परवल तो पच्चीस पैसे किलो हो जाती है। गांव वाले सब्ज़ी लाकर कटक में डेढ़ रुपए किलो में बेचते हैं। फागुन-चैत में फूलों की महक, आम और बकुल की सुगन्ध से समुचा जंगल बौरा जाता है।
उस दिन गांव में यात्रा (मेला) हो रही थी। जखरा ऑपेरा पार्टी "कंसासुर-वध' स्वांग
(एक तरह का नाटकीय प्रदर्शन) रच रही थी। भ्रमर और सुलोचना गांव में स्वप्नेश्वर महादेव के मंदिर के प्रांगण में यह स्वांग देख रहे थे। नट भी एक पिक्का सुलगाए हुए यात्रा देख रहा था।
जंगल का कोई ख़ास नाम नहीं। पूरा इलाका ही करमल कहलाता है। फिर भी स्थानीय लोग पास वाले हिस्से को बेरेणा-लता कहते हैं। नटवर फॉरेस्ट-गार्ड बनकर इधर आया है। दो वर्ष में ही यहां अच्छी तरह आसन जमाकर बैठ गया है। जंगल के ठेकेदार के साथ उसकी सुलह है। कुचला का ठेका लिया है, लेकिन बड़े-बड़े साल, पी-साल काटकर ट्रक में भर ले जाते हैं। सुना तो यहां तक जाता है कि नटिया मोटी रकम लेकर उन्हें छोड़ देता है या फिर जाली चालान दे देता है, यह बात रेंजर बाबू से कई बार कही जा चुकी है। कितनी ही रिपोर्ट ऊपर भेजी गई हैं, लेकिन कुछ नहीं होता। लोगों का कहना है कि नटिया की जेब में हैं ऊपर वाले। हालांकि जंगल इसी बीच साफ़ होता जा रहा है। कोई उसका बाल बांका नहीं कर सकता। नटिया रूपास गांव में चाय की दुकान के आगे बेंच पर बैठा चाय पीते-पीते मूंछों पर ताव देता है-"देखेंगे, कौन मेरा क्या बिगाड़ लेगा! इस लट्ठ से खोपड़ा खोल दूंगा।'
उस गांव का डाकिया भ्रमर पर अधिक नाराज़ है। कभी-कभी सोचता है-पीट-पीटकर मार डालूं और लाश लेकर जंगल में फेंक आऊं। किसी को पता भी नहीं चलेगा। थाने में बाबू के साथ उठक-बैठक है उसकी। एक-दो बार बुलाकर थाना-बाबू ने लकड़ी की चोरी के बारे में पूछताछ की है। नटिया की कैफियत से वे संतुष्ट हैं।
भ्रमर ने नटिया के दूर के रिश्ते की मौसी की जाई बहन से ब्याह किया है। सुलोचना को घर लाने की बहुत इच्छा थी। शरधा जीजी, केलू बाबा आदि को बीच में रख दामा पुहाण बाबा को बहुत समझाया। लेकिन उसकी वह लफंगाई आदत, उसके बेढ़ंगे स्वभाव को देखकर मां-बाप या सुलोचना कोई राजी नहीं हुए। फिर भी वह कभी-कभी ठेका या बदले में काम कर लेता है। कोई फॉरेस्ट गार्ड छुट्टी पर जाए तो महीने दो महीने उसकी जगह काम कर लेता है, फिर वही बेकार का बेकार!
नटिया ने उस दिन सुलोचना को पोखर के पास धमकाया था, "देखता हूं, तुझे कौन ब्याहता है? मैं ठिकाने बिठा दूंगा!' आज तक सुलोचना भूली नहीं है वह बात! नटिया की भंगिमा और आवाज़ कभी-कभी याद आ जाती है तो वह घबरा-सी जाती है।
नटिया की मोटी-मोटी बाघ-जैसी मूंछें, उन पर चिपटी नाक और हड़ीले गाल देखकर कोई भी डर जाएगा। बचपन से ही सुलोचना को उससे कोफ्त रही है। फिर उसकी टेढ़ी-मेढ़ी आदत, कड़ा मिजाज़ और उस पर उसका आगे बढ़कर मामलातकार बनने की आदत-शुरू से ही उसके प्रति मन में घृणा भर चुकी है। अब तो लंबे-लंबे बालों और मूंछों की कली के कारण तो एकदम अजीब लगता है।
उस दिन गांव में यात्रा (मेला) हो रही थी। जखरा ऑपेरा पार्टी "कंसासुर-वध' स्वांग (एक तरह का नाटकीय प्रदर्शन) रच रही थी। भ्रमर और सुलोचना गांव में स्वप्नेश्वर महादेव के मंदिर के प्रांगण में यह स्वांग देख रहे थे। नट भी एक पिक्का सुलगाए हुए यात्रा देख रहा था। यात्रा खत्म होने के बाद धक्कम-धक्की करते सब लोग भीड़ में लौट रहे थे, सुलोचना को लगा, बायीं ओर पीछे से किसी ने हाथ बढ़ाया है। कसकर उसे भींचकर भीड़ में कहीं गायब भी हो गया। चीखती-सी उसने भ्रमर को आवाज़ दी। भ्रमर कुछ कदम पीछे छूट गया था। उसने दौड़कर आगे आकर पूछा, "क्या बात है?'
आगे नटिया जा रहा था। उसे दिखाकर इशारा किया। भ्रमर ने जाकर पीछे से नटिया को धर पकड़ा। नटिया बहाना बनाते हुए बोला, "क्या बात है? किसके बदले किसे पकड़ रहे हो?'
दोनों में तू-तू मैं-मैं हो रही थी-कुछ लोग इकठ्ठा हो गए। आखिर बीच-बचाव हुआ। नटिया और भ्रमर दोनों ने एक दूसरे को कहा-"ठीक है, देख लेंगे!'
तब से सारे गांव में यह बात फैल गई कि नटिया और भ्रमर में ठन गई है। जल्द ही कुछ घटेगा।
दो दिन बाद। हाट वाले दिन मदन साहू की दुकान के आगे नटिया ने सबको सुनाकर कहा, "मैं उसका खून पी जाऊंगा।' उधर भ्रमर भी कुछ दूर कांसा-पीतल की दुकान के आगे सना बेहरा को सुनाकर कह उठा, "मैंने उसे खत्म न कर दिया तो मेरा नाम भ्रमर साहू नहीं।'
दिन बीतते गए। लोग धीरे-धीरे नट-भंवरे के झगड़े-झंझट की बात भूल गए। छह-सात महीने निकल गए इसी तरह। एक दिन सुबह-सुबह सुलोचना जंगल की ओर से दौड़ी-दौड़ी हांफती-सी आकर घर में घूसते ही अचेत! भंवरा और कुछ युवक उधर पास खड़े बतिया रहे थे। दौड़ आए, किसी तरह सुलोचना को होश में लाए। पूछा, "बात क्या हुई? "सुलोचना ने बताया, "सांझ तक बछिया जब नहीं आई तो ढूंढने मैं जंगल की ओर गई थी। कोई झुरमुटे से निकल अचानक आ झपटा। खींचा-तानी चली। जान बचाकर किसी तरह भागी गिरती-पड़ती आ गई। बाबरानियां कांटों का बोझ लिए जंगल से लौट रही थीं। उन्होंने भी हल्ला मचाया।
"मगर वह तो अंधेरे में भाग छूटा।'
"कौन था वह?' सबने एक स्वर में पूछा।
"नटभाई!' सुलोचना ने धीरे से कहा।
बस भंवरा के सिर भूत सवार। फरसा लेकर नटिया के घर की ओर तेज़ी से चल पड़ा। साथ ये चार-पांच छोकरे। हाथ में लाठी लिए ये भी लैस। नटिया पिछवाड़े बाड़ी में से होते हुए जंगल में भाग गया। आठ-दस दिन तक गांव में दिखाई ही नहीं पड़ा। इसके बाद जब गांव लौटा तो भंवरा उसकी ताक में रहने लगा।
गांव में काना-फूसी हुई-बस अब दो में से कोई जाएगा। गांव के नाले के पुल पर बैठा पैर हिलाते हुए नट कह रहा था-सबको सुना सुनाकर, "अब की देख लूंगा उसे!' भंवरा भी महादेव मंदिर के आगे सबको सुनाकर कह आया, "उसे जब तक ज़िंदा न जला दिया, चैन से नहीं बैठूंगा।'
गांव में कुछ युवकों में चर्चा चली-देखना है, अब पहले कौन किसे खत्म करता है। भगवान ही जानें।
बरसात शुरू हो गई है। बिजली और बादलों की गड़गड़ाहाट से सारा जंगल कांप उठा। मसाशुणी नदी और गांव में घुटनों तक पानी। उधर जटिया पहाड़ के सिरे से धीरे आकर चारों ओर भर रही है। बांस का बेड़ा बनाकर लोग आवाजाही कर रहे हैं। गांव के बीच में ऊंचे टीले पर दाल, चावल, सब्ज़ी लाकर रसोई पका रहे हैं। लोगों के घरों में पानी भर गया है। हर वर्ष कुछ दिन गांव वालों को यही सब भोगना पड़ता है। गांव में बाढ़ का पानी घुसने पर लगातार छ:-सात दिन इधर-उधर डोंगी से ही जा-आ पाते हैं-यहां तक कि निकट के अड़ोस-पड़ोस में भी। बाढ़ के साथ आती है महामारी, खांसी-सर्दी, बुखार, हैजा। टीले पर छोटा-सा स्वास्थ्य-केन्द्र है। कोई-कोई डोंगी में जाकर वहां से दवादारू से आता है। कोई मर जाए तो "जै गंगा मैया! तेरी शरण..."कह बहा देते हैं। बरसों के बाद परवल, गोभी, टमाटर, बैंगन आदि खूब होते हैं। परवल तो पच्चीस पैसे किलो हो जाती है। गांव वाले सब्ज़ी लाकर कटक में डेढ़ रुपए किलो में बेचते हैं। फागुन-चैत में फूलों की महक, आम और बकुल की सुगन्ध से समुचा जंगल बौरा जाता है।
सारा जंगल ऐसी बरसा-हवा में दुलक रहा है। रात होते ही अंधेरे में पेड़-पौधे कुछ नहीं दिखते। सब मिलकर अंधेरे का अंश बन जाते हैं। जीवन का जैसे निशान भी नहीं रह जाता। कहीं कोई संकेत नहीं रह जाता। जंगल में भी बाढ़ का पानी भर गया है। सांप, गीदड़, सियार, हिरण वगैरह पानी की धार में आकर गांव के किनारे लगते या उस अकूत जल में बह जाते।
वर्षा कुछ थम गई थी। नट एक डोंगी में बैठा जंगल की ओर चल पड़ा। साथ लिए है छाता और लालटेन। आज उसकी चेक-गेट पर ड्यूटी है। गेट के पास की गुमटी में वह खिड़की-दरवाज़ा सब बंद कर बैठ गया है। आंधी-बरसा का मौका देख कॉन्ट्रेक्टर का ट्रक भी जंगल में घुस आया। बड़े-बड़े साल के पेड़ काटेंगे, लादकर भरा ट्रक लेकर लौटेंगे। नट पेड़ की कटाई की आवाज़ सुन रहा है। लेकिन वह कर भी क्या सकता है इस समय? क्रमश: ट्रक आकर चेक-गेट के पास रुका। ऊपर से बांस की रुकावट उठाने के लिए हॉर्न बजाया। नट ने अनसुना कर दिया। अचानक दो-तीन कुली उतर आए ट्रक से। नट को घसीट लाए। चाबी मांगी। मगर नट ने चाबी नहीं दी। कहा, "रात में गेट खोलने की इज़ाज़त नहीं है। रेंजर बाबू ने मना कर रखा है, सवेरे आकर चक्कों की लीक देखेंगे-मेरी नौकरी गोल हो जाएगी। बिना "पास' के मैं गेट नहीं खोल सकता।'
नट की कसकर पिटाई कर दी गई। बेहोश कर गेट तोड़ ट्रक लेकर भाग निकले। तब रात के दो बज रहे थे। आस-पास कोई लोग-बाग नहीं। जंगल सांय-सांय कर रहा था।
सुबह डोंगी में बैठ भंवरा निकला, गांव में डाक बांटने के लिए। फॉरेस्ट रेंजर की डाक अधिक होती है। जाकर चेक-गेट की गुमटी की खिड़की में झांका। देखा, नट बेहोश पड़ा है! दोनों जबड़े खून में सने हैं। मुंह लाल हो गया है। मक्खियां भिनभिना रही हैं।
किवाड़ पर धक्का मारा। नट न हिला न डुला। कुछ उठाया, कुछ घसीटा, फिर डोंगी पर लिटाया। ले चला गांव के स्वास्थ्य-केन्द्र की ओर-गांव के बीच वाले टीले के पास। और फिर डॉक्टर बाबू के जिम्मे सौंपकर चल पड़ा चिठ्ठी बांटने के लिए।
कई घण्टों बाद नट को होश आया। डॉक्टर बाबू से सारी बातें सुनकर उसे कानों पर विश्वास नहीं हुआ। भंवरा का ऋण कैसे उतारूं? पिछली बातें-झगड़ा-फसाद सब भूल गया।
कुछ दिन बाद की बात है। मोहनी साहू ने भंवर से कहा, "नटिया आया था। वह तो बस तेरे ही गुण गा रहा था। बोला-"भंवरा भाई ने मेरी जान बचा ली। जीवन में उसका ऋण कभी नहीं चुका सकूंगा!'
भंवरा का मन खूब नरम हो गया। फिर भी कहीं भेंट हो जाने पर नटिया से बात करने में उसे संकोच होता।
नट भी दिल खोलकर उससे बातचीत नहीं कर पाता। दोनों एक-दूसरे की ओर देखकर अपने-अपने रास्ते चले जाते।
महीने दो महीने बाद नटिया ने सुना-साइकल वाला समेसर कह रहा है, "भंवरा ने तेरे लिए क्या कुछ नहीं किया। भगवान ने इतनी बड़ी विपद से बचा लिया! जाको रखे साइयां, बाल न बांका होय!'
नट सब सुनता रहता। मगर भंवरा को बुलाकर कुछ कह नहीं पाता। भंवरा भी सब सुनता रहता, मगर नट को कुछ नहीं कह पाता। बस, आमने-सामने पड़ते तो दोनों के चेहरे पर ज़रा-सी मुस्कान खिल उठती। ऐसे ही कुछ महीने बीत गए। उस दिन नटिया ने बस्ती में सुना -सुलोचना पेट से है। दो महीने बाद वह मां बन जाएगी!
रेंजर बाबू ने उस दिन हिरन मारा था। नटिया को बुलाकर उसे दो किलो मांस दिया। पता नहीं, उसके सिर में क्या सनक चढ़ी, जाकर भंवरा के दरवाज़े हाजिर! सुलोचना और भंवरा बरामदे में बैठे बतिया रहे थे। नटिया अनायास कह उठा-"भंवरा भैया! सुलू बहन! ये मिरग-मांस तुम रखो। तरकारी बना लेना। मुझे रेंजर बाबू ने दिया है।'
भंवरा और सुलोचना दोनों के होठों पर हल्की-सी मुस्कान बिखर गई-"सारा ही क्यों दे रहे हो?'
नटिया ने ठहाका लगाया, "मेरे क्या काम का? मैं तो मुरारी बाबा के होटल का ग्राहक हूं। मेरे लिए भला कौन पकाएगा?
भंवरा ने कहा, "नाटिया रे! तुम ऐसा करो आज रात हमारे घर खाना खा लेना। न्योता रहा।'
सुलोचना तो लाज में गड़ गई। एक बार नाटिया के चेहरे की ओर देखकर मुंह नीचा कर लिया।
नाटिया ने कहा, "ठीक है। बहिन के घर से न्योता मिला है, कोई कैसे मना करेगा? मगर कहां, बहिन तो कुछ बोलती नहीं।'
सुलोचना तो लाज में सिमिट गई। फिर थोड़ी हंसकर कह उठी- "हां-हां, तू आज हमारे घर खाना खाएगा नट भैया!'
सच्चिदानंद राउतराय
जन्म : 1916, खोर्धा (उड़ीसा)
निधन : अगस्त 2004, कटक