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गुनाहों का देवता को भले लड़कियां पढ़ें, पर यह खास उपन्यास नहीं: खरे

7 वर्ष पहले
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सिटी रिपोर्टर रायपुर
देवदास पर सिनेमा में फिल्में बन जाना कोई साहित्य का सिनेमा से अंतर्संबंध नहीं है। मैं तो देवदास को साहित्यक कृति ही नहीं मानता। यह तो टिपिकल रूमानी नॉवेल है। गुनाहों का देवता ((धर्मवीर भारती)) हो या यह देवदास, दोनों ही साहित्य के मानकों पर खरे नहीं उतरते। इन्हें लड़कियां पढ़ती हैं, तो पढ़ा करें।
यह कहना है देश के स्थापित मूर्धन्य साहित्यकार और आलोचक विष्णु खरे का। श्री खरे डिग्री गल्र्स कॉलेज में आयोजित सिनेमा और साहित्य के अंतर्संबंध पर मुख्य वक्ता के रूप में बोल रहे थे। इस कार्यक्रम में पूर्व डीजीपी और साहित्यकार विश्वरंजन भी बतौर वक्ता शामिल हुए। कार्यक्रम में भूलनकांदा उपन्यास के लेखक संजीव बख्शी, फिल्म मेकर मनोज वर्मा, रमेश अनुपम, आदि मौजूद रहे।
नहीं हैं उपन्यासों पर ज्यादा फिल्में
श्री खरे कहते हैं, कि बॉलीवुड में 100 में से बमुश्किल 2 ही फिल्में किसी साहित्यक उपन्यास पर बनती होंगी। इनमें भी
एकाधिक अंग्रेजी साहित्य पर बनती है, जबकि हिन्दी के उपन्यासों में कई सारे बदलाव करने पड़ जाते हैं। इस पर विवाद तो हैं ही।




 डिग्री गल्र्स कॉलेज में आयोजित व्याख्यान में हिंदी के आलोचक व साहित्यकार विष्णु खरे।

नहीं बनाते फिल्में



जटिल है हमारा समाज

साहित्य पर फिल्में बनें, जरूर बनें। लेकिन क्या हम इसके लिए तैयार हैं। साहित्य पर फिल्में पूरी जैसी की तैसी स्क्रिप्ट पर बनने लगें तो सेंसर की देहलीज पर ही दम तोड़ दें। चूंकि हम ऐसे समाज में रह रहे हैं, जहां पर दिन रात गालियों, अश्लील बातों से रूबरू होते हैं, नहीं होना चाहते तो बस फिल्मों में। हमें फिल्मों में नंगापन खराब लगता है या हम सिर्फ यही देख पाते हैं। वास्तविक जीवन में नहीं। ऐसे विडंबनाएं हैं, तो कैसे साहित्य अपने संपूर्ण और खूबसूरत रूप में सिनेमा के साथ जुगलबंदी कर पाएगा।

श्री खरे ने कहा कि हम सामाजिक हकीकतों को फेस करते हैं, पर उसे परदे पर नहीं स्वीकार पाते। साहित्य में यह आजादी है, बताइए कौन सा सिनेमा साहित्य जैसी सत्यता को पेश कर सकता है। हमारा सामाजिक तानाबाना है ही ऐसा कि सिनेमा सेंसर की ही भेंट चढ़ जाता है। क्या कभी प्रेमचंद के नाटक करबला पर फिल्म बनाई जा सकती है या अमीर खुसरो के एक शेर जिसमें उन्होंने हजरत निजामुद्दीन को अपनी माशूका का दर्जा दिया था, पर कभी कोई फिल्म बनाने की हिम्मत कर सकता है।



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