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दंगल से लंदन तक..

9 वर्ष पहले
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संसाधनों और सुविधाओं की कमी पर रोने वाले खिलाड़ियों से जुदा सुशील कुमार, अमित कुमार और गीता फोगट जैसे दंगल के दबंग सितारे चुनौतियों के सामने जिंदादिली से खंभ ठोंक रहे हैं। गांव की मिट्टी में तपे इन पहलवानों की आंखों में अब लंदन ड्रीम्स झिलमिला रहे हैं। कदम-कदम पर मुश्किलों को पटखनी देते पहलवानों के सफर पर भरत शर्मा और रोहित गुप्ता की रिपोर्ट सवेरे की पहली किरणों, सड़क के दोनों ओर ढाबों की कतार और ग्रामीण भारत की भीनी खुशबू। जीटी करनाल रोड पर सवेरे 6 बजे गाड़ी रफ्तार पकड़ रही थी, तो लगा कि अरसे बाद किसी गांव से तारुफ होने वाला है। लेकिन गाड़ी ने यूटर्न लिया और हम हरियाणा में बहालगढ़ के चौधरी देवीलाल स्टेडियम के सामने खड़े थे। अंदर रेसलिंग प्रैक्टिस हॉल में 7 बजते-बजते हलचल बढ़ी और सबसे पहले पहुंचने वालों में सुशील कुमार थे। बीजिंग में ब्रॉन्ज मेडल पाकर बुलंदी छूने वाले इस पहलवान के पांव आज भी जमीन पर हैं। लंदन ओलंपिक की तैयारियों में जुटे सुशील ने आते ही वॉर्म-अप शुरू किया और साथ ही शुरू हुआ दो-ढाई घंटे चलने वाली मशक्कत का सिलसिला। बच्चे हों या फिर दूसरे जूनियर पहलवान, यहां मेंटर बन चुके सुशील और कोच के पांव छूकर ही मैट पर उतरा जाता है। सुशील ने चार साल पहले जो मेडल जीता, वह भारतीय कुश्ती के लिए नई जिंदगी भी था। यह खेल भारत में नया नहीं, लेकिन 2008 के ओलंपिक मेडल ने इसे नया मुकाम दिया। नतीजा सामने है। इस बार सुशील के साथ योगेश्वर दत्त, नरसिंह पंचम यादव, अमित कुमार दहिया जैसे पहलवानों से मेडल की उम्मीद है। साथ ही भारत पहली बार महिला वर्ग में नाम दर्ज कराएगा और उसकी नुमाइंदगी करेंगी गीता फोगट। ऐसा नहीं कि कुश्ती की किस्मत चमक गई, हां सुधर जरूर गई है। मिट्टी में पसीना बहाने वाले पहलवानों को एसी हॉल मिलने लगे हैं, तो दांव-पेंच आजमाने के लिए मैट। विदेश में ट्रेनिंग कैम्प लग रहे हैं। हालांकि, नई सुविधाओं ने पुराने तौर-तरीकों की अहमियत नहीं बदली। नेशनल मेन्स रेसलिंग चीफ कोच विनोद कुमार ने रसरंग से बातचीत में कहा, ‘मिट्टी और मैट का अंतर अब खत्म हो चुका है। जब मैं लड़ता था, तो सिर्फ पटियाला में बेकार सा गद्दा होता था। लेकिन अब भारतीय और विदेशी पहलवानों की ट्रेनिंग में कोई फर्क नहीं। इन्फ्रास्ट्रक्चर में गजब का सुधार आया है। प्रतिद्वंद्वियों का वीडियो एनालीसिस होता है, विश्वस्तरीय विदेशी कोच मौजूद हैं।’ भले 10 साल पहले ऐसा नहीं था, लेकिन भारतीय कुश्ती का इतिहास भी तमगे की चमक से अछूता नहीं रहा। 60 बरस में कहां से कहां तक आजादी के बाद ओलंपिक में व्यक्तिगत स्पर्धा का पहला मेडल 1952 में पहलवान खाशाबा दादासाहेब जाधव ने हमें दिलाया। लेकिन इसका अगला पदक आने में 56 साल लग गए। पहलवानों के चूकने के पीछे एक वजह कुश्ती को नजरअंदाज किया जाना है। 1972 के म्यूनिख ओलंपिक में शामिल रहे सुदेश कुमार बताते हैं, ‘हम अखाड़े और मिट्टी में तैयारी करते थे। जूट से बने गद्दों पर प्रैक्टिस करते थे, इसलिए खूब चोट लगती थी।’ गरीबी और कुश्ती की दोस्ती पुरानी है। इसका पहला ओलंपिक मेडल जीतने वाले जाधव के दोस्त ने घर गिरवी रखकर 7 हजार रुपए जुटाए, तब वह हेलसिंकी जा सके। ओलंपिक मेडल के सूखे के बीच भी कुश्ती लहलहाती रही। 1970 के एशियन गेम्स में गोल्ड मेडल जीतने वाले मास्टर चंदगीराम ने दिल्ली में अपने अखाड़े में पहलवानों की पूरी पीढ़ी तैयार की। उधर, गुरु हनुमान के शिष्य सतपाल सिंह ने 1982 के एशियन गेम्स में देश को गोल्ड दिलाया, तो सतपाल के चेले सुशील भारत के लिए ब्रॉन्ज मेडल ले आए। लंदन ओलंपिक में भारतीय चुनौती पेश करने वाले नरसिंह यादव को छोड़कर बाकी तीन पहलवान उन्हीं के अखाड़े से निकले हैं। गीता फोगट ओलंपिक में चुनौती पेश करने वाली पहली भारतीय महिला पहलवान हैं। हालांकि अलका तोमर 2006 की वर्ल्ड चैंपियनशिप में कांस्य जीत चुकी हैं। 30 बरस पहले कुश्ती का जलवा था। चंदगीराम के बेटे जगदीश कालीरमण के मुताबिक, ‘1980 से पहले देश में कुश्ती और हॉकी का डंका बजता था। लेकिन 1983 में वर्ल्ड कप की जीत ने क्रिकेट को पर लगा दिए। हालांकि, 2008 के ओलंपिक के बाद कुश्ती के इन्फ्रास्ट्रक्चर में लगातार सुधार हो रहा है।’ मिट्टी से मैट तक का सफर कुश्ती 60 सालों में सिर्फ केवल जाधव से गीता तक नहीं पहुंची, बल्कि उसने अखाड़ों से एयरकंडिशंड हॉल में बिछे मैट तक का सफर तय किया। लंदन में भारतीय कुश्ती की नुमाइंदगी कर रहे सबसे कम उम्र के अमित दहिया को मिट्टी और मैट, दोनों की कीमत पता है। उन्होंने कहा, ‘गांव के लड़कों को दंगलों में जाते देखकर मैंने कुश्ती चुनी। शुरू में शौक था, लेकिन बाद में नियमित रूप से जाने लगा। फिर दिल्ली के छत्रसाल स्टेडियम से जुड़ गया।’ लंदन ओलंपिक में चुनौती देने के लिए अगर पांच पहलवान तैयार हैं, तो इसके पीछे गांव के दंगलों और अखाड़ों की बड़ी भूमिका है। 1928 में शुरू हुए गुरु हनुमान अखाड़े ने इतने चैंपियन दिए हैं कि उसका एक कमरा ट्रॉफियों, मेडल और गदा से भरा पड़ा है। इस अखाड़े की कमान संभाल रहे महासिंह ने बताया, ‘पहले सिर्फ मिट्टी पर प्रैक्टिस होती थी, लेकिन टूर्नामेंट की जरूरतों को देखते हुए आधुनिक जिम और मैट एरिया तैयार किया गया है। जो पहलवान कामयाब हैं, वे मदद करते हैं। निजी कंपनियां भी साथ देती हैं।’ पर कोच और ट्रेनर अब भी मिट्टी को नजरअंदाज नहीं करते। ओलंपिक जा रहे चार पहलवानों में से तीन के गुरु सतपाल ने पुराना-नया वक्त देखा है। वह बताते हैं, ‘पहले हमारे गुरु विदेश नहीं जाते थे। वहां के मौसम, खानपान, ट्रेनिंग के बारे में कम पता होता था। अब तस्वीर बदल गई।’ बीजिंग ने चमकाई किस्मत दिल्ली से सटे, नोएडा के मॉर्डन स्कूल में छठी क्लास में पढ़ने वाले यश शर्मा रोज सवेरे सात बजे अपने घर से 15 किलोमीटर दूर प्रैक्टिस के लिए चंदगीराम अखाड़े पहुंचते हैं। यश सचिन तेंदुलकर या शाहरुख खान के नहीं, बल्कि सुशील कुमार के दीवाने हैं। 11 साल के यश उस बदलाव का हिस्सा हैं, जो सुशील के मेडल के बाद गरीबों के इस खेल के प्रति दिख रहा है। सुशील को शोहरत खूब मिली, पर वह घमंड में नहीं बदली। सुशील ने रसरंग से कहा, ‘परिवार और गुरुओं के संस्कार ने शोहरत को कभी सिर पर नहीं चढ़ने दिया।’ सुशील को पहलवानों का भविष्य भी बेहद उज्ज्वल दिख रहा है। उन्होंने कहा, ‘जूनियर पहलवान बढ़िया कर रहे हैं।’ आने वाले वक्त में भी हम अच्छा करेंगे। सुशील के साथी योगेश्वर दत्त दो टूक कहते हैं, ‘कुश्ती में जितने पहलवान हैं, सभी मिडल क्लास से हैं। सुशील के मेडल ने कुश्ती की तरक्की का दरवाजा खोल दिया है। जिन इलाकों से हम आते हैं, वहां के गांवों में आपको एक भी बच्च भी क्रिकेट खेलते नहीं दिखेगा, कुश्ती करते सभी दिख जाएंगे।’ इस बार कुश्ती से कम से कम तीन मेडल की उम्मीद बांधी जा रही है, जिसमें सुशील कुमार से सोने के तमगे की आस है। पिछले ओलंपिक में भारत से तीन पहलवान मैट पर थे, वहीं इस बार एक महिला रेसलर समेत पांच हैं। कुश्ती में लेडीज स्पेशल हरियाणा के छोटे से गांव अमृतपुर कलां की जूनियर नेशनल चैंपियन पूनम पवार सुबह 5 बजे प्रैक्टिस के लिए उठने से पहले ओलंपिक खेलने का सपना देखती हैं। सुशील को आइडल मानने वालीं पूनम का दावा है कि लंदन ओलंपिक के लिए भले एक महिला पहलवान ने क्वालिफाई किया हो, लेकिन अगले ओलंपिक में सभी कैटेगरी में देश की महिला पहलवान अपना दमखम दिखाएंगी। पूनम के इस ख्वाब से गीता फोगट सीधी जुड़ी हैं। लंदन में भारत की नुमाइंदगी करने जा रहीं गीता सपोर्ट के लिए अपने परिवार की तारीफ करती नहीं थकतीं। खाने में खीर-चूरमा और फिल्मी सितारों में सन्नी देओल को पसंद करने वाली गीता याद करती हैं, ‘लड़कियों को कुश्ती सिखाने के लिए पहले हमारे गांव वाले परिवार की आलोचना करते थे, लेकिन अब गांव जाती हूं, तो लोग आंखों में आंसू भरकर मुझे दुआएं देते हैं।’ पहलवान और पैसा ओलंपिक के लिए रवाना होने से पहले योगेश्वर दत्त का ईमेल आईडी पूछा गया, तो उन्हें याद नहीं था। उनके रूम में गए, तो आईपैड उठाकर हमें आईडी नोट कराया गया। आईपैड के बराबर में ही उनका आईफोन रखा था। योगेश्वर ने पुरानी स्कॉर्पियो बेचकर फॉच्यरूनर एसयूवी बुक कराई है, जल्द ही आ जाएगी। बाहर ही सुशील कुमार की एंडेवर एसयूवी खड़ी थी। यह देसी खेल के पहलवानों का नया लाइफस्टाइल है। मुफलिसी मेंदिन गुजारने के बाद अब वे भी नए जमाने के साथ चलना चाहते हैं। योगेश्वर ने कहा, ‘अगर आप कुश्ती के किसी बड़े इवेंट में मेडल ले आते हैं, तो फिर पैसे की कोई कमी नहीं है। कहीं न कहीं नौकरी भी मिल जाती है।’ शायद वह वक्त आ गया है जब हमें किसी ओलंपिक या अवॉर्ड विजेता के बदतर हालात में जिंदगी काटने और परिवार का पेट पालने के लिए मेडल बेचने जैसी खबरें पढ़ने को नहीं मिलेंगी। नरसिंह पंचम यादव ने ओलंपिक में जाने का ख्वाब देखा और पूरा कर दिखाया। नरसिंह बताते हैं, ‘मैं फिलहाल रेलवे में जूनियर टिकट चेकर हूं। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण भी मुझे मुंबई पुलिस में क्लास-1 ऑफिसर की नौकरी देने का वादा कर चुके हैं।’ नरसिंह फेसबुक पर काफी सक्रिय हैं और लगातार अपडेट देते रहते हैं। दरअसल, बीजिंग ओलंपिक के बाद केंद्र और राज्य सरकारों की आंखें भी खुली हैं। इसलिए कुश्ती, पहलवानों और अखाड़ों को आधुनिक सुविधाओं का इंतजाम करने के लिए पैसा मिलने लगा है। नेशनल रेसलिंग चीफ कोच (मेन्स) विनोद कुमार के मुताबिक सरकारें अपने-अपने स्तर पर आर्थिक मदद दे रही हैं। इसके अलावा निजी कंपनियां भी स्पॉन्सरशिप के साथ आगे आ रही हैं। बहालगढ़ से लौटते वक्त महसूस किया कि दंगल से लंदन तक का सफर जब वापस दंगल में लौटेगा, तो गले में मेडल जरूर चमकेगा। और अगर बदकिस्मती से मेडल न भी आया, तो यह निश्चित है कि बदलाव जारी रहेगा। गांवों में बसे परिवारों और नौजवानों की आंखों के सपने और इच्छाशक्ति जाग चुके हैं। और भारत में खेलों के लिए भविष्य के लिए यह बेहद जरूरी है। कुश्ती का यह कामयाब सफर लंदन से आगे भी जारी रहेगा। ओलंपिक का हमारा सफर ओलंपिक में भारत को पहला मेडल एक एंग्लो इंडियन नॉर्मन प्रिचार्ड ने 1900 में दिलाया था। आजाद भारत को व्यक्तिगत स्पर्धा में पहला मेडल कुश्ती में 1952 के हेलसिंकी ओलंपिक में मिला था। महाराष्ट्र में गोलेश्वर गांव के केडी जाधव ने कुश्ती में भारत को पहला पदक दिलाया था। लंदन ड्रीम्स लंदन ओलंपिक में भारत का अभी तक का सबसे बड़ा 126 सदस्यों का दल गया है, जिसमें 83 खिलाड़ी और बाकी कोच, ट्रेनर और सपोर्ट स्टाफ के लोग हैं। लंदन ओलंपिक में भारतीय खिलाड़ी 53 प्रतिस्पर्धाओं में मेडल के लिए चुनौती पेश करेंगे। इनसे हैं मेडल की उम्मीद: विजेंदर सिंह, मेरी कॉम (बॉक्सिंग), महेश भूपति, लिएंडर पेस, सानिया मिर्जा (टेनिस), साइना नेहवाल, ज्वाला गुट्टा (बैडमिंटन), सुशील कुमार, नरसिंह यादव (कुश्ती), अभिनव बिंद्रा (शूटिंग), दीपिका कुमारी (तीरंदाजी) पांच पहलवान, सारे बलवान सुशील कुमार उम्र: 29 साल वजन: 66 किलोग्राम अनुभव: तीसरा ओलंपिक गांव: बापरौला (दिल्ली) ‘गेम के वक्त गुस्सा आना स्वाभाविक है। हम मेडिटेशन से उसे काबू करना सीखते हैं‘ योगेश्वर दत्त उम्र: 29 साल वजन: 60 किलोग्राम अनुभव: तीसरा ओलंपिक गांव: भैंसवाल कलां, सोनीपत (हरियाणा) ‘अगर आपमें दम है और आप टॉप पर पहुंचते हैं, तो कुश्ती में भी पैसे की कमी नहीं है‘ नरसिंह पंचम यादव उम्र: 24 साल वजन: 74 किलोग्राम अनुभव: पहला ओलंपिक गांव: नीमा, बनारस (यूपी) ‘मैं दिखाना चाहता हूं कि साधारण परिवार का लड़का भी कमाल कर सकता है‘ अमित कुमार दहिया उम्र: 19 साल वजन: 55 किलोग्राम अनुभव: पहला ओलंपिक गांव: नाहरी, सोनीपत (हरियाणा) ‘खाली वक्त में पंजाबी गाने सुनता हूं। कभी-कभी फुटबॉल मैच भी देखता हूं‘ गीता फोगट उम्र: 23 साल वजन: 55 किलोग्राम अनुभव: ओलंपिक में जाने वाली पहली भारतीय महिला पहलवान गांव: बलाली, भिवानी (हरियाणा) ‘पापा ने हम बहनों को लड़कों की तरह पाला और कुश्ती के लिए प्रेरित किया‘

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