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मल में खून: तुरंत डॉक्टर की मदद लें

मल में खून आना बहुत ही आम बीमारी है और यह किसी भी उम्र के लोगों को हो सकती है।

Danik Bhaskar | Oct 06, 2012, 09:33 AM IST
डॉ. संजोय मंडल, डायरेक्टर, डिपार्टमेंट ऑफ जीआई सर्जरी, मेडिका सुपरस्पेशियलिटी हॉस्पिटल, कोलकाता मल में खून आना बहुत ही आम बीमारी है और यह किसी भी उम्र के लोगों को हो सकती है। अगर ज्यादा खून नजर आ रहा हो तो यह मरीज के लिए बहुत खतरनाक हो सकता है वहीं अगर कम खून आ रहा हो तो लोग अक्सर उसे नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन, एक बात याद रखने की है कि किसी भी हालत में इसकी अनदेखी नहीं करनी चाहिए।मल में खून आना आमतौर पर बवासीर की वजह से होता है। ज्यादातर मामलों में यह दर्द रहित होता है और खून का रंग चमकीला लाल होता है। यह मरीज के लिए बहुत खतरनाक होता है। फिशर की वजह से भी ऐसा हो सक ता है। इसमें शौच करते समय बहुत अधिक दर्द का अहसास होता है। बड़ी आंत में कैंसर और कोलाइटिस की वजह से भी मल में खून आ सकता है। अगर मल में खून आए तो तुरंत किसी डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए। अगर संभव हो तो सर्जन की क्योंकि इसमें उस जगह की आंतरिक जांच की जरूरत होती है। उसी से बवासीर या फिशर होने का पता लगता है।अगर कैंसर या कोई ट्यूमर हो, तो उसका भी पता लग जाता है। हालांकि बवासीर और फिशर बहुत आम बीमारी है, पर बड़ी आंत में कोई और दिक्कत होने से इनकार नहीं किया जा सकता है। इस तरह की कोई भी दिक्कत होने पर मरीज को एक खास तरह की जांच से गुजरना होता है जिसे कोलोनोस्कोपी के नाम से जाना जाता है। इस प्रक्रिया के तहत मरीज की आंत की सफाई की जाती है। बड़ी आंत पर नजर रखने के लिए ट्यूब जैसे एक उपकरण का इस्तेमाल किया जाता है। बवासीर और फिशर के बहुत से मरीज तो दवा से ही ठीक हो जाते हैं, लेकिन जिन मरीजों पर दवा कारगर नहीं होती है, वहां सर्जरी की जरूरत होती है। इस तरह की बीमारियों में किसी बड़ी सर्जरी की जरूरत नहीं होती है, कई बार तो इसमें मरीज को अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत भी नहीं पड़ती है। और अगर कभी ऐसा हुआ भी तो महज एक या दो दिन के लिए। कोलाइटिस के मरीजों का इलाज भी दवा से हो जाता है। विशेष परिस्थितियों में ही इसमें सर्जरी की जरूरत पड़ती है। जैसे या तो बहुत ज्यादा रक्तस्राव (ब्लीडिंग) हो रहा हो या फिर दवा असर न कर रही हो। कोलन या मलाशय के कैंसर की वजह से मल में खून आना सबसे ज्यादा चिंता पैदा करता है। कोलोन या मलाशय के कैंसर के इलाज के लिए सर्जरी जरूरी होती है। लेकिन, उसके पहले कई तरह के परीक्षण होते हैं। सर्जरी के पहले या बाद में कई मरीजों को रेडियोथेरेपी या कीमोथेरेपी की जरूरत होती है। यह कैंसर की गंभीरता पर निर्भर करता है। और इसका फैसला इलाज करने वाला सर्जन करता है। आमतौर पर लोग इस गलतफहमी के शिकार होते हैं कि मलाशय के कैंसर की सर्जरी के बाद मल त्याग के प्राकृतिक मार्ग को स्थायी रूप से हटा दिया जाता है और शरीर में एक होल बना दिया जाता है, जिसके जरिए निकलने वाला मल एक बैग में जमा होता है। जबकि वास्तविकता यह है कि बहुत कम ही मरीज ऐसे होते हैं जिन्हें इस तरह के डिवाइस की जरूरत होती है। कई मरीज ऐसे भी होते हैं, जिनके इलाज के दौरान एक अस्थायी होल बनाने की जरूरत पड़ती है और उनका मल एक बैग में जमा होता है। थोड़े दिनों के बाद उस होल को बंद कर दिया जाता है, और वे प्राकृतिक रास्ते से ही शौच करते हैं। लोगों के बीच एक और गलतफहमी यह होती है कि जब बड़ी आंत का कैंसर लिवर जैसे शरीर के दूसरे हिस्से में फैल जाता है, तो उसका मतलब है जीवन का अंत। हालांकि यह गंभीर चिंता की वजह है लेकिन सच्चई यह है कि गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल ट्रैक्ट के कैंसर के बहुत से मरीजों के उलट बड़ी आंत और कोलोन के कैंसर के बहुत से मरीज कीमोथेरेपी और सर्जरी के बाद स्वस्थ जीवन बिताते हैं। एक बात हमेशा याद रखनी चाहिए कि सभी तरह के कैंसर में मल में खून नहीं आता है और ऐसा भी नहीं है कि जिन मरीजों के मल में खून आता है, उन सभी को कैंसर से पीड़ित हैं। मल में खून आना हमेशा खतरनाक नहीं होता है, लेकिन अगर ऐसा हो तो डॉक्टर की सलाह जरूर लेनी चाहिए।