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परोपकार ऐसा हो जिसका असर लंबे समय तक बना रहे

9 वर्ष पहले
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यदि आप किसी की मदद करना चाहते हैं तो उसे एक दिन खाने के लिए मछली देने की बजाय मछली पकडऩे वाला जाल दीजिए। पेट की भूख शांत करने में लोगों की मदद करना बुरा नहीं है, लेकिन इससे बेहतर है कि वे खुद ऐसा करें और आप इसमें उनकी मदद करें। परोपकार ऐसा करें जिसका असर लंबे समय तक बना रहे।
18 साल पहले मुंशीलाल की उम्र केवल 32 वर्ष थी और वह एक लॉन्ड्री में इस्तरी करने के साथ डिलीवरी ब्वॉय के रूप में काम करता था। एक दिन जब उसे छुट्टी मिली तो वह अपने सपनों के शहर मुंबई घूमने निकला, लेकिन मुलुंड में एक ट्रेन दुर्घटना में उसके दोनों पैर और एक हाथ कट गए। इसके बाद उसकी जिंदगी की रफ्तार थम गई। लॉन्ड्री का मालिक एक दिन उसे देखने आया, लेकिन फिर किसी ने उसकी ओर झांका तक नहीं।
रंजना उस समय केवल 20 साल की थी जब एक रात उसका ऑटो ड्राइवर पति शराब पीकर आया और अपने माता-पिता के साथ मिलकर उसके ऊपर डीजल उड़ेलकर उसे आग लगा दी। वो भी केवल इसलिए कि रंजना उनकी मांग के अनुरूप दहेज के एक लाख रुपए लाने को राजी नहीं हुई। उसका शरीर पचास फीसदी जल गया था। घटना के बाद उसके पति और ससुुराल वालों को जेल हो गई और रंजना की जिंदगी में कुछ नहीं बचा। उसके शरीर पर जले के निशान इतने गंभीर थे कि कोई उसकी ओर देख तक नहीं सकता था।
अपनी किस्मत को कोसते हुए मुंशीलाल और रंजना इलाज के लिए नियमित रूप से नगर निगम के अस्पताल आते। एक दिन ऐसा हुआ कि दोनों एक ही डॉक्टर के पास पहुंचे और बाहर बैठे अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे थे। रंजना को देखकर मुंशीलाल ने सहानुभूति पूर्वक उसके जलने से लगे दागों के बारे में पूछा। रंजना ने गौर किया कि मुंशीलाल के दोनों हाथ और एक पैर नहीं हैं, फिर भी वह एक अनजान महिला की हालत देखकर दुखी हो रहा था। दोनों के बीच बातचीत होने लगी और आज अठारह साल से दोनों एक साथ हैं। विलियम शेक्सपियर ने ए मिडसमर नाइट्स ड्रीम में लिखा है, उसका प्यारा चेहरा आंखों में गुम नहीं हुआ, बल्कि यह गलती दिमाग की थी।
कुछ दिन पहले तक आप 50 वर्षीय मुंशीलाल और 38 साल की रंजना को मुलुंड स्टेशन के आसपास सड़कों पर कभी भी भीख मांगते हुए देख सकते थे। वे अपनी तीन बेटियों के साथ कुछ छोटे-मोटे काम कर किसी तरहअपना गुजर-बसर करते थे। रोज के इस संघर्ष में कई बार ऐसा होता था कि उनके पास रोटी खाने के लिए भी पैसे नहीं होते थे और उन्हें भूखे सोना पड़ता था। इसके बावजूद उनकी बच्चियों ने कभी स्कूल जाना नहीं छोड़ा और आज सबसे बड़ी बेटी बारहवीं कक्षा की परीक्षा की तैयारी कर रही है। हालांकि, रंजना एक मध्यमवर्गीय परिवार से थी, लेकिन वह मुंशीलाल की पत्नी बनने और उसके साथ सड़क किनारे बनी झुग्गी में रहने को तैयार हो गई क्योंकि मुंशीलाल उसकी कद्र करता था। पांच साल पहले सड़क को चौड़ा बनाने के लिए उनकी झुग्गी को तोड़ दिया गया, लेकिन पुनर्वास योजना के तहत उन्हें सुभाष नगर में एक छोटा फ्लैट मिल गया। 14 फरवरी, 2013 को स्थानीय निवासियों ने उन्हें एक सिलाई मशीन उपहार में दी। पिछले दस दिन से वे हर दिन औसतन 200 रुपए कमा रहे हैं और आराम से जीवन बसर कर रहे हैं।
वेलेंटाइन गिफ्ट पांच लोगों के एक परिवार को सुकून की जिंदगी जीने का अवसर दे रहा है। साथ में बच्चों को शिक्षा देने की उनकी इच्छा भी पूरी हो रही है। रंजना ने सिलाई का कोर्स किया है, यही सोचकर स्थानीय लोगों ने वेलेंटाइन डे के मौके पर उन्हें सिलाई मशीन उपहार में देने का फैसला किया और इसकी मदद से आज वे आत्मनिर्भर हो गए हैं। पूरी दुनिया में समाजसेवी संस्थाएं छोटी रकम दान कर लोगों को बेहतर जीवन जीने का मौका दे रही हैं ताकि वे अपनी जिंदगी दोबारा शुरू कर सम्मानित ढंग से जी सकें।