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विधवाओं को समर्पित एक शहर...

7 वर्ष पहले
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वृंदावन में विधवाओं की बढ़ती भीड़ के मद्देनजर सांसद हेमामालिनी के बयान को लेकर चल रहे सही-गलत के खेल के बीच असल सवाल यह है कि औरतों की बेचारगी का टापू खड़ी करने वाली इस सामाजिक परंपरा की जरूरत क्या है? क्या हमारा समाज और सरकार एक ऐसा ढांचा खड़ा नहीं कर सकते, जिसमें विधवाएं, परित्यक्ताएं एक सक्षम और सहज जीवन जी सकें?

बिहार के राजगीर से चार साल पहले वृंदावन आईं तारादेवी के चार बेटे हैं, लेकिन उनमें से किसी एक के पास भी अपनी मां के लिए एक चारपाई और दो जून की रोटी नहीं है। तारा देवी कहती हैं, ‘तीन बेटों की शादी की, बहुओं को इन्हीं हाथों से उतारा। मगर अब वही बेटे-बहू मुझे मारें, गालियां दें, घर से बाहर निकाल दें तो रहने कहां जाएं?’ 63 वर्षीय विधवा तारा बोलते-बोलते रो पड़ती हैं और सिसकते हुए आगे बताती हैं, ‘जुलाई में छोटे बेटे की शादी थी। दिल नहीं माना तो फोन किया, पूछा आ जाऊं तो छोटे वाले ने ही यह कहते हुए मना कर दिया कि तुम विधवाश्रम में रहती हो, आओगी तो बेइज्जती होगी।’
दुख और नाउम्मीदी की इस कड़ी में मुरैना की कृष्णा बाई, बंगाल की रेनू अधिकारी, गीता मंडल, प्रमीला दासी जैसे सैकड़ों नाम वृंदावन के आश्रमों, सड़कों और आसपास के गांवों में मिल जाएंगे, जो किसी देवता-पित्तर से मिलने वाली मुक्ति की आस में नहीं, बल्कि सरकारी, सामाजिक और पारिवारिक बेकद्री, दुराग्रह और दरिद्रता के कारण यहां आश्रय लिए हैं। इनके लिए भगवान रोजी-रोटी का बुनियादी आधार मात्र है। वृंदावन के ‘चैतन्य विहार विधवा आश्रम’ में करीब तीन सौ निराश्रित रहती हैं, जिनमें से सिर्फ दो ऐसी दिखीं, जिनकी उम्र 40 से कम रही होगी। संयोग से दोनों ही विधवा नहीं हैं। पुरुलिया के बेहद गरीब परिवार से ताल्लुक रखने वाली विकलांग और अविवाहित सोमाली भाई-भाभी के अत्याचार से तंग आकर यहां शरणागत हैं, तो ओडिशा के पुरी जिले की रंभा पति से नहीं निभ पाने की मजबूरी में यहां हैं। इन सबके बीच करीब 90 वर्षीय नुपूर राय खुश हैं कि अब कृष्ण की धरती से ही अर्थी उठेगी। दसवीं पास बुजुर्ग नुपूर हिंदी, अंग्रेजी, बंग्ला और मराठी जानती हैं, पर वह जब सातवीं कक्षा में थीं तभी विधवा हो गईं। उसके बाद कुछ साल तक यहां-वहां रहीं और आखिरकार वृंदावन पहुंच गईं। वे यहां की उन 20 प्रतिशत विधवाओं की श्रेणी में हैं, जिनका कोई नहीं है।
वृंदावन में ‘श्रीभगवान भजनाश्रम’ से जुड़े बांकेलाल बताते हैं, ‘हम पीढ़ियों से यहां महिलाओं को आते देख रहे हैं, लेकिन आज तक कोई रिश्तेदार किसी विधवा को पहुंचाने नहीं आया। सच स्वीकार करेंगे तो उनकी इज्जत नहीं चली जाएगी!’ सवाल है कि दस पर्दों की ओट में रहने वाली ये महिलाएं सैकड़ों मील दूर बिल्कुल अलग भाषा और समाज में आती कैसे हैं? बांकेबिहारी मंदिर के पास दुकान चलाने वाले संतोष शर्मा बताते हैं, ‘ज्यादातर के घरवाले मथुरा या वृंदावन में घुमाने के बहाने लाते हैं और यहीं छोड़ जाते हैं। कुछ गरीबी के कारण ऐसा करते हैं और कुछ "बेकार का सामान' हो चुके बुजुर्गों से छुटकारा पाने के लिए। बुजुर्ग महिलाएं इधर-उधर भटकते हुए विधवा जीवन जीने की आदी हो जाती हैं। दक्षिणा, भिक्षाटन और नौकरानी का काम करके इनका जीवन कट ही जाता है।’

विधवाओं की जिंदगी को दूर से देखने पर हम आदर्श के हवाई आडंबरों में उलझकर रह जाते हैं और भ्रमित करने वाली जानकारियां ही हमारे हिस्से आती हैं। एक तबके की मान्यता के मुताबिक वे हिंदू देवता कृष्ण में एकरूप होने के धार्मिक ख्याल से यहां आश्रय लेती हैं, जबकि दूसरे अतिवादी मानते हैं कि यह सब धंधेबाज हैं, मुफ्तखोरी की आदी हैं। दरअसल यह दोनों दृष्टिकोण उन्हें इंसानी दर्जे से दूर देवी या दानव के रूप में परिभाषित करते हैं। पर वह भी हमारी जैसी ही हैं और लगातार सामान्य नागरिक जीवन जीने की कशिश से भरी हैं। ऐसे में अब सारे सवालों का समुच्चय एक ही जवाब चाहता है कि जिन विधवाओं के दम पर तमाम स्वयंसेवी संगठन, नेता और धार्मिक संस्थाएं, ट्रस्ट चांदी काट रहे हैं वही विधवाएं बेचारी, बेसहारा स्थिति से बाहर क्यों नहीं निकल पा रहीं, उनकी सामाजिक और प्रशासनिक बेकद्री क्यों नहीं रोकी जा रही है? जवाब हमें ही तलाशना होगा और पहल करनी होगी।
जन्नत की हकीकत

वृंदावन में रह रही महिलाओं का बहुतायत 50 साल से ऊपर का है।

बहुत कम संख्या 40 से 50 वर्ष के महिलाओं की है और 40 से कम की विधवाएं-परित्यकत्ताएं अंगुली पर गिनती लायक हैं। आश्रयगृहों में बड़ी संख्या उनकी है जिनके परिजनों ने उन्हें बेघर किया है या गरीबी के कारण यहां आने को मजबूर हुई हैं। एक अनुमान के मुताबिक विधवा का जीवन जी रही औरतों में 30 फीसदी ऐसी हैं, जो विधवा हैं ही नहीं और 80 फीसदी ऐसी हैं जिनके बेटे-बेटियां हैं। कई तो वृंदावन में परिवार के साथ रहती हैं, बाल-बच्चे भी हैं। पति कोई छोटा-मोटा काम करता है और ये विधवा के नाम पर दान में मिलने वाले सामानों, पैसों और भोजन से परिवार पालने में मदद करती हैं।