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अमेरिका से आकर शहर में संस्कृत पढ़ रहा गूगल का इंजीनियर

7 वर्ष पहले
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बिलासपुर. जिस देश में हिंदुस्तारी भी हिंदी बोलने में शर्म महसूस करते हैं, वहां का इंजीनियर संस्कृत की शिक्षा लेने के लिए अपने देश आया है। हम बात कर रहे हैं कर्नाटक के विश्वास वासुकी की। विश्वास गूगल के इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट में इंजीनियर हैं। वे अमेरिका के कैलिफोर्निया से तीन महीने की छुट्टी लेकर सात समंदर पार सिर्फ इसलिए आए हैं कि पाणिनीय व्याकरण की शिक्षा ले सकें।

विश्वास की लगन देखकर पाणिनीय शोध संस्थान के अन्य शिष्यों में भी उत्साह बढ़ गया है। बदलते परिवेश में युवाओं का रुझान पश्चिमी सभ्यता की ओर हो चला है। खासकर विदेशों में अंग्रेजी बोलना स्टेटस सिंबल माना जाता है। ऐसे में विश्वास वासुकी की ललक संस्कृत की ओर है। 2007 से कैलिफोर्निया में गूगल इंजीनियरिंग में इंजीनियर विश्वास का उद्देश्य विदेश में रहने वाले हिंदुस्तानियों के बीच संस्कृत का प्रसार करना है। उनका रहन-सहन, खानपान, वेश-भूषा इतने वर्षों बाद भी भारतीय संस्कृति के अनुरूप है।

कन्नड़भाषी होने के बाद भी उन्हें संस्कृत से काफी लगाव है। यही वजह है कि उन्होंने वेद-पुराणों की गूढ़ता को विश्व स्तर तक ले जाने का बीड़ा उठाया है। वे बताते हैं, पहले उन्हें सिर्फ कन्नड़ व अंग्रेजी आती थी। अमेरिका में जाने के बाद उन्हें यह देखकर दुख हुआ कि वहां रहने वाले भारतीय, भारतीयता भूलते जा रहे हैं।

भारतीयता का पाठ पढ़ाना लक्ष्य

विश्वास ने बताया कि अमेरिका में हर व्यक्ति को विश्व की कोई एक विदेशी भाषा सीखना अनिवार्य है। रशियन, जैपनिज, चाइनीज, रोमन आदि भाषाओं की ओर लोगों का रुझान तो जाता है, लेकिन हिंदी या संस्कृति भाषा की ओर नहीं। विदेशी तो दूर वहां रह रहे हिंदुस्तानी भी हिंदी या संस्कृत बोलने में शर्म महसूस करते हैं। यह बात उन्हें तकलीफ देती है। वे वहां रह रहे भारतीयों को वेद-पुराण व गीता के जरिए भारतीयता का पाठ पढ़ाएंगे।

विश्वास वासुकी

...इसलिए सीख रहे पाणिनीय का व्याकरण

विश्वास कहते हैं, विश्व के सर्वश्रेष्ठ ग्रंथों, वेद-पुराण व गीता आदि की वास्तविक लिपि संस्कृत है। संस्कृत व्याकरण काफी प्रामाणिक व समृद्ध होने के साथ ही कठिन भी है। इसके बिना ग्रंथों को पूरी तरह समझ पाना मुश्किल है। यही वजह है कि उन्होंने हिंदी के साथ संस्कृत का अध्ययन शुरू किया, पाणिनीय व्याकरण अब सीख रहे हैं। पाणिनीय शोध संस्थान की जानकारी उन्हें इंटरनेट से मिली थी।

संस्कृत हर भारतीय भाषाओं की जननी है। इस भाषा के विलुप्त होने से देश की संस्कृति व सभ्यता भी विलुप्त हो जाएगी। हर भारतीय को इस भाषाई ज्ञान को सहेजने, संवारने की जरूरत है। विश्वास की लगन से अन्य विद्यार्थियों का भी भरोसा व उत्साह बढ़ा है।
- डा. पुष्पा दीक्षित, पाणिनीय शोध संस्थान