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अमत्र्य सेन का अर्थशास्त्र इस समय सही नहीं है

8 वर्ष पहले
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पिछले कुछ हफ्तों से इस बात पर बहस हो रही है कि विकास पर जोर दिया जाए या आय के पुनर्वितरण पर। कोलंबिया यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्री जगदीश भगवती और अरविंद पनगरिया विकास को समर्थन दे रहे हैं। वहीं, दूसरी ओर नोबेल पुरस्कार विजेता अमत्र्य सेन पूरे जोर-शोर से दोषपूर्ण खाद्य सुरक्षा विधेयक का पक्ष ले रहे हैं।
हकीकत तो यह है कि विकास और आय के पुनर्वितरण में कोई बड़ा विरोधाभास नहीं है। विकास और सरकारी राजस्व को बढ़ाए बगैर आप गरीबों की मदद नहीं कर सकते; गरीबों की मदद नहीं की तो विकास नहीं होगा, बल्कि एक सामाजिक संकट खड़ा हो जाएगा। इसे हम एक उदाहरण से भी समझ सकते हैं: मान लीजिए आप एक गरीब किसान है, जिसके पास खुद के लिए काफी कम अनाज है। यदि उसने पूरा अनाज खा लिया तो बाद में भूखा रहना पड़ेगा, क्योंकि अगली फसल के लिए बीज ही नहीं रहेंगे। यदि उसने पूरा अनाज बुवाई के लिए रख लिया तो अगली फसल आने तक उसकी मौत हो चुकी होगी।
यहां सवाल यह नहीं है कि उसे अनाज खाना चाहिए या नहीं। बल्कि सवाल तो यह है कि उसे कितना अनाज खाना चाहिए और कितना अगली फसल के लिए बीज के तौर पर रखना चाहिए। इस नजरिए में अमत्र्य सेन पूरी तरह गलत नजर आते हैं।
देश के सामने समस्या यह है कि विकास मंद पड़ा है। रुपया गिर रहा है। सरकारी राजस्व बुरी स्थिति में है। ऐसे में प्राथमिकता में विकास होना चाहिए, ताकि भविष्य में गरीबी पर हमले के लिए संसाधन तैयार किए जा सके। इसके अलावा, हालात इतने भी खराब नहीं है कि सरकार गरीबों को भोजन उपलब्ध न करा सके। खाद्य सब्सिडी और मनरेगा के खर्च के तौर पर सरकार के पास गरीबों को भोजन देने के लिए पर्याप्त राशि है - एक लाख 20 हजार करोड़ रुपए।
समस्या यह है कि इसमें से कम से कम आधी राशि तो भ्रष्टाचार, चोरी और अन्य नुकसानों में चली जाती है। जो पैसा गरीबों तक पहुंचना चाहिए, वह उन तक पहुंचता ही नहीं है। अमत्र्य सेन का जोर बेकार जा रहे पैसों पर नहीं है, बल्कि वे तो चाहते हैं कि खाद्य सुरक्षा में और पैसा डाला जाए ताकि \\\'यादा पैसा बेकार हो जाए।
योजना आयोग के मुताबिक देश में 22 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा से नीचे रहती है। जो करीब 26 करोड़ है। अब यदि सरकार इन लोगों का जीवन-स्तर उठाने के लिए प्रति व्यक्ति सालाना चार हजार रुपए दे तो भी 1 लाख 4 हजार करोड़ रुपए खर्च होगा। यह राशि उनकी मौजूदा आय के अतिरिक्त होगी। लेकिन, हम तो गरीबी मिटाने के लिए इससे भी \\\'यादा पैसा खर्च कर रहे हैं। हम तो इसका दायरा बढ़ाते हुए 67 प्रतिशत आबादी को सस्ता अनाज देना चाहते हैं। वह भी ऐसे समय में, जब अर्थव्यवस्था मंद पड़ी है और कई अन्य आर्थिक सूचकांक भी ठीक नहीं है। जब सरकार का अपना आकलन कहता है कि देश की 22 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा से नीचे है तो 67 प्रतिशत आबादी को रियायती अनाज क्यों देना?
स्पष्ट है कि 55 करोड़ लोग गरीब नहीं है और उन्हें रियायती दर पर अनाज देना, चुनावी वर्ष में उनके वोट खरीदने जैसा है। अमत्र्य सेन एक महान अर्थशास्त्री हो सकते हैं, लेकिन वे सही सोच रहे हैं, ऐसा कोई नहीं मान सकता। वे गलत समय पर गलत विचार का समर्थन कर रहे हैं। इस समय सभी के लिए हालात खराब है। ऐसे में गरीबी हटाने के नाम पर सरकार की वोट खरीदने की कोशिश को समर्थन देना अमत्र्य सेन जैसे हाई-प्रोफाइल अर्थशास्त्री की गैर-जिम्मेदारी दिखाता है। यदि अर्थव्यवस्था की हालत बिगड़ी तो गरीब ही सबसे \\\'यादा भुगतेंगे। इस समय बेहतर होगा कि इस मामले में हम सेन को नहीं बल्कि भगवती की सुने।
-लेखक आर्थिक मामलों के वरिष्ठ पत्रकार,
द्घद्बह्म्ह्यह्लश्चशह्यह्ल.ष्शद्व के एडिटर और डीएनए के पूर्व एडिटर हैं।
ह्म्द्भड्डद्दड्डठ्ठठ्ठड्डह्लद्धड्डठ्ठञ्चस्रड्डद्बठ्ठद्बद्मड्ढद्धड्डह्यद्मड्डह्म्द्दह्म्शह्वश्च.ष्शद्व