शिक्षाकर्मी को छोड़ ६१ को किया सस्पेंड
भास्कर न्यूज - बिलासपुर
सहेली शाला बंद होने के बाद भी खाते से एक करोड़ रुपए निकालने के मामले में जिला पंचायत सीईओ ने 32 शैक्षिक समन्वयकों और 29 सहेली शाला प्रभारियों को निलंबित कर दिया है। यह कार्रवाई भाई-भतीजावाद से ग्रसित नजर आ रही है। वजह यह कि जांच रिपोर्ट में दोषी ठहराए गए जिला स्तरीय अफसरों को बचाने की कोशिश की गई है। तत्कालीन एपीसी ((वित्त)) अखिलेश तिवारी पर कार्रवाई के लिए प्रकरण शासन को भेजा गया है, जबकि वह शिक्षाकर्मी है। तिवारी पर कार्रवाई जिला स्तर पर होनी है। इसी तरह शाखा प्रभारी व लेखापाल के खिलाफ भी कोई कार्रवाई नहीं हुई। जिला पंचायत सीईओ नीरज बंसोड ने एक साथ 61 कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई करके प्रशासनिक व्यवस्था में भूचाल ला दिया है। 32 शैक्षिक समन्वयक एवं 29 सहेली शाला प्रभारी को एक साथ सस्पेंड किया गया है। शेष पेज - १९
दैनिक भास्कर ने यह मामला उजागर किया था। सीईओ की कार्रवाई में भी कई तरह की खामियां नजर आईं। निलंबन की गाज सिर्फ मैदानी अमले पर ही गिरी है, जबकि जिला मुख्यालय में पदस्थ अफसरों को बचा लिया गया है। गड़बड़ी की जांच के लिए गठित तीन सदस्यीय कमेटी ने तत्कालीन डीपीसी एसपी पांडेय, एपीसी वित्त अखिलेश तिवारी, शाखा प्रभारी, लेखापाल के अलावा मैदानी अमले के बीआरसी कोटा, पेंड्रा और तखतपुर की भूमिका संदिग्ध बताई गई। इसी तरह 36 सहेली शाला प्रभारियों को दोषी बताया गया। जांच रिपोर्ट के निष्कर्ष में भी इन दोषियों पर कार्रवाई की अनुशंसा की गई। इधर जिला पंचायत सीईओ ने इस मामले में कार्रवाई तो की है, लेकिन आधी-अधूरी। इसे लेकर कर्मचारियों में आक्रोश देखा जा रहा है।
दैनिक भास्कर में प्रकाशित खबरें।
32 शैक्षिक समन्वयकों व 29 सहेली शाला प्रभारी किए गए सस्पेंड
डीपीसी और एपीसी पर आरोप
जांच रिपोर्ट के मुताबिक राज्य परियोजना कार्यालय में 28 जून 2013 को हुई बैठक में एसपी पांडेय और अखिलेश तिवारी शामिल हुए थे। यहां मिशन संचालक ने सहेली शाला बंद होने की जानकारी के साथ इस मद की राशि राज्य परियोजना कार्यालय के खाते में जमा कराने के निर्देश दिए थे। इस जानकारी को प्रचारित करने के बजाय ब्लाक एवं संकुल स्तर पर 31 मार्च से 1 जुलाई 2013 की स्थिति में जमा राशि का विवरण मांगा। जांच दल के समक्ष उक्त तारीख के बाद राशि निकालने के कई मामले सामने आए, जिस पर जिला स्तरीय अधिकारियों की भूमिका को संदिग्ध बताया गया। शेष पेज - १९
कार्रवाई पर उठते सवाल
ञ्च तत्कालीन एपीसी वित्त अखिलेश तिवारी को रिपोर्ट में दोषी ठहराया गया है तो फिर उसके खिलाफ निलंबन की कार्रवाई जिला स्तर पर क्यों नहीं हुई। अराजपत्रित होने पर भी कार्रवाई की अनुशंसा मिशन संचालक रायपुर से क्यों की गई।
ञ्च जांच रिपोर्ट में शाखा ((सहेली शाला)) प्रभारी को दोषी बताया गया है, तो फिर उसके खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की गई।
ञ्च जांच रिपोर्ट में लेखापाल की भी भूमिका संदिग्ध बताई गई है तो फिर इन पर कार्रवाई क्यों नहीं।
ञ्च रिपोर्ट में बीआरसी कोटा, पेंड्रा, तखतपुर और मस्तूरी की भूमिका संदिग्ध बताई गई, तो फिर दो बीआरसी पर ही कार्रवाई क्यों।
ञ्च रिपोर्ट में 36 सहेली शाला प्रभारी की भूमिका संदिग्ध बताई गई तो फिर 31 के खिलाफ ही कार्रवाई क्यों।
जांच के निष्कर्ष
ञ्च सहेली शालाओं को विलंब से राशि जारी करने के लिए तत्कालीन डीपीसी, शाखा प्रभारी एवं लेखापाल दोषी हैं।
ञ्च योजना बंद होने की सूचना के बाद भी ब्लाकों से भ्रामक जानकारी मंगाने व राशि वापसी की पहल न करने के लिए तत्कालीन डीपीसी एसपी पांडेय और तत्कालीन एपीसी वित्त अखिलेश तिवारी की भूमिका संदिग्ध है।
ञ्च सहेली शाला प्रभारी एवं संकुल समन्वयकों को राशि खर्च करने के मौखिक निर्देश देने में बीआरसी कोटा, पेंड्रा, तखतपुर की भूमिका संदिग्ध है।
ञ्च सहेली शाला की शेष राशि बैंक ड्राफ्ट से एक बार कलेक्टर एवं मिशन संचालक बिलासपुर के नाम पर बनवाने और उसे निरस्त कर पुन: मिशन संचालक रायपुर के नाम से बनवाने सहित राशि को अपने पास रखने के मामले में सहयोग के लिए बीआरसी मस्तूरी और एपीसी वित्त अखिलेश तिवारी की भूमिका संदिग्ध है।
ञ्च अनियमित रूप से खर्च कर फर्जी प्रमाणक लगाने और जांच के बाद राशि वापस कर देने के कारण 36 सहेली शाला प्रभारी की भूमिका संदिग्ध है।
शिक्षाकर्मी का मामला शासन को भेजा
सहेली शाला में गड़बड़ी पर गिरी निलंबन की गाज