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निर्भया ने नहीं की प्रताडऩा की परवाह

8 वर्ष पहले
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बिलासपुर - विकलांग रहकर भी हर कठिनाइयों का सामना किया। उसका जोश व जुनून ही था जिससे वह बेहतरीन डांसर बनकर दुनिया को अपनी मुठ्ठी में किया। फिर अचानक किस्मत ने ऐसा प्रहार किया कि सब कुछ बर्बाद हो गया। दुष्कर्म की घटना ने जैसे उसे तोड़ दिया। ऐसे में न तो वह झुकी, न रुकी और न ही अपनी हिम्मत को टूटने दिया। एक दिन उसने अपना नाम दुनिया में मशहूर कर दिया। आदर्श कला मंदिर ने देवकीनंदन दीक्षित सभा भवन में ‘निर्भया’ के संघर्ष की कहानी का बखूबी मंचन किया।
नाटक में नारी सशक्तिकरण की मुखरता, नारी जागरण को बढ़ावा, अन्याय के प्रति जन आक्रोश की प्रेरणा, एक विकलांग युवती का जुनून प्रदर्शित किया गया है। नाटक में दिखाया गया है कि एक सभ्य परिवार की लड़की, जो अपंग है, किंतु नृत्य में कुशल है। अपनी मेहनत और कौशल के दम पर वह राष्ट्रीय पहचान बनाने के लिए शिखर की ओर बढ़ रही है। इसी बीच में एक बिगड़ा व असभ्य युवक उसे अपनी हवस का शिकार बना लेता है। दुष्कर्म से पीडि़त युवती का परिवार मानसिक पीड़ा से गुजरता है। युवती निर्भीक होकर वीरांगना की तरह लड़ते हुए सफलता प्राप्त करती है। और एक दिन प्रताडऩा की परवाह न करते हुए वह ‘निर्भया’ बनकर दुनिया में अपना नाम कर प्रेरणा हासिल करती है।

यह नाटक बुराई पर अच्छाई की जीत दिखाती है। नाटक में कथानक सुंदर था। संगीत नाटक के अनुरूप था, लेकिन निर्देशक भरत वेद का निर्देशन काफी कमजोर दिखा। निर्देशक ने अपने साथ-साथ कलाकारों के साथ भी अन्याय किया। नाटक को और अच्छा बनाया जा सकता था। कलाकारों के आपसी तालमेल पूरे ड्रामा में कहीं नहीं दिखा। ड्रामा में लड़की अपंग थी, उसकी अपंगता कहीं नहीं दिखी। नाटक में ऋषिका, भुवनेश्वर, दिग्विजय, जावेद आदि ने अपने अभिनय
से तालियां बटोरी।