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लुक पर लोगों का आकलन न करें

9 वर्ष पहले
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फंडा यह है कि... लोगों को पूर्वग्रह के चश्मे से देखना ठीक नहीं है। किसी व्यक्ति के बाहरी लुक के आधार पर उसका आकलन करने के बजाय उसके भीतर झांकना ज्यादा जरूरी है। यह 1960 के दशक की बात है। उस वक्त मेरे माता-पिता महाराष्ट्र में वर्धा के निकट स्थित सेवाग्राम में महात्मा गांधी आश्रम के लिए काम करते थे। चूंकि सेवाग्राम में ज्यादा स्कूल नहीं थे, लिहाजा मैं नागपुर में रहकर पढ़ते हुए वीकेंड पर सड़क या रेलमार्ग के जरिए वहां आना-जाना करता था। सफर में मुझे नए-नए लोगों से मिलना अच्छा लगता था। मैं उस वक्त काफी छोटा था, लिहाजा मुझे ऐसी सीट पकड़ा दी जाती, जिस पर अमूमन नियमित यात्री बैठने से कतराते। मैं भी अपनी हर यात्रा में रोजमर्रा की गंदगी और रेत-मिट्टी के बीच से इंसानी करुणा के कुछ दाने चुन ही लेता। चीजें हमेशा वैसी नहीं होतीं, जैसी लगती हैं। लोग अक्सर बाहरी आवरण के पीछे छिपी अच्छाई को प्रदर्शित करते हुए आपको चकित कर देते हैं। मैं सेवाग्राम से नागपुर लौट रहा था। मैं अमूमन अपने बाजू में बैठे शख्स को परिचय देते हुए बातचीत करने लगता था, लेकिन उस दिन मुझे ऐसा करना ठीक नहीं लगा। मेरे बाजू में बैठा शख्स बाईस-तेईस साल का एक सख्त किस्म का युवक था। उसके पास से सस्ते-से आफ्टर-शेव लोशन जैसी बू आ रही थी और उसने भारीभरकम जैकेट पहन रखी था, जो शायद फैशन था। संक्षेप में कहूं तो वह उन गंदे किरदारों की तरह लग रहा था, जिनसे आपकी मां दूर रहने के लिए चेताती रहती हैं। मैंने उस पर नजर डाली और अपना बैग ऊपर लगेज रैक में रखने के बजाय गोद में ही रख लिया, मानो वह उसे लेकर भाग जाएगा। मैं बगैर कुछ बोले खिड़की के बाजू वाली सीट में ही दुबक गया। मैं लगातार खिड़की से बाहर देखे जा रहा था, ताकि किसी भी सूरत में हमारी नजरें आपस में न टकराएं। हालांकि वह बातचीत के मूड में था। वह बार-बार मुझसे बातचीत करने की कोशिश करता। उसने मुझसे पूछा कि मैं कहां से आ रहा हूं, क्या मैं नागपुर में ही रहता हूं या नहीं और खुद अपने काम के बारे में भी बताया। मैंने बड़ी रुखाई से कम शब्दों में उसे जवाब दिया, जिससे मेरी झुंझलाहट साफ जाहिर हो रही थी। आखिर मेरे मूड को भांप वह चुप हो गया। उसी वक्त मुझे नींद आने लगी। चूंकि मुझे अपने बाजू वाले मुसाफिर पर तनिक भी भरोसा नहीं था, लिहाजा मैं खुद को मोड़ते हुए अपनी ही सीट के दायरे में सिमटकर बैठ गया। ठंडी हवा के झोंकों ने जल्द ही मुझे सुला दिया। थोड़ी देर बाद जब मेरी नींद खुली, तो मैंने देखा कि मेरी बाजू वाली सीट खाली थी और मेरा बैग भी गायब था। मैं बहुत परेशान हो गया। तभी पीछे की सीट पर बैठे एक मुसाफिर ने बताया कि मेरे सोते वक्त कुछ बदमाश मेरे हाथ से बैग छीनकर भाग रहे थे। बाजू वाला मुसाफिर तुरंत बाहर दौड़ा और उन गुंडों से लड़ते हुए मेरा बैग वापस ले लिया। लेकिन तब तक ट्रेन चलने लगी थी, लिहाजा वह शख्स दौड़कर पीछे वाली बोगी में चढ़ गया है और अगले स्टेशन पर वह हमारे पास आ जाएगा। उसने मुझे बताया कि वह इस पूरे दृश्य को अपनी खिड़की से देख रहा था। अब मुझे अपने बर्ताव पर बहुत ग्लानि हो रही थी। जिस शख्स को मैं इतना गलत समझ रहा था, उसने मुझे अहसास दिलाया कि मैंने उसके साथ कितना ओछा बर्ताव किया। जल्द ही अगला स्टेशन आ गया। वह पीछे से दौड़ता हुआ आया और मुझे मेरा बैग दे दिया। अपना बैग लेते वक्त मेरे पास उससे माफी मांगने के लिए शब्द नहीं थे। मैंने उसका नाम नहीं पूछा और न ही उसने मुझसे मेरा। लेकिन मैं उसे कभी भूल नहीं पाया। raghu@bhaskarnet.com मैनेजमेंट फंडा एन. रघुरामन

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