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सुप्रीम कोर्ट के फैसले से भागलपुर जेल में बंद कैदियों के बीच नई उम्मीद१६ साल से राष्ट्रपति के पास लंबित है शोभित चमार का मामला
सत्य प्रकाश - भागलपुर
सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले से भागलपुर के केन्द्रीय कारा में बंद मौत की सजा पाने वाले कैदियों के बीच उम्मीद की किरण जगी है।
राष्ट्रपति के पास भागलपुर की २१ दया याचिकाएं लंबित हैं। अलग-अलग मामलों में ६ से लेकर १६ साल तक पुराने मामले लंबित हैं। जानकार भी मानते हैं कि इतने लंबे समय से लंबित दया याचिका में मौत की सजा को उम्रकैद में बदला जा सकता है। शहीद जुब्बा सहनी केन्द्रीय कारा में मौत की सजा में २१ कैदी बंद हैं। इनमें शोभित चमार की विगत १६ साल से राष्ट्रपति के पास दया याचिका लंबित है। वहीं, गया जिले के बहुचर्चित बारा नरसंहार में ३७ लोगों की हत्याकांड में मौत की सजा पाये केन्द्रीय कारा में बंद चार कैदी की याचिकाएं भी वर्ष २००४ से राष्ट्रपति के पास लंबित हैं। इन चार कैदियों में कृष्ण मोची, हाड़ो सिंह, नन्हेलाल मोची और वीर कुंवर पासवान शामिल है। तीन लोगों की हत्या में प्राणजीत सिंह का दया याचिका २००८ से लंबित है।
बदल सकती है सजा
स्थानीय वरिष्ठ वकील जयकरण गुप्ता के अनुसार भागलपुर के केन्द्रीय कारा में बंद कैदी यदि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अंतर्गत आते हैं। तो उनकी भी सजा उम्रकैद में बदली जा सकती है। वहीं एक और कानून के जानकार सत्यनारायण साह ने कहा कि देश में एक कानून हैं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले से भागलपुर के कैदियों को भी निश्चित लाभ मिलेगा। लंबित मामलों में कैदियों को तत्काल सुप्रीम कोर्ट में अपील करनी चाहिए।
फांसी से बच सकते हैं भागलपुर के 21 कैदी
राहत की उम्मीद
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से जगी आस, राष्ट्रपति के पास लंबित हैं दया याचिकाएं