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शंख-कोयल जोन में बढ़ रहा माओवादियों का प्रभाव
भास्कर न्यूज - जशपुरनगर
नक्सलियों के शंख-कोयल जोन में बीते कुछ सालों से माओवादियों का प्रभाव बढ़ रहा है। बताया जाता है कि माओवादी संगठन को मजबूत करने के लिए लेवी वसूली पर अधिक जोर दे रहे हैं। इस जोन में झारखंड के बहुत बड़े हिस्से के अलावा जशपुर जिले के कुछ हिस्से भी शामिल हैं।
नक्सली संगठनों खासकर माओवादियों का अपनी गतिविधियों के संचालन के लिए एक प्रशासनिक ढांचा होता है। इस ढांचे में सबसे ऊपर पोलित ब्यूरो होता है। उसके बाद सेंट्रल कमेटी और रीजनल कमेटी होती है। रीजनल कमेटी अलग-अलग भागों में कार्य करती है। जिसमें स्टेट कमेटी, डिविजनल कमेटी एवं एरिया कमेटी होती है। इसके बाद और नीचे अलग-अलग कमेटियां कार्य करती हैं।
सभी कमेटियों के कार्य और दायित्व अलग-अलग होते हैं। शंख-जोन कमेटी का गठन बीआरसी ((बिहार रीजनल कमेटी)) के अंतर्गत है। जशपुर की सीमा से लगने वाले झारखंड के गुमला, सिमडेगा जिले के अलावा लोहरदगा, खुंटी सहित जशपुर जिले के लोदाम, आरा व दुलदुला के कुछ हिस्से शंख-कोयल जोन में हैं। साथ ही बलरामपुर जिला भी इसी जोन में आता है। दक्षिणी शंख-कोयल जोन में झारखंड के लातेहार, पलामू, गढ़वा, महुआटांड़, बरवाडीह, गारू, नेतरहाट, खेलारी पाइंट सहित अन्य हिस्से आते हैं। इन क्षेत्रों के बड़े वर्ग किलोमीटर में माओवादियों का प्रभाव है। समय के साथ-साथ माओवादियों का प्रभाव भी इन क्षेत्रों में बढ़ा है।
क्या कहते हैं पुलिस कप्तान
एसपी जितेंद्र सिंह मीणा ने कहा कि ग्रामीण अंचल के ढांचे में पैठ बनाने के मजबूत नेटवर्क चाहिए। इस बात को समझते हुए 2006 में आरा चौकी पर हुए नक्सली हमले के बाद तात्कालीन एसपी अकबर राम कोर्राम ने ग्रामीण अंचल में नेटवर्क मजबूत किया था। उसके बाद जिला पुलिस व सीआरपीएफ ने अपने कार्यों से जिले के ग्रामीण अंचल में बेहतर नेटवर्क बनाया हुआ है। सीमावर्ती गांवों में समय-समय पर हेल्थ कैंप, खेल सामग्री वितरण कार्यक्रम एवं सुरक्षा बलों का ग्रामीणों से लगातार संपर्क से ग्रामीणों का विश्वास पुलिस पर बढ़ा है। जिससे सूचनाएं देने में ग्रामीण झिझकते नहीं। इसलिए माओवादी या अन्य नक्सली संगठन यहां अपना नेटवर्क नहीं जमा पाए हैं। जबकि पड़ोसी सीमा से लगे झारखंड के क्षेत्र में नक्सलियों की अच्छी पैठ है। वे वहां ब्लॉक मुख्यालय तक पहुंचकर बड़ी घटना को अंजाम दिए हैं।
1993 में शुरू हुआ था प्रभाव
जशपुर जिले के पड़ोसी जिले झारखंड के गुमला में माओवादियों का प्रभाव 1993 से शुरू हुआ था। इसके बाद पीएलएफआई संगठन करीब 2002 से सक्रिय हुआ। यह संगठन पहले जेएलटी ((झारखंड लिब्रेशन टाइगर)) के नाम से जाना जाता था। बताया जाता है कि लगभग 2007 में दोनों संगठनों ने दक्षिणी जोन कमेटी बनाई। इधर, माओवादी जिले से लगने वाले झारखंड के एरिया में लगातार किसी न किसी घटना को अंजाम देकर अपना प्रभाव लगातार बढ़ाने में लगे हैं।
गश्त करते सेना के जवान
छोटे-छोटे दस्तों
में घूम रहे हैं
अभी कुछ महिनों से हालांकि माओवादी बड़ी घटना को अंजाम नहीं दिए हैं। बताया जाता है कि विधानसभा चुनाव के पहले से माओवादियों की गतिविधियां झारखंड में छोटे-छोटे दस्तों में ही देखी गई है। जबकि जशपुर जिले में उनकी उपस्थिति केवल एक स्थान से दूसरे स्थान पर आने-जाने के दौरान ही रही है।
बीते साल दो घटनाओं
को दिया अंजाम
अभी माओवादी केवल धमकी देकर लेवी वसूली की घटना को अंजाम दे रहे हैं। माओवादियों ने बीते साल जिले की सीमा से लगे झारखंड के गुमला जिले में दो बड़ी वारदातों को अंजाम दिया था। बीते साल अप्रैल में माओवादी नक्सलियों ने चैनपुर थाना के सिविल जंगल में 5 पुलिसकर्मियों की हत्या कर दी थी। इस घटना के दूसरे ही दिन नक्सलियों ने वहां के थाने पर हमला किया था।
जशपुर जिले में पैठ
बनाने में नाकाम
जशपुर जिले के सीमावर्ती क्षेत्रों में अपनी पैठ बनाने के लिए एमसीसी एवं पीएलएफआई दोनों ही संगठन लगातार प्रयासरत हैं। पर सुरक्षा बलों की मुस्तैदी के कारण अभी तक दोनों ही संगठन जिले में पैठ नहीं बना सके हैं। हालांकि झारखंड व छत्तीसगढ़ के सीमावर्ती गांवों में इनकी आमद-रफ्त होती रहती है। वहीं गुमला जिले में एमसीसी व पीएलएफआई के बीच वर्चस्व की लड़ाई चल रही है, जिसमें कई लोगों की जानें भी जा चुकी हैं।