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बेटी बचाओ कहने वाले अचानक बेटी जांचों क्यों कहने लगे?

5 वर्ष पहले
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भ्रूण परीक्षण के पक्ष में केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी द्वारा दिए गए बयान के बाद उनके पक्ष और विपक्ष में दोनों तरफ से आवाजें उठ रही हैं। लेकिन हमें यह समझना बेहद जरूरी है कि भ्रूण परीक्षण का मतलब भ्रूण हत्या भी हो सकता है, जो किसी भी हाल में नहीं होनी चाहिए...
ऊटपटांग बयानों के लिए विवादों में रहने वाली केंद्रीय महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गांधी अबकी बार बहुत गहरे फंसी हैं। गर्भ में ​लिंग निर्धारण जांच को अनिवार्य करने का बयान देना उनके लिए भारी पड़ता ​दिख रहा है। उनके मंत्रालय ने भी "अनिवार्य गर्भ निर्धारण' को उनकी निजी राय कहा है और बताया है कि मंत्रालय ऐसे किसी प्रस्ताव पर विचार नहीं कर रहा है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय जिसे गर्भ निर्धारण के अनिवार्यता का कानून बनाना है, उसके मंत्री जेपी नड्डा ऐसी किसी जानकारी से ही इनकार कर देते हैं। विरोध इतना व्यापक स्तर पर होता है कि खुद मेनका गांधी भी अपने कहे पर कायम रहने की हिम्मत नहीं कर पातीं और यह कह कर बचतीं हैं कि यह बहस का मुद्दा है, कोई प्रस्ताव नहीं था।
रेडियोलॉजिस्ट और अल्ट्रासाउंड मालिकों को छोड़ मंत्री की गर्भ निर्धारण की अनिवार्यता वाली सलाह को खोजे भी एक समर्थन नहीं मिल रहा है। पार्टी, कैबिनेट, पक्ष, विपक्ष, सामाजिक संगठनों, डॉक्टरों से लेकर मीडिया तक में उनके इस बयान पर रोष है। वरिष्ठ स्त्री अधिकार कार्यकर्ता और एपवा की महासचिव कविता कृष्णन कहती हैं, "मेनका गांधी का प्रस्ताव किसी भी तरह से औरतों के पक्ष में नहीं है। उनका बयान मेडिकल कॉरपोरेट लॉबी को लाभ पहंचाने के दबाव में दिया गया है। इतनी स्त्री विरोधी मंत्री को औरतों और बच्चों की रक्षा का मंत्रालय संभालने का न तो कोई नैतिक हक है और न ही ​नीतिगत।'
राष्ट्रीय भारतीय महिला संघ की उषा श्रीवास्तव ने कहा, ‘यह अनुमान लगाना हास्यास्पद होगा कि जो सरकार उचित तरीके से पीसीपीएनडीटी कानून को लागू नहीं करवा सकी है वह करोड़ों गर्भवती महिलाओं की निगरानी क्या कर पाएगी।'
सेंटर फॉर सोशल रिसर्च की निदेशक रंजना कुमारी कहती हैं, "यह विडंबना ही तो है कि एक तरफ प्रधानमंत्री मोदी सरकार बनते ही "बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' की महात्वाकांक्षी योजना शुरू करते हैं। बेटियों की बराबरी के लिए एक के बाद एक योजनाएं बनाते हैं, जबकि मेनका गांधी लड़कियों के भ्रूण की हत्या की सबसे बड़ी वजह ​'लिंग निर्धारण' को अनिवार्य बनाने की वकालत करती हैं।' मेनका के मंत्रालय के ही एक वरिष्ठ अधिकारी नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं, "पता नहीं 'आ बैल मुझे मार' की यह राय उनको किसने दी होगी। ​उनके इस प्रस्ताव का विपक्ष और स्त्री अधिकार कार्यकर्ता ही नहीं विरोध कर रहे, बल्कि सरकार और भाजपा से भी कोई एक व्यक्ति समर्थन को तैयार नहीं है।'
कोई समर्थन में खड़ा भी कैसे हो सकता है? साल दर साल के बोलते आंकड़ों और स्त्री-पुरुष की संख्या में बढ़ती खाई के सच को आखिर कोई कैसे अस्वीकार कर सकता है। खासकर तब जबकि लड़कियों की घटती संख्या का मुख्य कारण भ्रूण में लिंग की जांच और स्त्री भ्रूण होने पर उसकी हत्या है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या समाज इतना जागरूक हो गया है कि लिंग जांच के बाद वह अब मादा भ्रूण हत्या जैसे अपराध नहीं करेगा? जिस समाज में लिंग जांच की पाबंदी के बावजूद मादा भ्रूण का इतना गर्भपात कराया जा रहा है कि लिंगानुपात 943 हो गया है, उस समाज में लिंग जांच की अनिवार्यता के बाद स्त्री भ्रूण हत्या का क्या आलम होगा सहज ही कल्पना की जा सकती है।
हाल ही में जनसंख्या 2011 के आंकड़ों के अनुसार कुछ राज्यों में महिलाओं की संख्या इतनी कम है कि एक स्त्री को कईं पुरुषों से विवाह करना पड़ सकता है। देशभर के राज्यों में महिला-पुरुष अनुपात की सबसे बुरी स्थिति हरियाणा में है। हरियाणा में प्रति हजार पुरुषों पर सिर्फ 879 महिलाएं हैं! इसके बाद जम्मू और कश्मीर में 889 महिलाएं, पंजाब में 895 महिलाएं, उत्तर प्रदेश में 912 और बिहार में 918 महिलाएं प्रति हजार पुरुषों पर हैं।
देश में सबसे बुरे महिला पुरुष अनुपात वाले पांचों राज्य उत्तर भारत से ही हैं। इन राज्यों में शिक्षा का प्रतिशत भी काफी कम है, लेकिन सिर्फ शिक्षा का प्रतिशत कम होना ही स्त्री-पुरुष लिंगानुपात के लिए जिम्मेदार नहीं है। इन राज्यों की सामंती और पितृसत्तात्मक सोच इसके लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार है। आज हरियाणा राज्य में स्थिति यह हो गई है कि लड़कों को विवाह के लिए गांव-शहर में लड़कियां नहीं मिल रही हैं। वहां कई गांव ऐसे हैं जहां 25 से 40 वर्ष के सैकड़ों अविवाहित युवा शादी के इंतजार में दिन ताक रहे हैं। केरल, झारखंड जैसे राज्यों से लड़कियां खरीदकर लाई जा रही हैं विवाह के लिए और वहां उन लड़कियों की हालत बच्चा पैदा करने की मशीन जैसी हाे गई है। इससे साफ जाहिर होता है कि हर स्त्री के साथ पुरूष जोकि हमारे समाज की नींव या संकल्पना है, वह ही गलत हो जाएगी। यहां यह भी समझना जरूरी है कि देशभर में बढ़ती हुई बालात्कार की संख्या को अगर देखा जाए तो इसकी एक मनोवैज्ञानिक वजह यह भी है कि पुरूषों को हक की स्त्री नहीं मिलती और उन्हें अपनी नैसर्गिक भूख मिटाने के लिए बालात्कार का सहारा लेना पड़ता है। भ्रूण परीक्षण को बढ़ावा देने का मतलब है एक प्रकार से महिलाओं की संख्या और कम करना, जिससे बलात्कार को बढ़ावा मिलता है।
आखिर क्यों पलटीं मेनका
पहले यह कहा था : ‘हर एक गर्भवती को निश्चित रूप से जानना चाहिए कि उसके गर्भ में लड़का है या लड़की। यह दर्ज होने के बाद कि गर्भ में लड़का है या लड़की, लड़की का जन्म पूर्व से सही ट्रैक रिकॉर्ड रखा जा सकेगा, उसके पोषण का ज्यादा ध्यान रखा जा सकेगा। लिंग जांच करने वाले डाॅक्टर, सोनोग्राफी टेस्ट करने वाले लोगों को कब तक बेवजह अपराधी बना के गिरफ्तार करते रहेंगे?
अब यह कहा : ‘यह मेरी निजी राय है कि अनिवार्य रूप से गर्भवती महिला को यह बताया जाना चाहिए कि जिस बच्चे को वह जन्म देने जा रही है वह लड़का है या लड़की। मैं केवल एक सुझाव दे रही हूं। इस पर व्यापक विचार विमर्श किया जा सकता है और अभी कोई अंतिम फैसला नहीं है।'
संभवत: इस लिए पलटीं
सरकार ने ही उनको अकेला कर दिया : केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्‌डा ने कहा "यह मेनका गांधी का निजी विचार है। उन्होंने कहा कि फिलहाल न तो इस तरह का कोई सुझाव केंद्र के पास आया है और ना ही अभी तक इस सिलसिले में कोई चर्चा हुई है। यदि ऐसा कोई विषय होता है तो विभाग के साथ बैठक करने के बाद इस पर कैबिनेट फैसला लेती है।'
महिला संगठन का विरोध : महिला संगठन की अध्यक्ष सुभाषिनी अली कहती हैं, "पूरी दुनिया में लिंग जांच बंद करने की हिमायत हो रही है और मंत्री लागू कराना चाहती हैं। महिलाओं ने यह अधिकार लंबी लड़ाई के बाद हासिल किया है। हम उसे यूं ही नहीं गंवा देंगे। इसे लागू करने का मतलब है थोड़े-बहुत हुए सुधार का सफाया जो लिंग जांच पर पाबंदी से देश ने ​हासिल किया है।'
सामाजिक कार्यकर्ता सड़कों पर : साबू जार्ज ने कहा, ‘हम मंत्रियों और प्रशासन से यह सुनिश्चित करने का आह्वान करते हैं कि किसी भी सूरत में पीसीपीएनडीटी अधिनियम कमजोर नहीं होने पाए। मोदी सरकार को बालिकाओं की कीमत पर वाणिज्यिक उद्यमों के हितों का संरक्षण नहीं करना चाहिए।'
डॉक्टरों का समर्थन भी नहीं मिल पाया : शायद मेनिका को लगा हो कि उन्हें रेडियोलॉजिस्ट, अल्ट्रासाउंड मालिकों और डॉक्टरों का समर्थन मिलेगा, लेकिन कुछ एक को छोड़कर मंत्री की गर्भ निर्धारण की अनिवार्यता वाली सलाह को खोजे भी एक समर्थन नहीं मिल रहा है।
कौन जिम्मेदार?
सबसे पहले पति-पत्नी और सास-ससुर का यह दबाव भ्रूण हत्या के लिए जिम्मेदार है बेटी को जन्म नहीं देना है। इसके बाद लिंग परीक्षण करने वाले सोनोग्राफर, गर्भपात करने वाले डाॅक्टर और नर्स इसके लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं। अक्सर सुनने में आता कि है कि माताएं ही बेटियां नहीं पैदा करना चाहतीं, पति तो कुछ नहीं कहते। यह गौर करने लायक है कि आखिर माताएं क्यों बेटी को गर्भ में मारने की बात करती हैं, जबकि जानती हैं कि बेटे को पैदा करने में भी वैसी ही प्रसव पीड़ा होनी है जैसी बेटी को पैदा करने में।
पुराना कानून ही मजबूरी में बना तो नया क्यों?
मेनका गांधी का बयान तो दोनों कानूनों को ही एक सिरे से लक्वाग्रस्त कर देता है। आखिर जिन चीजों से बचने के लिए ये कानून लाये गए, ऐसा क्या हो गया कि आज अचानक से उनकी प्रासंगिकता ही खत्म हो गई? गर्भ में बेटा है या बेटी इसको जानने का हक होना ही नहीं चाहिए। कानून तो मजबूरी में बनाए जाते हैं। पुराने कानून भी मजबूरी में बनाए गए थे, हमें आने वाली संतान को लेकर उत्सुकता होनी चाहिए और खुशहाल जीने का हक होना लेना चाहिए।
अभी तक भारत में दो कानूनों के तहत लिंग चुनाव गैर कानूनी है। मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी एक्ट 1971 के तहत बच्चे का लिंग परी़क्षण कानूनी जुर्म है। जिसके लिए 3 साल की जेल, आर्थिक जुर्माना या दोनों हो सकता है। कानूनों के तहत बच्चे में होने वाली जन्मजात शारीरिक या मानसिक अपंगता या मेटॉबालिक गड़बडि़यों के कारण ही सिर्फ गर्भपात जायज है। वहीं पी.एन.डी.टी एक्ट 1994 के तहत 5 साल की सजा होती है। यह गैर जमानती अपराध है और गिरफ्तारी के लिए वारंट की भी जरूरत नहीं। ये दोनों ही एक्ट 2002 में पुनः संशोधित किए गए।
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