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माताओं के कंठ से गायब हुई लल्ला-लल्ला लोरी

7 वर्ष पहले
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लोरी की मधुर गूंज अब सुनाई नहीं देती। बदलते वक्त के साथ गुम हो रही।

भूपेन्द्र पटवा - धमतरी

बदलते वक्त के साथ हमारी संस्कृति भी गुमनाम होती जा रही। हममें से कई लोग मां की लोरी सुनकर बड़े हुए हैं, लेकिन आजकल लोरियों की आवाज सुनाई तक नहीं देती। माताएं लोरियां भूल चुकी हैं, इससे शहरी व ग्रामीण दोनों क्षेत्र प्रभावित हुआ है। माताओं का रुझान टीवी सीरियल की ओर बढ़ा, वहीं बच्चे मोबाइल से जुड़ रहे हैं।

पहले बच्चों को सुलाते वक्त माताएं पारंपरिक लोरियां गाती थी। माताएं ही नहीं दादी, नानी भी माथे पर हाथ फेरकर सुनाती थी, या चुप कराती थी। आजकल की माताएं लोरी ही भूल गई हैं। बदलते वक्त के साथ मां व बच्चे का रुझान ही बदल गया। पहले के फिल्मों में भी लोरियां देखने-सुनने को मिलती थी। आज घरों में गंूजने वाली लोरियां ढूंढे नहीं मिलेंगी। इस कड़वे सच को समाजशास्त्री भी स्वीकार कर रहे हैं। कहीं सुनने मिल जाए तो बहुत बड़ी बात कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी।

मानसिक विकास संभव

पीजी कॉलेज की प्रोफेसर एवं मनोवैज्ञानिक डा. सरला द्विवेदी का कहना है कि लोरी शांत धुन या शांति देने वाली होती है। फिल्मी गीत या मोबाइल में मेंटल ब्रेन तरंगे होती हैं। लोरी में अल्फा वेव्स आती है, जो शांति की अवस्था में निकलती है। बीटा वेव्स मस्तिष्क में हलचल उत्पन्न करती हंै। ये फिल्मी गाने लोरी में टच थैरेपी का काम करती है। लोरी का मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी पड़ता है। यह नया वातावरण समायोजन करने में मदद करता है। बच्चा जितनी गहरी नींद में सोता है, मानसिक विकास उतना ही ज्यादा होता है, इसलिए लोरी ज्यादा प्रभावशील होता है। बच्चा मां से लोरी सुनता है तब उसे सकारात्मक ऊर्जा मिलती है, जो व्यक्तित्व विकास के लिए जरूरी है।

स्पर्श अनुभव कराता है

पीजी कॉलेज की प्रोफेसर एवं समाजशास्त्री डा. अनिता राजपुरिया ने बताया कि लोरी संबंधों को प्रगाढ़ता प्रदान करता है, स्पर्श अनुभव कराता है, इससे परिवार से जुड़ाव बढ़ता है। आज की माताओं के पास समय नहीं है। लोरी उन्हें याद है, लेकिन वे विकल्प ढूंढती हैं। कभी टीवी, रेडियो चालू कर देती है या मोबाइल में गाना लगाकर छोड़ देती है। हां इतना जरूर है कि जो नैसर्गिक बात लोरी में होती है वह टीवी, मोबाइल आदि में नहीं मिल सकती।

धमतरी. बच्चे हुए मोबाइल के कायल।

धमतरी. वक्त के साथ खो रही लोरी। आज की अधिकांश माताओं को याद नहीं पारंपरिक लोरी। गिनती के दादी-नानी ही बच्चों को सुना रहीं लोरी।

मोबाइल की लत

आज हर हाथ में मोबाइल है। बड़ों के साथ बच्चे भी अछूते नहीं है। बच्चों की तो मानो जान अटक गई हो। आजकल के बच्चे मोबाइल में फिल्मी गाना सुन नींद पा रहे। घरों के लोग रोते बच्चे को मोबाइल थमा देते हैं। हाथ में मोबाइल आते ही बच्चा चुप भी हो जाता है। कई छोटे बच्चे खुद से मोबाइल चालू कर गाना लगा लेते हैं। शहरी बच्चे मोबाइल से ज्यादा जुड़े हैं।

लल्ला-लल्ला लोरी, दूध की कटोरी

सो जा मेरे लाडले

चंदा मामा दूर के पुए पकाए पूर के

चंदा हे तू मेरा सूरज है तू

आ री आ निंदिया

मेरे घर आई एक नन्हीं परी

छोटी सी प्यारी सी नन्हीं सी, आई कोई परी



थमी इनकी गंूज





बच्चे रोते हैं तो थमा देते हैं मोबाइल, लोरी का है मनोवैज्ञानिक महत्व, व्यक्तित्व विकास के लिए भी जरूरी, अधिकांश माताएं भूल चुकी हैं लोरी