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8 की जगह एक डाक्टर, शौच के लिए खुला मैदान
नवापारा राजिम. सर्वोच्च संविधान में आम आदमी की मूलभूत आवश्यकताओं एवं सुविधाओं के लिए उल्लेखित कानून अफसरशाही एवं लूटखसोट के बाजार में किस तरह सिसककर दम तोड़ रहा है इसका प्रत्यक्ष उदाहरण किसी भी संस्था में देखने पर पता चल जायेगा।
स्थानीय सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र में 8 विशेषज्ञ डॉक्टरों के स्वीकृत पद की जगह सिर्फ एक ही डॉक्टर कार्यरत है। कभी यहां दो या उससे अधिक डॉक्टर तो देखे ही नहीं गये। इसी तरह साफ स्वच्छ पेयजल मुहैया कराने के शासकीय दावे में भागीरथी नल-जल योजना पूरे ब्लाक में कहीं भी सफल नहीं है। कहीं पाइप लाइन का विस्तार आड़े आ रहा है तो कहीं पानी की कमी। नगर की प्रस्तावित जल आवर्धन योजना की लागत 9 वर्षों में चार गुना बढ़ गई। और तो और शौच के लिए ग्रामीण आबादी आज भी खुले मैदान पर आश्रित है।
अस्पताल में निचले दर्जे के कर्मियों की तो बात ही छोडि़ए। बहुत ही सीमित प्राथमिक उपचार में लगने वाली दवाएं मरहम पट्टी के अलावा इस अस्पताल को कभी कुछ नहीं मिला।
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हमेशा ही गंभीर मरीजों के लिए रिफर सेंटर बन कर रह गया है। कई दशकों की मांग के बाद 5 वर्ष पूर्व स्वीकृत भवन अभी निर्माणाधीन है। पूरे वर्ष के दौरान इस केन्द्र में जननी सुरक्षा योजना के तहत 25 शिशुओं ने जन्म लिया। वहीं बीपीएल परिवार की 25 प्रसूताओं ने अपने घर में शिशु को जन्म देकर जननी सुरक्षा योजना का लाभ लिया। अस्पताल के एक जिम्मेदार ने बताया कि यहां के सभी संसाधन स्वास्थ्य संबंधी सुविधाएं एवं मैनपावर विकासखंड स्थित स्वास्थ्य केन्द्र में उपयोग में लाये जा रहे हैं।
फाइलों में चल रहे अभियान : केन्द्र और राज्य सरकार की शिक्षा योजनाओं की जितनी भद्द यहां पिटी और उसमें जितनी सेंधमारी हुई उतनी कहीं देखने को नहीं मिलती। ब्लाक के सभी स्तर के स्कूलों में स्टाफ की कमी के साथ किसी तरह शिक्षाकर्मियों एवं अतिथि प्राध्यापकों से शैक्षणिक कार्य संपन्न कराया जाता है। शिक्षाकर्मियों में वेतन विसंगति महीनों वेतन अप्राप्त होने के साथ अन्य मूलभूत सुविधाओं के प्रति हमेशा नाराजगी देखी जाती है। बाल श्रमिक की संख्या सरकारी आंकड़ों में कुछ तो हकीकत कुछ और ही बयां करती है। होटल ढाबों में काम करते बाल श्रमिक कहीं भी देखे जा सकते हैं। सर्व शिक्षा अभियान, राजीव गांधी शिक्षा मिशन, माध्यमिक शिक्षा अभियान ऐसे कितने अभियान हैं जो फाइलों में चल रहे हैं।
राशन का ठिकाना नहीं : बीपीएल कार्डधारियों में महिलाओं को परिवार का मुखिया बनाने के बाद इसमें इतने पेंच आ गए हैं कि सिर्फ नगर में ढाई हजार अवैध राशन कार्डों की जांच विभाग के लिए सरदर्द बना हुआ है। शासन द्वारा पूरे प्रदेश में 2014 बंधुआ मजदूर लिस्टेड किए गए हैं। जिन्हें बीपीएल योजना के तहत राशन मिलना चाहिए लेकिन इस नगर में ही 2088 बंधुआ मजदूर दर्ज किए जाकर वे राशन के हकदार बनने के दावे के साथ खड़े हैं।
शौच के लिए आज भी खुला मैदान : ग्रामीण क्षेत्रों की योजनाओं में सबसे बुरी स्थिति उन निर्मल ग्रामों की है जो बीते पांच वर्षों में निर्मल ग्राम घोषित होकर राष्ट्रपति से सम्मानित हो आए। इन ग्रामों की आबादी आज भी लोटा एवं प्लास्टिक की बोतल में पानी लेकर शौच के लिए सूना एवं खाली मैदान तलाशती है। घरों में बने शौचालय छेना व लकड़ी रखने के काम आ रहे हैं। ग्राम उत्कर्ष योजना ग्रामीण महिलाओं को प्रशिक्षित करने वाले सिलाई केन्द्र, बाल आश्रम, श्रम विभाग के अधीन कर्मकार कल्याण बोर्ड की विभिन्न लाभकारी योजनाएं फाइलों में कैद हैं।