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बस्तर का इतिहास जानने खुदाई जरूरी

7 वर्ष पहले
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बस्तर इतिहास और पुरातत्व विषय पर शोध सार संक्षेपिका का विमोचन के साथ ही राष्ट्रीय संगोष्ठी शुरू, नई जानकारी और अध्ययन के नए आयाम खुलने का दावा किया।
भास्कर न्यूज - जगदलपुर
राष्ट्रीय संगोष्ठी में बस्तर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. एनडीआर चंद्रा ने कहा कि बस्तर के आदिवासी जंगलों में रहकर भी \\\'यादा आनंदित हैं। उनके पास केयर-फ्री जीवन है और वे प्रकृति के \\\'यादा करीब हैं। इससे वे \\\'यादा ही सुकून महसूस करते हैं। उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि चंद्रा ने कहा किइस संगोष्ठी में बस्तर के इतिहास, संस्कृति और साहित्य की जानकारी और समझ के साथ नए आयाम खुलेंगे। उत्खनन और अन्वेषण के जरिए प्रमाणिक और नई जानकारी हासिल करेंगे। प्राचीन बस्तर को आधुनिक जीवन से जोड़ सकें, यह एक चुनौती के रुप में स्वीकार करना होगा।
संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए छत्तीसगढ़ शासन के पुरातात्विक सलाहकार एके शर्मा ने स्टोन एज ऑफ बस्तर का नए सिरे से सर्वेक्षण करने की आवश्यकता प्रतिपादित की। यहां एनीमल फॉसिल्स भी बहुत मिलते हैं। बस्तर में प्रमाणिक तथ्यों और ऐतिहासिकताओं को संदर्भित करते हुए एक बेहतर पुरातत्व संग्रहालय स्थापित किए जाने की आवश्यकता बताई। उन्होंने बस्तर के विभिन्न हिस्सों में खुदाई पर जोर दिया और इसके लिए राशि की उपलब्धता सुनिश्चित करने की बात कही। इसके लिए बस्तर विश्वविद्यालय को आगे आना चाहिए। बस्तर के पहले भी खुदाई हो चुकी है। गढ़धनोरा में खुदाई की गई लेकिन इसका संरक्षण नहीं हुआ। जिससे यह ऐतिहासिक धरोहर नेस्तनाबूद हो गया है। सिरपुर में खुदाई हुई है, इसके साथ ही मणिपुर और नागालैंड में भी उत्खनन हुए हैं और वहां पर सबकुछ सहेज कर रखा गया है। खुदाई उतनी ही होनी चाहिए जितनी संरक्षित कर रखा जा सके।
डॉ हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर के सारस्वत अतिथि प्रो. व्हीडी झा ने कहा कि उन्होंने बस्तर में उस समय काम किया है जब यहां सड़कें नहीं थीं। बस्तर में अध्ययन -अन्वेषण की दिशा में एक वैक्यूम रहा है। उन्होंने बस्तर के इतिहास और पुरातत्व में बस्तर -स्टोन एज पर काम किया था। बस्तर के घोटुल आदिवासी समाज की रीढ़ रहे हैं।यह सामाजिक विकास और नैतिक शिक्षा का प्रमुख केंद्र रहा है।
कालांतर में सभ्यता से घोटुल प्रभावित हुआ है। युवा अपनी संस्कृति को न भूलें। यहां नक्सल समस्या सामाजिक आर्थिक समस्या के रुप में है। बस्तर के इतिहास और इसका कोई सीधा प्रभाव नहीं है।
वरिष्ठ पुरातत्ववेत्ता डॉ केके झा ने कहा कि ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में आदिवासी जनजीवन की धार्मिकता का बस्तर के इतिहास और संस्कृति में विशेष महत्व है। उन्होंने गदबा और गोंड के हजारों साल पूर्व के इतिहास को रेखांकित किया। इसी प्रकार हल्बा और धुरवा समुदाय के लोगों के जीवन वृतांत और उनकी बस्तर में बसाहट के संदर्भ में अपना वक्तव्य दिया।