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संस्कारों से बनी है भारतीय संस्कृति : बालकदास

8 वर्ष पहले
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बेमेतरा - महात्यागी बालकदास ने बीजाभाट में धर्म मंच से वर्ण व्यवस्था पर बल दिया। उन्होंने इस व्यवस्था को भारतीय संस्कृति का परिचायक बताया। मनुष्य जन्म से शूद्र होता है विभिन्न संस्कारों के बाद वर्ण व्यवस्था का अधिकारी बनता है।
ब्राह्मण भी शूद्र होता है वह यज्ञोपवीत संस्कार के बाद ब्राह्मण पद का अधिकारी बनता है। उन्होंने समाज में व्याप्त बुराई के परिप्रेक्ष्य में भेदभाव, छुआछूत की बातों को नकारते हुए कहा कि यह समाज के ही कुछ लोगों द्वारा भ्रांति फैलाने का चक्रव्यूह रचा जा रहा है जो कभी पूर्ण होने वाला नहीं है। भगवान राम ने केंवट को गले लगाया, गुरु विशिष्ट जी ने उसे स्थान दिया। शास्त्र में भी कहीं इस बात का उल्लेख नहीं है। यज्ञ व पूजन में सभी का अधिकार है। जब वह तन, मन व शरीर से शुद्ध है। समाज के लोगों को मिलकर रहने व एक ही माला में पिरोने का अभिनव प्रयास इस महायज्ञ में किया जा रहा है। सर्वे भवंतु सुखिन:, सर्वे भवंतु निरामय: सर्वे भद्राणि पश्यंतु, मां कश्चित दु:ख भाग भवेत। का सूत्र हम सबके लिए सुखद है। मानव 16 संस्कारों को विधि सम्मत पूर्ण कर मानवता को प्राप्त करता है। जो संस्कारित है वही अमरत्व को प्राप्त करता है। संस्कार से ही भारतीय सभ्यता व संस्कृति बनी हुई है जो विश्वसनीय है।
उन्होंने कहा कि पूरा विश्व भारत को धर्म गुरु मानता है हमारी प्राचीन संस्कृति की एक अलौकिक मान्यता है। आज गांव गांव में नवधा रामायण का आयोजन होता है। उस धर्म के मंच में लोग मांस खाकर एवं मदिरा सेवन कर रामचरित मानस की व्याख्या करने बैठते हैं जो आध्यात्मिक दृष्टि से दोषपूर्ण एवं विनाशकारी है।