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बाढ़ की घाटी पहाड़ सी जिंदगी

7 वर्ष पहले
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कश्मीर...। आपदाओं के शब्दकोश में एक और नाम। और हां, त्रासदी से लहूलुहान कश्मीर की कहानी भी केदारनाथ जैसी ही है। डरावनी, आतंकित करने वाली, सदमों,-तकलीफों,-दुश्वारियों से भरी हुई। दोनों ही आपदाओं को पहचानने में हम नाकाम रहे हैं। मौसम ने तो संभलने की चेतावनी दी थी लेकिन हम अपनी ही धुन में मशगूल रहे। नतीजा- मौत के आंकड़े बढ़ते चले गए और हुंकारती लहरें पूरी घाटी में पसरती चली गईं।

प्रकृति सुकून और शांति देती है, लेकिन अगर हम उसके आने-जाने के रास्ते में ताकत दिखाते हुए अतिक्रमण करने लगेंगे तो तबाही तय है। केदारनाथ की तरह कश्मीर में भी यही हुआ। हमने विकास और पर्यावरण के बीच की जो नाजुक दीवार थी, वो तोड़ डाली। न हम मौसम को समझ पाए और न मानसून को। इस तथ्य पर ज़रा गौर करें। श्रीनगर का पहला शहरी मास्टर प्लान 1971 में बना था जो 1991 तक सक्रिय रहा। इस दौरान इस पूरी घाटी की आबादी ही नहीं, बल्कि उसका भूगोल भी बदल गया। खूबसूरती ही दुश्मन बन गई। अतिक्रमण ने डल झील को उसके मूल स्वरूप यानी 75 वर्ग किमी से सिकोड़कर 12 वर्ग किमी में सीमित कर दिया है। झील के 85 फीसदी इलाके पर घर, शिकारे, लॉज व होटल बनते चले गए। इस बार पानी का सैलाब आया तो उसने अपने मूल इलाके पर हक जताते हुए इन सबको बहा दिया। सालों का अतिक्रमण प्रकृति ने कुछ ही पलों में हटा दिया।

अब ज़रा अबूझ पहेली बना आपदा प्रबंधन का निराशाजनक ट्रेक रिकार्ड देखें। मौसम विभाग ने कश्मीर में भारी बारिश की चेतावनी 2 सितंबर को जारी कर दी, लेकिन राज्य का आपदा प्रबंधन आपदा का चेहरा नहीं पढ़ पाया। बचाव कार्य 5 सितंबर से शुरू हुआ और इस देरी ने पूरे कश्मीर को जल सैलाब में डुबो दिया। यहां चिंताएं और भी हैं। स्टेट प्रोटोकॉल के मुताबिक मौसम विभाग द्वारा जारी की गई जानकारी पहले स्टेट इमरजेंसी ऑपरेशन सेंटर को मिलती है, जो राज्य के डिजास्टर मैनेजमेंट विभाग के अधीन है। यहीं से पूरी जानकारी गृह विभाग, कैबिनेट सचिवालय, पुलिस, जिला प्रशासन, स्टेट डिजास्टर मैनेजमेंट अथाॅरिटी व डिस्ट्रिक्ट इमरजेंसी ऑपरेशन सेंटरों को भेजी जाती है। इसके बाद राहत कार्य शुरू होते हैं। प्राकृतिक आपदा से निपटने की यह जटिल सरकारी प्रक्रिया खुद एक बड़ी आपदा जैसी है। फाइल जब तक व्यवस्था-तंत्र के आखिरी सिरे पर पहुंचती है, आपदा तांडव कर चुकी होती है। केदारनाथ की तरह कश्मीर भी इसी अहंकारी सरकारी व्यवस्था का शिकार हुआ। आखिर हम ऐसा सिस्टम क्यों नहीं बना पाए हैं कि आपदा आते ही राहत अभियान खुद-ब-खुद शुरू हो जाए? यह कैसी बिडंबना है।

बेशक, कश्मीर में अब पानी धीरे-धीरे उतर रहा है, लेकिन जिंदगी को संवराने की चुनौतियां कम नहीं हुई हैं। जाहिर है कि प्राकृतिक आपदाओं को रोका भी नहीं जा सकता। जीवन, आपदा और पुनर्वास से आगे भी बहुत कुछ है। यह सही है कि आपदा अपनों को खोने की असहनीय पीड़ा तो देती है, लेकिन यही त्रासदी अदम्य जिजीविषा की मिसाल भी पेश करती है। अगर हमारा नेतृत्व और वैज्ञानिक संस्थाएं मुश्किल समय में उच्च मानवीय मूल्यों का प्रदर्शन करें तो आपदा की चुनौती से निपटा जा सकता है। भयावहता कम या सीमित की जा सकती है। फिर चाहे वह केदारनाथ हो या कश्मीर। जीवन के पदचिन्ह कभी नहीं मिटेंगे। और असंभव कुछ भी नहीं है।

जानलेवा बारिश-

केदारनाथ- 300 मिमी से ज्यादा बारिश 15 जून को मौसम विभाग ने भारी बारिश का अलर्ट जारी किया। 16 को सुबह साढ़े सात बजे इसरो ने भी उत्तराखंड सरकार को यही चेतावनी दी। 15-16 जून को एक ही दिन में 6 महीने की औसत बारिश जितना पानी बरसा। एक घंटे में 300 मिमी से ज्यादा बारिश।

कश्मीर- औसत से 122 गुना अधिक बारिश
मौसम विभाग ने 2 सितंबर से भारी बारिश (हैवी टू एक्स्ट्रीमली हैवी रेनफॉल) की चेतावनी जारी की। झेलम 5 सितंबर को 22.30 फीट पर बह रही थी यानी डेंजर मार्क से 4.4 फीट ऊपर। श्रीनगर में 5 सितंबर को औसतन 0.4 मिमी बारिश होती है, जबकि इस बार 49 मिलीमीटर हुई यानी 122 गुना ज्यादा। (औसत 100 सालों का।)

आपदा प्रबंधन
केदारनाथ- राहत देर से, 10 हजार मौतें केदारनाथ- 15-16 जून के अलर्ट के बाद भी उत्तराखंड का आपदा प्रबंधन विभाग 19 तारीख को हरकत में आया। इन तीन दिनों की देरी के कारण दस हजार से ज्यादा लोगों की जान चली गई।

कश्मीर- अलर्ट मिला, तंत्र का टोटल कॉलेप्स 2 सितंबर को मौसम विभाग ने भारी से बहुत भारी बारिश का अलर्ट सरकार को दिया गया। यहां भी राज्य का आपदा प्रबंधन तीन दिन बाद यानी 5 सितंबर को ही सक्रिय हो सका।

सरकारी रवैया-

केदारनाथ- जिंदगियां नहीं, जन्मदिन था जरूरी 15-16 जून को सरकार जान चुकी थी कि केदार घाटी समेत पूरा उत्तराखंड जानलेवा तबाही की गिरफ्त में है। 18 जून को देहरादून में कैबिनेट की बैठक में तबाही पर चर्चा नहीं हुई। सीएम दिल्ली में राहुल गांधी का जन्मदिन मनाने पहुंच गए। आपदा से घबराए रुद्रप्रयाग के डीएम विजय ढोंढियाल को हार्ट अटैक आ गया। निर्णय लेने वाला कोई नहीं था।

कश्मीर- अभियान के बजाय चला सियासी गुणा-भाग झेलम का जलस्तर 60 साल बाद डेंजर मार्क के पार चला गया था। लेकिन केंद्रीय जल आयोग (सीडब्ल्यूसी) ने बाढ़ का अलर्ट जारी नहीं किया, न ही सरकार ने मौसम विभाग के अलर्ट को तवज्जो दी। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला कथित सियासी प्रतिबद्धताओं में उलझे रहे और केंद्र से मदद मांगने में संकोच करते रहे।
आपदा पैकेज

केदारनाथ- 12 हजार करोड़ की तबाही केदारनाथ में तबाही के तुरंत बाद उत्तराखंड सरकार को 500 करोड़ रु. जारी किए गए। जबकि नेशनल डिजास्टर रेस्पॉन्स फंड से 1187 करोड़ रु. व केंद्र की ओर से 6687 करोड़ रु. अलग से मिले। यह कुल मिलाकर यह राशि 8374 करोड़ रु. बैठती है। तबाही का आकलन 12 हजार करोड़ रु. किया गया।

कश्मीर- पानी उतरे तो हो तबाही का सही आकलन कश्मीर- तबाही के तुरंत बाद केंद्र सरकार ने राज्य को अब तक 2100 करोड़ रु. की मदद आपदा प्रबंधन और पुनर्वास के लिए दी है। नुकसान का शुरुआती आकलन 5700 करोड़ रु. का है।

प्रकृति का रास्ता रोका

केदारनाथ- आपदा प्राकृतिक, मौत हमने बुलाई केदार घाटी में बहने वाली मंदाकिनी नदी के बहाव-क्षेत्र पर होटलों-लॉज और धर्मशालाओं ने कब्जा कर अतिक्रमण किया। यह पानी का प्राकृतिक रास्ता था। 6 महीने की बारिश जब एक दिन में बरसी तो उस पानी को अपने हक का पूरा रास्ता तो लेना ही था। नतीजतन पूरी केदार घाटी तिनके की तरह बह गई।
कश्मीर- कुदरती रास्ते रोके तो पानी ने हटाए अतिक्रमण पिछले 100 सालों में श्रीनगर के 50 फीसदी से ज्यादा झील, तालाब और अन्य वेटलैंड्स के हिस्सों पर अतिक्रमण कर इमारतें और सड़कें बना दी गई थीं। झीलों के बीच की खाली जगहें पानी का प्राकृतिक रास्ता हैं जो एक-दूसरे को जोड़ता है। इन जगहों में लोगों ने कब्जा कर लिया। यहां भी झेलम का पानी अपने ही रास्ते में तो था।