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स्वाइन फ्लू, छोटा रोग बड़ा बाजार

हमारे देश में इंफ्लुएंजा वैक्सीन और उसके टेस्ट का आज तक बाजार नहीं बन पाया है जबकि अमेरिका, ब्रिटेन की जनता इस वैक्सीन का बहुत प्रयोग करती है।

Dainik Bhaskar

Mar 01, 2015, 09:27 AM IST
Rasrang
हमारे देश में इंफ्लुएंजा वैक्सीन और उसके टेस्ट का आज तक बाजार नहीं बन पाया है जबकि अमेरिका, ब्रिटेन की जनता इस वैक्सीन का बहुत प्रयोग करती है। ऑस्ट्रेलिया अपनी जनता को यह वैक्सीन मुफ्त में लगाता है। अंदाजा लगाइए कि अगर 500 रुपए के इस वैक्सीन को लेकर 125 करोड़ की जनसंख्या वाले देश में नीति बन जाती है तो कितना बड़ा बाजार खड़ा हो जाएगा।
हरियाणा के बल्लभगढ़ में हम फ्लू के रिसर्च प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे। उसी दौरान मेरी बेटी इंफ्लुएंजा फ्लू से बीमार हो गई। टीम के डॉक्टर साथियों ने राय दी कि हमलोग सबका सैम्पल ले रहे हैं तो इसका भी ले लेते हैं। मैंने मना किया। एक तो इसमें कोई घबराने वाली बात नहीं थी, दूसरा टेस्ट की लागत भी काफी होती है। फिर भी साथी नहीं माने, उन्होंने जबरदस्ती सैम्पल ले ​लिया। दस-पंद्रह ​दिनों बाद मैंने स्वाइन फ्लू पॉजिटिव की लिस्ट मंगाई। उसमें एक नाम मेरी बेटी का भी था पर वो कब का ठीक हो चुकी थी। इसी तरह से उस इलाके के चालीस हजार से ज्यादा लोगों की लिस्ट हमारे पास है जिनमें से दर्जनों को कभी स्वाइन फ्लू हुआ था लेकिन वह ठीक हो गए, और वो भी बगैर दवा ​के। फिर देश में स्वाइन फ्लू को लेकर हाहाकार क्यों मचा हुआ है? स्वाइन फ्लू को लेकर महामारी जैसी भ्रामक बातें कहां से उछल कर लोगों तक कैसे ​पहुंच रही हैं, आखिर वह कौन सी शक्तियां हैं जो स्वाइन फ्लू की सनसनी के बीच वैक्सीन के बढ़ते बाजार पर ताक लगाए बैठी हैं।
स्वाइन फ्लू एक इंफ्लुएंजा फ्लू का ही नाम है जो एच1एन1 वायरस से होता है। इसी तरह से दो सौ से अधिक प्रकार के इंफ्लुएंजा हैं जो अलग-अलग वायरस से होते हैं। इंफ्लुएंजा और उसके वैक्सीन को लेकर हमारे देश में आज तक न ही कोई रिसर्च हुई और न ही कोई नीति बनी। 2007 में अमेरिका के सेंटर फॉर ​डिजीज कंट्रोल (सीडीसी) ने इस क्षेत्र में शोध के लिए भारत सरकार से संपर्क किया। अभी विचार-विमर्श चल ही रहा था कि 2009 में मैक्सिको से एक नए प्रकार का इंफ्लुएंजा वायरस एच1एन1 सामने आया जो पूरे विश्व में फैल गया जिसका पेन्डेमिक (विश्वव्यापी) नाम "स्वाइन फ्लू' पड़ा। जून 2009 में यह भारत में भी पहुंच गया। इस मौके पर भारत सरकार ने सीडीसी के रिसर्च प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। रिसर्च किसी अस्पताल में कर पाना संभव नहीं था। इसके लिए किसी खास क्षेत्र की जरूरत थी ताकि पूरे भारत का अनुमान लगाया जा सके। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) ने हरियाणा के बल्लभगढ़ के हेल्थ एंड डेमोग्राफिक सर्विलांस सिस्टम (एचडीएसएस) से यह रिसर्च शुरू किया जिसमें 28 गांवों को गोद लिया गया और 40 हजार से ज्यादा लोगों का इंफ्लुएंजा फ्लू पर डाटा इकट्‌ठा किया। यह वही रिसर्च है जिसका मैंने ऊपर जिक्र किया है। रिसर्च अभी एनालिसिस फेज में चल रहा है जिसमें कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं।
हंगामा क्यों है बरपा
23 फरवरी तक मिले आंकड़ों के अनुसार दिसंबर 2014 से अबतक देशभर में 15 हजार से ज्यादा लोग स्वाइन फ्लू से पीड़ित थे और 875 मौतें हो चुकीं थीं। देश में हाहाकार मचा हुआ है, लैब्स में टेस्टिंग के लिए लंबी-लंबी लाइनें लगीं हैं और डॉक्टरों की छुट्‌टी रद्द करके उन्हें अलर्ट पर डाल दिया गया है जैसे कोई इमरजेंसी लग गई हो। इसको महामारी का नाम दिया गया जबकि स्वाइन फ्लू ऐसी बीमारी है ही नहीं। इस बीमारी में मृत्यु प्रतिशत .01 भी नहीं है। जिन लोगों की मृत्यु हुई उनका रिकॉर्ड देखें तो पता चलेगा कि उन्हें पहले से कोेई न कोई बीमारी रही है। उनकी मृत्यु उसी मुख्य बीमारी से हुई लेकिन जब मृत्यु हुई उन्हें स्वाइन फ्लू भी था। किसी भी इंफ्लुएंजा से निमोनिया हो सकता है यहां तक कि टायफाइड से भी निमोनिया हो सकता है जो मौत का कारण बन सकता है इसलिए यह कहना कि यह मौतें स्वाइन फ्लू से हुई हैं, यह बचकाना है।
खौफ बढ़ेगा रुपया झड़ेगा
स्वाइन फ्लू को लेकर जो हंगामा मचाया जा रहा है, मैं उसे ओवर रिएक्शन कहूंगा। 2009 में ब्रिटेन ने भी अपने देश में इसको ओवर रिएक्शन कहा था। हमारे देश में इंफ्लुएंजा वैक्सीन और उसके टेस्ट का आज तक बाजार नहीं बन पाया है जबकि अमेरिका, ब्रिटेन की जनता इस वैक्सीन का बहुत प्रयोग करती है। लैब टेस्ट को अगर देखें तो स्वाइन फ्लू का एक टेस्ट साढ़े चार हजार रुपये में हो रहा है। अब आप खुद ही अंदाजा लगा सकते हैं कि 15 हजार जो पॉजिटिव स्वाइन फ्लू के मरीज आए हैं वह टेस्ट कराके ही आए होंगे। कम ही सरकारी अस्पतालों में इसके टेस्ट की व्यवस्था है। सरकार ने खुद ही गाइडलाइन जारी कर रखी है कि बहुत बुरी स्थिति में ही स्वाइन फ्लू का टेस्ट किया जाए।
सरकार के दिशा निर्देश
स्वाइन फ्लू के मरीजों को ए, बी और सी केटेगरी में बांटा गया है।
ए केटेगरी में वह हैं जिनको हल्का बुखार, गले में दर्द आदि है।
बी केटेगरी में तेज बुखार, गले में दर्द, जुकाम आदि वाले मरीज शामिल हैं।
सी केटेगरी में उन लोगों को रखा जाता है जिनको इन सबके साथ सांस लेने में तकलीफ, सीने में दर्द आदि होता है।
सी केटेगरी में आने वाले लोगों को ही स्वाइन फ्लू जांच का आदेश है ताकि उसी हिसाब से इलाज किया जा सके। ए और बी केटेगरी के मरीजों को आराम और बुखार, खांसी की दवाई देने का निर्देश है।
जहां नहीं है मुनाफा...
अब तक हुई स्वाइन फ्लू की तथाकथित मौतों से ज्यादा एक दिन में एक राज्य में पांच वर्ष से कम आयु के बच्चे डायरिया से मर जाते हैं जिन्हें सिर्फ पांच रुपये का ओआरएस पिलाकर बचाया जा सकता है। लेकिन उस ओआरएस का बाजार नहीं है इसलिए हंगामा नहीं मचाया जाता।
डॉक्टर चाहते हैं रोग हो...
एक बाजार टैमीफ्लू दवाइयों का भी है। इसकी कीमत बहुत अधिक नहीं है लेकिन इसका भी स्टॉक किया जा रहा है। ब्रिटेन ने तो इस दवाई का इतना स्टॉक कर रखा है िजससे इसकी कमी है। हैरत होती है मुझे डॉक्टर साथियों पर जो टैमीफ्लू न होने का रोना रो रहें हैं जबकि सरकारी और डब्ल्यू.एच.ओ की गाइ़डलाइनों में टैमीफ्लू दवा न ही देने की बात कही गई है। स्वाइन फ्लू की मार्केिटंग करके वैक्सीन और दवाइयों की मार्केिटंग की जा रही है।
वैक्सीन के साइड अफेक्ट्स...
मेिडकल दुनिया में साक्ष्य मानी जाने वाली पत्रिका ‘कॉकरेन’ ने माना है िक वैक्सीन सभी वायरसों पर कारगर नहीं होता, यह दो सौ प्रकार के इंफ्लुएंजा में से ए और बी पर काम करता है। ए और बी से 10 प्रतिशत ही संक्रमित होते हैं जबकि एम्स के रिसर्च में यह प्रतिशत 6 ही है। 2009 में िब्रटेन में जब यह वैक्सीन लोगों को दिया गया तो तीस हजार से अधिक लोगों ने अनिद्रा, एकाग्रता की कमी आदि की शिकायतें की। इसी प्रकार से टैमीफ्लू दवाई भी पचास प्रतिशत ही कारगर है।
2009 में मैक्सिको से एक नए प्रकार का इंफ्लुएंजा वायरस एच1एन1 सामने आया जो पूरे विश्व में फैल गया जिसका पेन्डेमिक (विश्वव्यापी) नाम "स्वाइन फ्लू' पड़ा।
(मो. शाहिद से बातचीत पर आधारित।)
( लेखकः मुख्य अन्वेषक, इंफ्लुएंजा फ्लू, एम्स)
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