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हे गौमाता दुर्गा मंदिर में आयोजित रामकथा

8 वर्ष पहले
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नगर संवाददाता - रायपुर
जहां सत्यता के साथ भक्ति होती है वहां पर परमात्मा अवश्य प्रकट होते हैं, यह केवल कही गई बातें नहीं है बल्कि यह प्रामाणिक सत्य है जो भक्तों के जीवन में दिखाई होता है। किसी प्राणी पर दया करना अच्छी बात है लेकिन उस प्राणी से मोह नहीं होना चाहिए। अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन द्वारा भनपुरी स्थित हे गौमाता दुर्गा मंदिर में आयोजित रामकथा में कथावाचक अतुल कृष्ण भारद्वाज ने भगवान श्रीराम के जन्म प्रसंग पर ये बातें कहीं।
उन्होंने कहा कि यदि भक्ति सच्ची है और भक्त उसी सच्चे भक्ति और विश्वास के साथ जब परमात्मा को पुकारता है तो परमात्मा स्वयं प्रगट होते हैं। प्रहलाद के पुकारने पर खंबे से और सती के पुकारने पर धरती से प्रकट हुए। सती होना धर्म है, सती बनना धर्म का आभास है और सती बनाया जाना अपराध है।
वर्तमान समय में सत्य विलोम होते जा रहा है, गलती करने के बाद भी लोग अपनी गलती स्वीकार नहीं करते। किसी आयोजन में बिना बुलाए नहीं जाना चाहिए चाहे फिर वह पिता का घर क्यों न हो। दक्ष ने भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया और सजी जी पिता के घर बिना बुलाए पहुंची और उन्हें
अपमानित होना पड़ा, इसी अपमान में वे सती हो गईं। मृत्यु से घबराने की आवश्यकता नहीं है जब शिव की कृपा होती है तो काल भी दूर भाग जाता है।

मान और अपमान में कैसे सहज रहना चाहिए यह शिवजी मनुष्य को बताते हैं, वे अपमान में न क्रोधित होते हैं और न ही मान में उन्हें अभिमान होता है, गलती स्वीकार किए जाने पर वे कृपा करते हैं।
महाराज ने कहा कि मनुष्य की अंतिम समय में जैसे मन में उसके विचार होते हैं और जैसी उसकी स्मृति होती है उसी के अनुरूप उसे गति प्राप्त होती है। जन्म होने का भी कारण होता है, प्रारब्ध की रेखाएं बदलने का सामथ्र्य किसी देवता व संतों में नहीं है, भगवान शिव में वह सामथ्र्य है कि वे रेखाएं बदल सकते हैं लेकिन इसके लिए सच्चे मन से उनकी भक्ति प्राप्त करनी पड़ती है। एक दिन में भगवान का सुमिरन या कीर्तन करने से अंतिम समय में भगवान का नाम मुख पर आएगा ऐसा संभव नहीं है। निरंतर केवल और केवल भगवान का स्मरण और चिंतन आवश्यक है। भले ही कार्य चाहे जो भी कर रहे हो।



परमात्मा केवल सत्य से ही प्रगट होते हैं : अतुल कृष्ण