18 दिसंबर : विश्व प्रवासी दिवस
रोजी- रोटी के लिए परदेश जाने की परंपरा नई नहीं है, लेकिन वैश्वीकरण के इस दौर में
पलायन के अर्थशास्त्र को आयात-निर्यात की तरह देखा जाने लगा है। एक सर्वेक्षण से पता चला है कि पलायन के इस नए अर्थशास्त्र में भारत सबसे आगे है।
इसे आर्थिक उदारीकरण का फलसफा कहें या दुनिया के बदलते अर्थशास्त्र का तकाजा अब विश्व बैंक नौकरी/ रोजगार को भी आयात-निर्यात की दृष्टि से देखने लगा है। किसी देश की वित्तीय साख के निर्धारण के दौरान अब विश्व बैंक इस बात को भी ध्यान में रखता है कि उक्त मुल्क विदेशों में काम करने वाले अपने कामगारों से सालाना कितना धन प्राप्त करता है। यह वैश्विक अर्थशास्त्र की नई प्रवृत्ति है, लेकिन अतार्
किक नहीं है। उदारीकरण के बाद रोजगार आधारित वैश्विक पलायन जिस तेजी से बढ़ा है, उसने विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोश जैसी संस्थाओं को पुनर्विचार के लिए बाध्य किया है। विदेशी रोजगार के लिए होने वाले पलायन और इससे प्राप्त होने वाले धन के विभिन्न ट्रेंड्स पर प्रसिद्ध अमेरिकी अनुसंधान संस्था "पीईडबल्यू रिसर्च' ने हाल में ही एक अध्ययन किया है, जिसमें कई दिलचस्प तथ्य उभरकर सामने आए हैं। पीईडबल्यू की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 1990 में रोजगार के लिए पलायन करने वालों की कुल वैश्विक संख्या 15 करोड़ 40 लाख थी, जो 2013 में बढ़कर 23 करोड़ 20 लाख हो गई। जहां तक कामकाजी पलायन के आर्थिक आकार की बात है तो वर्ष 2000 में यह करीब 175 अरब अमेरिकी डॉलर था, जो अब बढ़कर 529 अरब अमेरिकी डॉलर हो गया है।
दिलचस्प बात यह कि दोनों ही मामलों में भारत शीर्ष पर है। 1990 में करीब 68 लाख भारतीय रोजी-रोटी के लिए विदेश गए थे और यह संख्या अब एक करोड़ 42 लाख हो गई थी। इस मामले में दूसरा स्थान मैक्सिको और तीसरा स्थान रूस का है। नब्बे के दशक में विदेशों में काम करने वाले भारतीय कितना धन स्वदेश भेजते थे यह आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, लेकिन 2013 में यह रकम सालाना करीब 71 अरब अमेरिकी डॉलर हो गई है, जोकि सर्वाधिक है। कुल 60.2 अरब डॉलर के साथ चीन दूसरे और 26 अरब डॉलर के साथ फिलीपींस तीसरे और 22 अरब डॉलर के साथ मैक्सिको तीसरे स्थान पर है।
जहां तक पलायन करने वालों के पसंदीदा देश की बात है, तो इस मामले में अमेरिका ने सबको पीछे छोड़ दिया है। परंपरागत रूप से कई दशकों तक यूरोपीय देश दुनिया भर के कामगारों के लिए पसंदीदा स्थान होता था। 1990 तक यूरोप की हिस्सेदारी 33 प्रतिशत थी, लेकिन यह घटकर 31 प्रतिशत रह गई है। वहीं पिछले 23 वर्षों में अमेरिका जाने वाले पेशेवरों की संख्या में 200 प्रतिशत का इजाफा हुआ है। 1990 में 2 करोड़ 30 लाख लोग काम की तलाश में अमेरिका जाते थे, अब यह आंकड़ा 4 करोड़ 60 लाख हो गया है।
इस रिपोर्ट में कई सूक्ष्म तत्वों का भी खुलासा हुआ है। जैसे, वैश्वीकारण के व्यापक होने के बावजूद गरीब देश आज भी इन गतिविधियों से काफी दूर हैं। पलायन करने वालों में ज्यादातर लोग तीसरी दुनिया के विकासशील देशों के हैं। एक ओर जहां कुछ विकासशील देशों (मसलन अल्बानिया, जमैका, पोर्टोरिको, कजाकिस्तान) के 25 से 30 फीसदी पेशेवर विदेशों में काम कर रहे हैं, वहीं गरीब और अत्यंत पिछड़े देश के लोग आज भी अपनी सरहदों में सीमित हैं। रोजगार आधारित पलायन के 529 अरब डॉलर के कारोबार में गरीब देशों की हिस्सेदारी महज 6 फीसदी है, जबकि विकासशील देशों की हिस्सेदारी 71 फीसदी और अमीर देशों की हिस्सेदारी 23 फीसदी है।
यह रिपोर्ट कहती है कि पलायन के कारण प्राप्त होने वाले प्रशिक्षित पेशेवरों का सर्वाधिक लाभ विकसित देशों को मिल रहा है। शायद यही कारण है कि पहले जहां उच्च वेतनमान के लिए विकसित देशों के कुशल पेशेवर बड़ी संख्या में विदेश जाते थे, वे अब अपने देशों में ही रहना पसंद करते हैं। आंकड़े बताते हैं कि विकसित देशों के पेशेवरों के पलायन में 1990 के बाद लगातार गिरावट हो रही है। वहीं दूसरी ओर विकासशील देश भारी राशि खर्च कर प्रशिक्षित पेशेवर तो तैयार कर रहे हैं, लेकिन उनकी प्रतिभा का लाभ उठाने में नाकाम हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण भारत है, जिसके पेशेवर नासा,
माइक्रोसॉफ्ट, इंटेल,
गूगल, आईबीएम जैसी कंपनियों के आर्थिक साम्राज्य बढ़ाने में केंद्रीय भूमिका निभा रहे हैं।
आंकड़े बताते हैं कि विकसित देशों के पेशेवरों के पलायन में 1990 के बाद लगातार गिरावट हो रही है। वहीं दूसरी ओर विकासशील देश भारी राशि खर्च कर प्रशिक्षित पेशेवर तो तैयार कर रहे हैं, लेकिन उनकी प्रतिभा का लाभ उठाने में नाकाम है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण भारत है, जिसके पेशेवर नासा,
माइक्रोसॉफ्ट, इंटेल, गूगल, आईबीएम जैसी कंपनियों के आर्थिक साम्राज्य बढ़ाने में केंद्रीय भूमिका निभा रहे हैं।
विदेशों में भारतीयों की भागीदारी
अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी "नासा' में काम करने वाले कुल पेशेवरों में से 36% भारतीय हैं। विज्ञान-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में बड़ा रसूख रखने वाली आईटी कंपनी माइक्रोसॉफ्ट के 28%, आईबीएम के 17% और इंटेल के 13% अभियंता/वैज्ञानिक भारतीय हैं। अमेरिका और यूरोपीय देशों के चिकित्सा क्षेत्र में भी बड़ी संख्या में भारतीय डॉक्टर और स्वास्थ्य पेशेवर काम कर रहे हैं। रिपोर्ट की भूमिका में मुख्य अनुसंधानकर्ता एलन मुरे लिखते हैं- "इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि पिछले दो दशक में रोजगार और अवसर की तलाश की परिभाषा बदल गई है। अब लोग बेहतर करियर के लिए अपने देश तक सीमित नहीं हैं। वे विदेशों में धन कमाकर स्वदेश भेज रहे हैं और यह रकम इतनी बड़ी है कि इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती।' तय है कि आने वाले समय में यह प्रवृत्ति घटेगी नहीं।
1990 में करीब 2 करोड़ 30 लाख लोग काम की तलाश में अमेरिका जाते थे जो अब बढ़कर तकरीबन 4 करोड़ 60 लाख हो गया है।
रोजगार आधारित पलायन के 529 अरब डॉलर के कारोबार में गरीब देशों की हिस्सेदारी महज 6% है, जबकि विकासशील देशों की हिस्सेदारी 71% और अमीर देशों की हिस्सेदारी 23% है।
पीईडब्ल्यू की रिपोर्ट के अनुसार
किस देश से कितना पलायन
भारत- 1.24 करोड़
मौक्सिको- 1.32 करोड़
रूस- 1.08 करोड़
चीन- 0.93 लाख
बांग्लादेश- 0.78 लाख
पाकिस्तान- 0.57लाख
यूक्रेन- 0.56 लाख