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स्वभाव व व्यवहार में संतुलन ही जीवन प्रबंधन: पं. मेहता

8 वर्ष पहले
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भास्कर न्यूज - बिलासपुर
जीवन प्रबंधन गुरु पं. विजयशंकर मेहता का कहना है कि संसार में हर मनुष्य अशांत है। व्यक्ति के पास सुख है, मगर शांति नहीं। जीवन जीने की दो शैलियां ‘व्यवहार व स्वभाव’ हैं। आमतौर पर लोग व्यवहार में जीते हैं, यही वजह है कि विकास के बाद भी वे मानसिक रूप से असंतुष्ट व अशांत रहते हैं। जबकि स्वभाव में जीने वाले व्यक्ति का विकास होने के साथ ही उसे आत्मसंतुष्टि व शांति भी मिलती है। वर्तमान में कोई भी व्यक्ति किसी एक शैली के साथ नहीं जी सकता। अत: दोनों में संतुलन जरूरी है। यही जीवन प्रबंधन का मूल रहस्य है।
खंभारडीह सरगांव स्थित आश्रम में कमलात्मिका महायज्ञ व संत समारोह में पं.मेहता ने सुंदरकांड पर व्याख्यान देते हुए जीवन प्रबंधन के सूत्र बताए। उन्होंने रामचरित मानस के बाल कांड, अयोध्या कांड, अरण्य कांड, किष्किंधा कांड, सुंदर कांड, लंका कांड, उत्तरकांड का संक्षिप्त व्याख्यान किया। उन्होंने सुंदरकांड पर चर्चा करते हुए जीवन प्रबंधन में चार सूत्र- दास्य भक्ति, प्रेम भक्ति, अनंत भक्ति व निष्कपट भक्ति बताए। जिसके आधार पर ही उन्होंने मां सीता की खोज में सफलता प्राप्त की थी। अतुलित बल के स्वामी होने के बाद भी हनुमंत में घमंड नहीं था। उनमें समुद्र लांघने की शक्ति होने के बाद भी तब तक आगे नहीं आए जब तक जामवंत ने उन्हें इसके लिए प्रेरित नहीं किया। उन्होंने कहा कि कोई काम असंभव नहीं होता, आत्मविश्वास व ईश्वर की भक्ति के सहारे असंभव काम भी संभव हो जाते हैं। हनुमान में आत्मविश्वास के साथ ही श्रीराम की सच्ची भक्ति थी। उन्होंने कहा कि जीवन में चाहे कितनी भी कठिनाई क्यों न आए हमें हिम्मत नहीं हारना चाहिए। हनुमान जी जब समुद्र लांघने लगे तो उनके सामने अनेक बाधाएं आईं। इसी बीच सुरसा नाम की राक्षसी से उनका सामना हुआ। हनुमान जी ने विनम्रता व चतुरता से सुरसा के मुख में प्रवेश कर निकलते हुए न केवल उसका मान रखा, बल्कि अपने चातुर्य का भी परिचय दिया।


रविवार को भी पं. मेहता का व्याख्यान होगा। इस अवसर पर बाल योगी संत रामजी नीमच, मध्यप्रदेश, प्रीतम महाराज सुजालपुर बृज क्षेत्र, महामंडलेश्वर सोमानंद नीमच,ब्रह्मानंद सरस्वती कोल्हापुर, जगतगुरु निंबकाचार्य, बाल संत मोहन शरण, देवाचार्य महाराज सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल थे।




जीवन प्रबंधन कैसे...

जीवन प्रबंधन के सूत्र बताते हुए पं. मेहता ने कहा कि हमें हमेशा सत्य बोलना चाहिए। सत्य भगवान की प्रार्थना के समान है, जिसे सुन भगवान शीघ्र प्रसन्न होते हैं। इसके साथ ही सत्य के साथ चलने से कम परिश्रम में अधिक लाभ की प्राप्ति होती है। सत्य बोलने वाले व्यक्ति को याद नहीं रखना पड़ता कि उसने कब क्या बोला था। उन्होंने कहा कि हमें घमंड कभी नहीं करना चाहिए, क्योंकि घमंड संबंधों को जोड़ता नहीं तोड़ता है। कभी किसी की निंदा नहीं करनी चाहिए। निंदा करना भगवान की कृति को अपमानित करना है। इससे छुटकारा के लिए जरूरी है कि जो व्यक्ति सामने न हो उसकी बात ही न की जाए। जीवन प्रबंधन के लिए नित्य भक्तिजरूरी है। इसके अंतर्गत सूर्य देव को अघ्र्य, तुलसी को जल अर्पित करना, गौ सेवा, पूजा-अर्चना, ग्रंथ पाठ, माता-पिता व दिवंगत पूर्वजों का अभिवादन व प्रतिदिन मंदिर जाना शामिल है। जीवन में मौन साधना भी जरूरी है। इससे हमें सकारात्मक ऊर्जा मिलती है।