समाज में बेहतर व्यवहार के हों नियम-कायदे

9 वर्ष पहले
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मैंने कुछ दिन पूर्व एक ब्लॉग में यह स्टोरी पढ़ी थी। लिखने वाली एक लड़की थी। जब आप इस स्टोरी को पढ़ेंगे, तो संभवत: यह आपको आज के समय की सबसे भयावह स्टोरी लगेगी। यह स्टोरी बताती है कि समाज के भीतर हमारा व्यवहार किस कदर बिगड़ता जा रहा है।
स्टोरी कुछ इस तरह है- लड़की अपने आलीशान घर में अपनी सहेलियों के साथ खेल रही थी (जगह का नाम कुछ कारणों से नहीं दिया जा रहा है)। ये सभी नौ-दस साल की लड़कियां थीं, जो अपनी बार्बी डॉल्स के साथ खेल रही थीं। तभी उनके कुछ कजिन (जो उम्र में उससे छोटे थे) वहां आ गए और खेल में व्यवधान डालने लगे। लड़कियों ने उन्हें डपटकर वहां से भगा दिया। वे इसे उनकी नादानी समझ रही थीं, लेकिन उन्हें नहीं पता था कि इसकी क्या प्रतिक्रिया मिलने वाली है। कुछ देर बाद वे लड़के अपने सुपर मारियो ६४ और स्ट्रीट फाइटर जैसे खिलौनों के साथ आए और बोले- 'हम तुम्हारी बार्बी का रेप करवा देंगे।'यह सुनकर लड़कियों का चौंकना स्वाभाविक था। ये छह-सात साल के नन्हे बालक थे। उन्हें तो संभवत: यह भी पता नहीं होगा कि रेप होता क्या है। लेकिन उन्हें यह जरूर पता था कि यह एक ऐसा शब्द है, जिसका इस्तेमाल लड़कियों या महिलाओं को सबक सिखाने के लिए किया जा सकता है। उन्होंने अपने घर के बड़ों या गांव के लोगों को किसी दूसरे को सबक सिखाने की खातिर 'रेप करवा दूंगा' जैसे जुमले बोलते सुना होगा।
कुछ राज्यों में तो लोग आम बोलचाल में भी इस शब्द का इस्तेमाल करते हैं। एक जिम्मेदार अखबार होने के नाते हम इसका जिक्र नहीं करना चाहते। लेकिन समाज की बेहतरी की खातिर इस तरह के मसलों को सामने लाना हम अपना फर्ज समझते हैं। हमारे सामाजिक शिष्टाचार में तेजी से विकृति आ रही है। हमें इसे बदलना होगा और बदलाव की शुरुआत बड़े-बुजुर्गों और अभिभावकों के साथ होनी चाहिए, जो दूसरों के सामने अच्छे बर्ताव की मिसाल पेश करें। अनेक मनोविज्ञानियों का मानना है कि शाब्दिक आघात या दुर्वचन कहना तो फिल्म के ट्रेलर जैसा है। फिल्म तो हिंसक व्यवहार की होती है। वर्ष १९९१ की बात है। मैं अभिनेता दिलीप कुमार और उनकी पत्नी सायरा बानो के साथ घोड़ों की रेस देखने के लिए पुणे गया था। यह रेस दृष्टिहीन बच्चों के लिए फंड जुटाने हेतु आयोजित की गई थी। इसे नेशनल एसोसिएशन फॉर द ब्लाइंड ने आयोजित किया था।
उस मीटिंग में दिलीप कुमार ने उपस्थित लोगों के समक्ष कहा, 'वे दिन अब नहीं रहे, जब लोग इतने अच्छे तरीके से बात करते थे कि लगता था मानो मुख से फूल झड़ रहे हैं।' उन्होंने धीर-गंभीर आवाज में आगे कहा, 'मगर मुझे खेद के साथ कहना पड़ेगा कि आज लोगों का बोलचाल सुनकर ऐसा लगता है मानो झाड़ू बरस रही हो।' वह हमारी आम बोलचाल की भाषा में शब्दों की महत्ता के बारे में बात कर रहे थे। यहां इस बात को न भूलें कि उनके जैसी अजीम शख्सियत ने बदलाव की इस अंतर्धारा को तकरीबन दो दशक पहले ही भांप लिया था।
दिल्ली गैंगरेप प्रकरण के बाद विभिन्न टीवी चैनलों पर राय देने वाले विभिन्न भाषा विशेषज्ञों ने अभद्र भाषा के इस्तेमाल पर ज्यादा आपत्ति नहीं जताई। लेकिन किसी न किसी को तो सभ्य-शालीन समाज में शब्दों के इस्तेमाल के संदर्भ में कोई लक्ष्मणरेखा तो खींचनी ही होगी। वास्तव में फैशन व लोकप्रिय संस्कृति को पब्लिक से ही आइडियाज मिलते हैं। और यही चीज वापस समाज में आ जाती है। इस तरह यह चक्र चलता रहता है। ज्यादातर लोग सोचने लगते हैं कि इस तरह के शब्द इस्तेमाल करना तो फैशन बन गया है। इसी तरह भाषा विकसित होती है और आबादी का एक पूरा समूह ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करने लगता है, जिन्हें कभी अभद्र या निंदनीय समझा जाता था।
फंडा यह है कि...
हमें समाज में स्वीकार्य व्यवहार को लेकर खुद अपने लिए कुछ नैतिक नियम-कायदे तय करने होंगे। ऐसा हरेक बदलाव जाहिर तौर पर युवा पीढ़ी की सोच में भी बदलाव लाएगा।
raghu@dainikbhaskargroup.com