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झीरम घाटी के 2 घायलों को 7 माह बाद भी नहीं मिली सहायता राशि
भास्कर न्यूज - रायगढ़
मई 2013 में झीरम घाटी में हुई नक्सली वारदात के दो घायलों को घटना के सात माह बाद भी राज्य सरकार से सहायता राशि नहीं मिल पाई है। इसमें एक पूर्व पीसीसी अध्यक्ष नंद कुमार पटेल का ड्राइवर भी शामिल है।
झीरम घाटी नक्सली हमले के प्रत्यक्षदर्शी घटना के बाद से घोर मानसिक प्रताडऩा और भयावह परिस्थिति से जूझ रहे शहीद नंदकुमार के ड्राइवर दशाराम सिदार ने बताया कि उसे केन्द्र सरकार की ओर से 50 हजार रुपए की सहायता राशि तो मिल गई परंतु राज्य सरकार द्वारा घोषित सहायता राशि 50 हजार रुपए अब तक तक अप्राप्त है। इसकी जानकारी कई बार संबंधितों को दी गई, मगर कोई असर नहीं हुआ। अब तो हम लोग सहायता राशि के लिए किसी से कुछ कहने में भी संकोच हो रहा है । झीरम घाटी के नक्सली हमले में दाएं पैर में गोली लगने से गंभीर रूप से घायल हुए नंदेली निवासी निकेतन दास महंत ने बताया कि वह अत्यंत गरीब परिवार का सदस्य है, जो शहीद नंदकुमार पटेल के निजी ड्राइवर के बतौर काम कर रहा था नक्सली हमला ने निकेतन दास के परिवार को तोड़कर रख दिया है। एक तरफ वह कई दिनों तक अस्पताल में भर्ती रहने के दौरान कुछ भी काम नहीं कर पाया और उसके परिवार के सामने भूखे मरने की नौबत आ गई, वहीं इलाज में भी काफी खर्च आया। राज्य शासन ने कलेक्टोरेट रायगढ़ के संबंधित शाखा में सहयोग राशि के बारे में पूछने पर कोई निर्देश या किसी प्रकार पत्र नहीं मिलने की बात कही जा रही है । झीरमघाटी के जिस नक्सली हमले की घटना ने प्रदेश के सरथ देश को झकझोर कर रख दिया था। उस घटना के प्रत्यक्षदर्शी एवं भुक्तभोगी रहे लोगों से उनकी पीड़ा को समझने और आंसू पोछने की आज किसी को फुर्सत नहीं, सब अपने कामों में व्यस्त हो गए हैं। परंतु शासन की ओर से घायल लोगों को मरहम के तौर पर मिलने वाली पचास-पचास हजार रू. की सहायता राशि की घोशणा को भी राज्य सरकार इस प्रकार भूल जाएगी इसकी कल्पना किसी को नहीं थी। गरीब परिवार से जुड़े ड्राइवर और जवानों को सरकारी सहायता मिलने से आर्थिक कठिनाई दूर होती, परंतु प्रशासनिक अधिकारियों की अनदेखी के चलते घायलों का भरोसा अब शासन पर
नहीं रहा।
जब सहायता देना ही नहीं है तो सरकार के इस प्रकार की घोशणा का औचित्य क्या है यह सत्ताधिषों को ही जवाब देना चाहिये।