सचमुच, माया महाठगिनी
पंडित भवनाथ झा
शोध एवं प्रकाशन पदाधिकारी, महावीर मंदिर, पटना
... तब मै धन का क्या करूंगी
बृहदारण्यकोपनिषद् की कथा है कि जब याज्ञवल्क्य अपनी दोनों पत्नियों में संपत्ति का बंटवारा करने लगे तो कात्यायनी अपने हिस्से में भौतिक धन-संपत्ति लेकर संतुष्ट हो गई। लेकिन मैत्रेयी ने पूछा- यदि धन-संपदा से परिपूर्ण यह सारी पृथ्वी मेरी हो जाए, तो क्या उससे मैं अमर हो जाऊंगी? याज्ञवल्क्य ने कहा- नहीं। धन से परम आनंद स्वरूप अमरता प्राप्त नहीं हो सकती है। तब मैत्रेयी ने दो-टूक जवाब दिया- तब मैं यह धन लेकर क्या करूंगी।
के राजा मिडास को धन-दौलत से बहुत प्यार हो गया था। सोना पाने की उसकी चाहत इस कदर बढ चुकी थी कि जब उससे ईश्वर ने वरदान मांगने के लिए कहा तो उसने यहीं मांग लिया कि वह जिसे छूए, वह सोना बन जाए। ईश्वर से वरदान पाकर वह खुशी से पागल-सा हो गया। लेकिन थोड़ी देर में उसकी खुशी काफूर हो गयी, जब उसने अपनी थाली का खाना सोने में बदलते देखा और प्यार से आगोश में आयी उसकी एकमात्र बेटी भी सोने की मूरत बन गयी।
यह धन के पीछे भागते लोगों की चरम परिणिति है। इसीलिए तो कबीर ने ईश्वर से विनती की कि हे स्वामी हमें इतना ही दो जिससे मेरे कुटुंबों का भरण हो सके और घर पधारनेवाले अतिथि-देवता भूखे न लौटें। यजुर्वेद के चालीसवें अध्याय ईशावास्योपनिषद् में कहा गया है कि इस संसार में जो कुछ है वह ईश्वर का है। उन्होंने हमारे लिए जो कुछ छोड़ रखा है उसी का भोग करें, दूसरे का धन नहीं लें। बौद्ध-धर्म में भी धन को हाथ का मैल कहा गया है ।
धन-दौलत वास्तव में सुख का एक साधन है। जिस तरह पढ़ाई का साधन किताब है। यदि हम धन को सुख का साधन नहीं मानकर उसे जीवन का एकमात्र लक्ष्य मानते रहें तो हमारी स्थिति भी उस विद्यार्थी की तरह हो जायेगी जो केवल किताबें जुटाने में ही अपना समय गंवा दे । आज धन बटोरने के पीछे सारी दुनियां पसीने से लथपथ भाग रही है। नतीजन सोने की सेज पर नींद नहीं आती। धन कमाने के लिए धन जुटाते हैं फिर उससे उपजा हुआ धन फिर आगे के लिए धन कमाने का साधन बन दाता है यानी साधन भी वही साध्य भी वहीं। सुख-शांति के लिए कोई जगह ही नहीं बचती है।
धन माया है, वह ठगिनी है। मरुस्थल में हिरण को दूर पानी की लहर दिखाई पड़ती है, पर जब वह वहां पहुंचता है तो उसे फिर वहां तपती रेत मिलती है, फिर सिर उठाकर देखता है तो दूर कहीं फिर वहीं मरीचिका दिखाई पड़ती है। धन-संपत्ति के पीछे दौडऩेवाले उसी हिरण की तरह तपती रेत में दम तोड़ देते हैं। इसीलिए याज्ञवल्क्य ने कहा: हे मैत्रेयी, धन से अमरता नहीं मिलेगी।
गौतम चक्रवर्ती