स्त्री के अन्दर प्रेम एक ऐसी शक्ति होती है जो शरीर में वरदान की तरह रहती है और बिछोह में भी अपना असर दिखाती रहती है। यह विशुद्ध प्यार के तंतुओं से निर्मित होती है तभी तो किसी भी हुक्मरान से भिड़ने का साहस रखती है। उसके पास आघात झेलने के लिए फूल से भी कोमल हृदय होता है मगर चाहतें फौलादी होती हैं।
धुऋतु की हर आहट उसके मन में छिपे प्रेम को झकझोर जाती है और वह अपने उल्लसित प्यार को दबाने के लिए बाध्य रहती है क्योंकि उसके कानों में कड़े हुक्म की सांकले झंकारती रहती हैं- स्त्री, तुम्हारे लिए प्रेम निषिद्ध है।
निषिद्ध है क्योंकि तुम्हारे जीवन में प्रेम पाप माना गया है। शुद्ध चरित्र पर लांछन का धब्बा। इसमें किन्तु के लिए जगह नहीं क्योंकि यह देवताओं और ऋषि मुिनयों के आसन और आश्रमों से अजस्त्र धारा की तरह बहता हुआ आदेश सामाजिक व्यवस्था में समा गया है। यह भी कि स्त्री किसी इच्छित को पाने के िलए तपस्या तो कर सकती है, प्रेम का प्रावधान नहीं है। नहीं है तो नहीं है क्योंकि इच्छामयी नारी घर परिवार और समाज के िलए घातक होने लगती है, इसलिए ही िनयम बना कि बेटी की रक्षा पिता करेगा और पत्नी को पति सुरक्षा देगा। यहां तक कि माता का रखवाला भी पुत्र ही होगा। औरत को आजाद तबियत छोड़ना खतरे से खाली नहीं। खतरा इज्जतदार घर खानदानों पर मंडराने लगता है।
अत: यहां प्रेम विहीन विवाहों का प्रचलन है क्योंकि प्रेम को लड़की की निजी इच्छा माना जाता है। निजी इच्छा से किसी पुरुष का साथ पकड़ना परिवार को चुनौती देना है। चुनौती कलंक रूप में देखी जाती है। लड़की पिता के कुटुम्ब को कलंकित करने की अपरािधनी के सिवा कुछ नहीं रहती। माना कि लड़कियां इनदिनों अपने आप को प्रेम के हक को हथियाकर खुद को कलंकित करने से बाज नहीं आ रहीं मगर वे भी जानती हैं कि उन्होंने अपने पितृपरिवारों की जड़ों में मट्ठा डाला है। और इस सत्यानाश को पिता, भाई और परिवार ने खून के घूंट की तरह पिया है। क्यों हो जाती हैं ऐसी निर्दयी लड़कियां? सम्भवत: इसलिए कि प्रेम कोई बाहरी लादी हुई भावना नहीं, यह तो स्वत: स्फूर्त चेतना है जो उम्र के किसी भी पड़ाव पर बसंत सी छा जाती है।
नहीं, कंट्रोल, नियंत्रण करना होगा स्त्री को। प्रेम का अधिकार ही नहीं मिला तो प्रेम कैसे करेगी? यह अधिकार केवल पुरुष को है कि वह अपने आकर्षण को ही नहीं, सैक्स तक को अख्तियार करता हुआ खुल्लमखुल्ला परिवार और समाज के सामने आए, जिससे उसकी मर्दांनगी का डंका बजे। उस युग से इस समय तक की यात्रा…
खाप पंचायतों ने लड़कियों पर शिकंजों के नियम निर्धारित करके लागू किए हैं और नियम न मानने पर उनकी बंदिशें बढ़ा दी हैं। शिक्षा से बेदखल किया है, घर की चौखट को नालेबन्दी में जड़ा है, फिर भी लड़की ने उल्लंघन किया है तो मृत्युदंड पारित हुआ है। एक ओर ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का नारा तो दूसरी ओर स्त्री की प्रजनन क्षमता का इम्तिहान। हां बेटी बचाओ चार से दस बच्चे तक पैदा करने के लिए। अपने बेटों की यौनिक भूख को शान्त करने के लिए और मनमौजियों के बलात्कार के लिए।
शिकंजे न रोक पाएंगे
बलात्कार हो सकता है स्त्री के साथ मगर उसके प्रेम पर पहरेदारी रहेगी। वैलेंटाइन डे से बचाया जाएगा। खुले समय के तकनीकी युग में लड़की से
मोबाइल फोन छीन लिया जाएगा क्योंकि यह प्रेम को स्पेस मुहैया कराता है। घूंघट, पर्दे और बुर्के में रहने के लिए मजबूर जींस-टॉप धारण करके सारे पारिवािरक नियमों की धज्जियां उड़ाने लगी हैं, रूल पास किया जाए कि यह ड्रैस िनषेध क्षेत्र में आती है। इज्जत के साथ खेलती है। इधर लड़की है कि इज्जत क्या बला है जो सिर्फ उसके ही सिर थोपी जाती है, जानती ही नहीं। किस कारण से लड़की इज्जत की सूली पर चढ़ाई जाती है, उसे यह इल्म नहीं। प्रेम वह करती नहीं उससे हो जाता है जैसे किसी भी मनुष्य से हो जाता है तो यह अपराध कैसे हुआ कोई उसे समझा दे। कभी कोई नहीं समझा पाया और बिना कारण बताए ही ‘प्रेम मत करो लड़की’ का फरमान जारी कर दिया। बेशक यह बात लड़कियों की समझ में नहीं आती कि उनपर ही कसावट क्यों है?
कसावट? किसी ने कहा यह जाित की और धर्म की बात है। मगर लड़की का तजुर्बा है कि मोहब्बत में जाित कहां दिखती है? और जाति में मोहब्बत भी नजर नहीं आती। यह जज्बा तो जाित और धर्म विहीन होता है।
अब इस नए युग से क्या कहा जाए कि इधर तो मधुऋतु का आगमन, बसंत धरती पर उतर आया और उधर धर्म ने ‘
लव जिहाद’ पूरे दल-बल के साथ लड़कियों के ऊपर लाद दिया। प्यार होता है तो देखकर करो कि प्रेमी हिन्दू है कि नहीं। इतना ध्यान रखा जाएगा तो सजा कम कर दी जाएगी। अगर लड़का मुिस्लम या इसाई हुआ तो लड़की तुम लव जिहाद में फांस ली जाओगी।
उफ् कितने-कितने शिकंजे तैयार कर डाले हैं समाज ने और जो समाज न कर पाया वह राजनीति ने पूरा कर दिया। कितने नारे, वादे, दावे आते हैं जिनके अंदर सिर्फ औरत को मादा की तरह देखने की गोपनीय घोषणा रहती है।