदों का क्या हुआ?
पंजाब में खाद के अति उपयोग के दुष्प्रभावों के बारे में हम निरंतर सुन और पढ़ रहे हैं। धरती और पानी संपूर्ण रूप से बर्बाद होने के बाद मौजूदा समय में वहां हजारों लोग कैंसर व अन्य खतरनाक बीमारियों से पीड़ित हैं। जिस व्यक्ति ने हरित क्रांति का विचार देश के सामने रखा, वह स्वयं पंजाब के हालात को देखकर चिंतित है। हरित क्रांति से पैसा बढ़ा, लालच बढ़ा और जमीन के दाम बढ़े। ताकतवर लोगों ने हर इंच भूमि पर कब्जा कर लिया। अगर हरित क्रांति का परिणाम पंजाब के लोग और प्रकृति भुगत रही है तो वैसी क्रांति को अन्य जगहों पर दोहराने की जरूरत नहीं है। भारत सरकार के मंत्रीजी के सामने यही चुनौती है कि वह देशवासियों को सरकार की पिछली गलतियों से अवगत कराएं और उस रास्ते को बदलने के लिए शिक्षित और प्रेरित करें।
मैं मध्यप्रदेश के खरगोन जिले में किसानों के साथ जुड़कर काम कर रहा हूं, जो नैसर्गिक (आॅर्गेनिक) खेती कर रहे हैं। इन किसानों को नैसर्गिक खेती करने के लिए देसी बीज की जरूरत है। हम सबके तमाम प्रयास के बावजूद कपास के देशी बीज खोजना संभव नहीं हो रहा है, क्योंकि वह बाजार से गायब है। अब हर दुकान में तथाकथित उन्नत बीज बिक रहा है और विज्ञापनों के माध्यम से कई बीज कंपनियां किसानों को अपनी और आकर्षित कर रही हैं। हर दुकान में बड़े-बड़े पोस्टर लगे हुए हैं और बीज का हर पैकेट रंग-बिरंगे कागजों से बना हुआ है। बात इतने से समाप्त नहीं होती, बल्कि हर बीज के साथ विदेशी खाद और रासायनिक पदार्थों का पैकेट किसानों को दिया जा रहा है। अगर भारत की कृषि को जहरमुक्त करना ही है, तो इन विषमताओं को समझना होगा और इन्हें दूर करने के लिए व्यवस्थित कदम उठाना होगा।
अगर कानून में संशोधन करना ही है तो कुछ व्यापक संदर्भ में बात शुरू करते हैं। पहली बात यह है कि संयुक्त राष्ट्र संघ ने आदिवासियों की सुरक्षा और
भू-अधिकार को लेकर कई मसौदे तैयार किए हैं। अगर मसौदों का पालन हो तो विस्थापन के शिकार लाखों आदिवासी फिर छोटे किसान बन सकेंगे। वनाधिकार जैसे भारतीय कानून का भी अब तक ईमानदारी से पालन नहीं हुआ है। सौभाग्यवश वर्ष 2014 को संयुक्त राष्ट्र संघ ने पारिवारिक खेती का वर्ष या छोटे किसानों का वर्ष घोषित किया है। अगर रासायनिक पदार्थों से मुक्ति पानी है तो हमें पारिवारिक खेती व छोटी खेती को प्रोत्साहित करना ही होगा। अगर खेती छोटी हो और पूरा परिवार उससे रोजगार पाता हो तो यह संभव है कि विषमुक्त खेती की ओर हम तेजी से आगे बढ़ सकेंगे।
समस्या का हल संपूर्णता में-
सिर्फ फर्टिलाइजर कानून में बदलाव लाने से समस्या हल नहीं होगी। यह कुल मिलाकर भूमि नीतियों और कृषि नीतियों से जुड़ी हुई बात है। अगर कृषि नीति सिर्फ बड़ों के पक्ष में है तो धीरे-धीरे खेती का औद्योगिकरण होगा। खेती का आकार बड़ा होने से अन्य तमाम विषमताएं स्वाभाविक रूप से उससे जुड़ जाती हैं। जैसे बड़े यंत्रों का आगमन, विदेशी बीज, विदेशी खाद आदि। इस प्रक्रिया में जिनके पास भरपूर पैसा है, वह अधिक जमीन खरीदकर रकबा बढ़ाएंगे और उद्योग की तरह अपने खेत का संचालन करेंगे। सरकार को कृषि और उससे जुड़ी हुई तमाम समस्याओं को एक साथ जोड़कर देखना होगा।
-लेखक वरिष्ठ किसान नेता और एकता परिषद के अध्यक्ष हैं।