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कट्टरपंथी नहीं पढ़ाएंगे नमाज-ए-जनाजा

9 वर्ष पहले
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पश्तो गायिका गजाला के कत्ल के बारे में लिखने के बाद मुझे भोपाल, राजस्थान समेत कई दूसरे इलाकों से बहुत सारी ईमेल मिलीं। उनमें नौजवानों ने अपने पसंदीदा गायकों के बारे में फिक्रमंदी जाहिर की है। उनका कहना है कि आतिफ असलम, अली जफर और उनके जैसे दूसरे गाने वालों को भी अपनी जान की हिफाजत करनी चाहिए। इससे ज्यादा खुशी की बात क्या हो सकती है कि दोनों तरफ के नौजवान एक-दूसरे के आर्ट और कल्चर में दिलचस्पी ले रहे हैं। इस वक्त हमारे टीवी चैनलों पर इस तरह के बहुत से प्रोग्राम चल रहे हैं कि 70 बरस पहले हमारे यहां औरतें क्या पहनती थीं। साड़ी इस उपमहाद्वीप का हजारों साल पुराना लिबास है। मैंने अपनी वालिदा और तमाम रिश्तेदारों को साड़ी में देखा। घर में वो कलफ लगी साड़ियां पहनतीं जबकि शादियों, तमाम दूसरे मुबारक मौकों पर बनारसी और दूसरी कीमती साड़ियां। सदर जनरल सिकंदर मिर्जा की बेगम नाहीद सिकंदर मिर्जा, बेगम शाइस्ता सरवरी इकरामुल्लाह और नुसरत भुट्टो भी हिंदुस्तान और बंगाल में बनी कीमती साड़ियां पहनतीं। मलिका नूरजहां, फरीदा खानम और इकबाल बानो को हमने साड़ी के सिवा किसी दूसरे लिबास में नहीं देखा। फिर जनरल जिया उल हकका जमाना आया, जब साड़ी को हिंदुओं का पहनावा करार दिया गया। हालांकि तब भी मशहूर फनकाराओं ने साड़ी का साथ नहीं छोड़ा। साड़ी फिर फैशन में है। कुछ दिन पहले एक प्राइवेट टीवी चैनल पर साड़ी के बारे में एक दिलचस्प बातचीत सुनी। उसमें पाकिस्तान की मशहूर टीवी आर्टिस्टों ने हिस्सा लिया। उन्होंने उपमहाद्वीप के अलग-अलग इलाकों में साड़ी की मकबूलियत, उसके बांधने के अंदाज और उसकी लंबाई पर बातचीत की। इस बात का भी जिक्र हुआ कि साड़ी नरगिस, हेमा मालिनी और माधुरी पर कितनी फबती थी। जिक्र आया कि नूरजहां जब किसी प्रोग्राम में शिरकत करतीं तो गाने के दौरान साड़ी के पल्लू को अपनी उंगली में लपेटतीं और फिर एक झटके से उसके बल खोलतीं तो लोगों के दिल धड़कना भूल जाते। यह भी मशहूर है कि नूरजहां के पास हजारों साड़ियां थीं। उनकी साहबजादी जिल्ले हुमा कहती हैं, ‘मेरी वालिदा अपनी मिलने वालियों को साड़ियां तोहफे में देती थीं।’ एक तरफ ये दिलचस्प बातें हैं, दूसरी तरफ हमारे मुल्क के उत्तरी इलाके में कुछ लोग हर नए विचार और हर नई बात के खिलाफ एकजुट हो गए हैं। उन इलाकों में रहने वाले कट्टरपंथी चाहते हैं कि वहां के लोग हजारों बरस पुरानी रिवायतों के मुताबिक जिंदगी गुजारें। यहां विकास के लिए बहुत से एनजीओ काम कर रहे हैं। उनसे जुड़े नौजवान यहां बच्चों को पोलियो ड्राप पिलाने, तालीम देने और औरतों-लड़कियों को हुनर सिखाने में जुटे हैं, ताकि वो अपनी रोजी कमा सकें। लेकिन कट्टरपंथी इन चीजों को अपनी रिवायत के खिलाफ समझते हैं। उनके हिसाब से पोलियो के कतरे बच्चों को काफिर बना देते हैं। इसी तरह लड़कियों की तालीम या हुनरमंदी से उन्हें डर लगता है। जिला कोहिस्तान की एक मस्जिद में जमा 150 कट्टरपंथियों ने हाल में फतवा दिया कि वो एनजीओ में काम करने वाले मर्दो और औरतों की नमाज-ए-जनाजा नहीं पढ़ाएंगे। उन्होंने हुकूमत को भी आगाह कर दिया है कि कि वो इलाके में काम करने वाले एनजीओ का एनओसी फौरन कैंसिल करवाएं। एनजीओ और वेलफेयर आर्गेनाइजेशनों में काम करने वाले 500 नौजवानों में इलाके की लड़कियां भी शामिल हैं। एक तरफ तो ये लोग इलाके के हालात से परेशान हैं, लेकिन दूसरी तरफ फतवा देने वाले खुश हैं कि वो जन्नत में अपने महल बना रहे हैं।                                                                                                                                    गौरतलब साड़ी उपमहाद्वीप का हजारों साल पुराना लिबास है। मैंने अपनी वालिदा और तमाम रिश्तेदारों को साड़ी में देखा फिर जनरल जिया उल हकका जमाना आया, जब साड़ी को सिर्फ हिंदुओं का ही पहनावा करार दिया गया मुल्क के उत्तरी इलाकों में रहने वाले कट्टरपंथियों को लड़कियों की तालीम या हुनरमंदी से डर लगता है।

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