• Dementia not only amnesia?

डिमेंशिया सिर्फ भूलने की बीमारी नहीं?

डिमेंशिया भूलने की दिक्कत से अलग है। दरअसल

Sep 01, 2012, 07:41 AM IST
डॉ. विशाल छाबड़ा, विमहांस हॉस्पिटल, दिल्ली सरकारी नौकरी से रिटायर 65 वर्षीय राम गोपाल (बदला हुआ नाम) अपने मोहल्ले से करीब 10 किलोमीटर दूर सड़क पर मारे-मारे फिर रहे थे, जब पुलिस की गाड़ी ने उन्हें अस्पताल पहुंचाया। उनके कपड़े तार-तार थे। उन्हें इस बात का जरा भी इल्म नहीं था कि कहां जा रहे हैं या आखिर चाहते क्या हैं। जब राम गोपाल का परिवार उनसे मिलने अस्पताल पहुंचा, तो वह उन्हें पहचान ही नहीं पाए। उन्हें यह भी याद नहीं था कि दिन या तारीख कौन-सी है। परिवार वालों का कहना है कि तीन साल पहले तक वह भले-चंगे थे, लेकिन धीरे-धीरे उनकी याददाश्त कमजोर होने का संकेत मिलने लगा। वह रोजमर्रा की चीजें भूलने लगे। बाद में उनका व्यवहार अजीबोगरीब होता गया। वह बिना कपड़ों के बाथरूम से बाहर आ जाते, पलंग के बगल में ही पेशाब करने लगते या फिर बेवजह अचानक गुस्सा हो जाते। परिवारवालों ने यह सोचकर डॉक्टर के पास जाने की जरूरत नहीं महसूस की कि बुढ़ापे की वजह से ऐसा हो रहा है। आखिर राम गोपाल को हुआ क्या, जो तीन साल पहले तक बिल्कुल ठीक थे? क्या हम इस समस्या को शुरुआती दौर मे पहचानकर दूर कर सकते हैं? क्या हम इस तकलीफ से जूझने वाले लोगों की कुछ मदद कर सकते हैं? डिमेंशिया क्या है? डिमेंशिया भूलने की दिक्कत से अलग है। दरअसल, डिमेंशिया में हमारी सोचने-समझने की क्षमता लगातार कम होती जाती है। जबकि यही चीज प्रमुख रूप से इंसान को जानवरों से अलग करती है। आम तौर पर इस बीमारी के लक्षण धीरे-धीरे दिखते हैं और वक्त गुजरने के साथ गंभीर होते जाते हैं। यही वजह है कि ज्यादातर रिश्तेदारों की निगाह से यह बीमारी बची रहती है। मरीज अपने पति या पत्नी तक को नहीं पहचान पाता है। कई बुजुर्गो के मामले में डिमेंशिया से घिरने से पहले डिप्रेशन (अवसाद) या पागलपन से पीड़ित होने का इतिहास भी मिलता है। शुरुआती डिमेंशिया कई बार मरीज शब्द याद न आने पर उस शब्द के पर्यायवाची या उसके मतलब से काम चलाने की कोशिश करता है। नाम, अपॉइंटमेंट भूल जाता है। याद नहीं रहता कि कुछ देर पहले क्या किया है या चीजें कहां रख दी हैं। गाड़ी चलाने, खाना पकाने, घर का कामकाज या पर्सनल फाइनेंस संभालने में भी समस्या आती है। पर्सनेलिटी में बदलाव देखा जाता है। लोग समाज और परिवार से कट जाते हैं। अजीबोगरीब व्यवहार करते हैं। मूड में चंद पलों में बड़ा बदलाव आता है, फैसले करने की क्षमता घट जाती है। सभी लोगों और चीजों पर शक होना, नई जगह और हालात को लेकर कनफ्यूजन होना, कहीं ध्यान न लगना जैसी समस्याएं भी आती हैं। धीरे-धीरे स्थिति बिगड़ती जाती है। फिर बिना मदद के नहाना, खाना, टॉयलेट जाना जैसे काम नहीं होते। नींद में दिक्कत आना। रात भर जगे रहना और दिन में सोना। नया सीखने और समझने में मुश्किलें होती हैं। फैसले न कर पाने और कनफ्यूजन की वजह से गिरने या चोट लगने का खतरा होता है। आक्रामकता, विरोध, अनुचित सेक्सुअल व्यवहार देखने को मिलता है। बाहर की दुनिया में दिलचस्पी न दिखाना, खराब फोकस। अजीबोगरीब मूड, जिसमें तनाव और डिप्रेशन ज्यादा होता है। गंभीर डिमेंशिया शुरुआती और इंटरमीडिएट डिमेंशिया में दिखने वाले लक्षणों का विकराल रूप ले लेना। रोजमर्रा की चीजों को लेकर पूरी तरह से दूसरों पर निर्भर रहना। बिना मदद के कहीं आना-जाना मुमकिन नहीं। शॉर्ट और लॉन्ग टर्म मेमोरी खत्म हो जाना। बेहद करीबी रिश्तेदारों और दोस्तों को पहचानने में नाकामी। डिहाइड्रेशन, मालन्यूट्रिशन, ब्लैडर कंट्रोल के साथ समस्या, इंफेक्शन आदि। मुमकिन है कि मरीज को इन दिक्कतों के बारे में जानकारी ही न हो, खासतौर से व्यवहार संबंधी समस्याओं का पता नहीं चलता। यह बात खास तौर से डिमेंशिया के अगले दौर में होती हैं। लाइलाज डिमेंशिया के मरीजों में मेंटल फंक्शन और मूवमेंट में धीरे और लगातार गिरावट आती है। दूसरों पर पूरी तरह निर्भरता और आखिरी दौर में मौत भी हो सकती है, जिसकी वजह आमतौर पर इंफेक्शन होती है। इलाज: इलाज शुरू करने से पहले यह सुनिश्चित करना जरूरी होता है कि किस तरह का डिमेंशिया है। डिमेंशिया के सिर्फ 5 फीसदी मरीज ही ठीक हो पाते हैं। पिछले कुछ दशकों में डिमेंशिया के इलाज के लिए कई दवाएं आ गई हैं, लेकिन वे सिर्फ डिमेंशिया के बढ़ने की रफ्तार ही कुछ कम कर पाती हैं। दवाओं के अलावा परिवारवालों को भी यह सिखाना पड़ता है कि वे मरीज की किस तरह मदद कर सकते हैं। साइकोथेरेपी और अच्छी दिनचर्या भी डिमेंशिया के मरीजों को सक्रिय रखने में अहम भूमिका निभाती है।
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