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आचार्य शुक्ल ने ठुकराई नौकरी

8 वर्ष पहले
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घटना उन दिनों की है जब हिंदी साहित्य के प्रथम इतिहासकार आचार्य रामचंद्र शुक्ल बनारस में रहते थे। नागरी प्रचारिणी सभा में क्रहिंदी विश्वकोषञ्ज का काम देखते थे। इस काम के लिए आचार्य शुक्ल को पच्चीस रुपए मासिक दिए जाते थे। एक बार आचार्य शुक्ल के एक मित्र उनसे मिलने आए। बातों-बातों में जब मित्र महाशय ने शुक्लजी का वेतन जाना तो वे बोले, क्रबंधु! यह तो काफी कम है। आपकी योग्यता तो राजदरबार के लायक है। मैं अलवर महाराजा के काफी निकट हूं। आपकी नौकरी के लिए उनसे बात कर लेता हूं।ञ्ज शुक्लजी अनिच्छुक थे, लेकिन मित्र के प्रबल आग्रह के समक्ष उन्हें झुकना पड़ा। मित्र ने उन्हें चौदह सौ रुपए मासिक पर अलवर राजदरबार में लगा दिया। उस जमाने में चौदह सौ रुपए आज के तीस हजार रुपए के लगभग थे। वेतन के अनुरूप रहने के लिए आचार्य शुक्ल को शानदार कोठी मिली और सवारी के लिए घोड़ा गाड़ी भी। अलवर में इस राजसी ठाठ-बाट से आचार्य शुक्ल तीन दिनों में ही ऊब गए। उन्होंने देखा कि वहां के सभी कर्मचारी महाराज की चापलूसी में लगे रहते हैं और अपना काम बनाते हैं। वस्तुत: वहां बने रहने के लिए यह चापलूसी अनिवार्य योग्यता थी, जो शुक्लजी के वश की बात नहीं थी। चौथे ही दिन वे बिना किसी को कुछ कहे-सुने बनारस लौट आए और पुन: अपनी पच्चीस रुपए मासिक वाली नौकरी करने लगे। उन्होंने अपने मित्र को एक पत्र लिखकर अपना स्वभाव और राजदरबार की प्रतिकूलता के विषय में स्पष्ट रूप से बता दिया। स्वाभिमानी व्यक्ति अपने परिश्रम के बल पर अपनी आजीविका कमाता है। किसी की चाटुकारिता के सहारे जीवन यापन उसके लिए असहनीय होता है।




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