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अनाचार के दोषी को 7 साल की सजा, 10 हजार जुर्माना

8 वर्ष पहले
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भास्कर न्यूज.जशपुरनगर
दिल्ली में निर्भया कांड के समय ही जशपुर जिले के आस्ता ग्राम के पास आस्ता निवासी एक आरोपी ने जिला मुख्यालय के एक 10 वीं कक्षा की छात्रा का अपहरण कर उसके साथ दुष्कर्म किया था। मामले में निर्णय सुनाते हुए जिला एवं सत्र न्यायधीश द्वारा आरोपी को सात साल के सश्रम कारावास के साथ 10 हजार के अर्थ दंड से दंडित किया गया है। न्यायालीन सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक ग्राम गोवारू आस्था निवासी आरोपी रूपेश सिंह पिता गुलाब सिंह शिबक होने के साथ ही ठेकेदारी का भी काम करता था। गत सात जनवरी 2013 को जिला मुख्यालय से घर लौटने के दौरान आरोपी रूपेश सिंह ने जिला मुख्यालय में एक छात्रावास में रहने वाली कक्षा दसवीं की ग्राम खड़कोना निवासी छात्रा को लिफ्ट देने के नाम से अपने मोटरसाइकिल पर बैठाया।
वह आस्ता के बस स्टैंड जाना चाहती थी, लेकिन नियत स्थान पर बाइक न रोककर आरोपी ने घने जंगल की ओर तेज बाइक चलाते हुए ले गया और एक नाले के पास नाबालिग छात्रा के साथ अनाचार किया। घटना को अंजाम देने के बाद आरोपी छात्रा को जशपुर के बस स्टैंड में छोड़ दिया और किसी को बताने पर उसे जान से मारने की धमकी दी।पीडि़ता बस स्टैंड से पैदल चलकर छात्रावास पहुंची और अपनी सहेली को घटना के बारे में बताया। डर से छात्रा ने घटना की जानकारी किसी अन्य को नहीं दी। सात फरवरी को जब छात्रा फिर से अपने गांव जा रही थी, तब आरोपी उसे फिर दिखा और उसने पीडि़ता का पीछा किया। दूसरी बार घटना के डर से वह बस स्टैंड से वापस छात्रावास भाग आई और छात्रावास की अधीक्षिका को पूरी घटना के बारे में बताया, जिसके बाद अधीक्षिका के साथ उसने थाने में रिपोर्ट दर्ज कराया।
प्रकरण में सभी पक्षों पर सुनवाई करते विशेष सत्र न्यायधीश रविशंकर शर्मा ने प्रकरण में धारा 363, 366 ((क)), 506 बी का प्रमाणित होना नहीं पाया, लेकिन आरोपी को धारा 376 के तहत दोषी पाए जाने पर सात वर्ष के सश्रम कारावास से दंडित किया है। विशेष न्यायधीश ने अपने निर्णय में कहा है कि यदि आरोपी के द्वारा अर्थ दंड के संदाय में व्यतिक्रम किया जाता है, तो उसे 6 माह के अतरिक्त सश्रम कारावास भुगताया जाए। न्यायालय में मामले में दंडित अर्थदंड की राशि पीडि़त के पिता को विधिवत प्रक्रिया अपनाकर अदा करने के आदेश दिए हैं।




संकोची होते हैं जनजाति

छात्रावास के नाबालिग जनजातीय छात्रा के साथ हुए अनाचार के इस मामले को विशेष मामला का दर्जा दिया गया, जिसमें यह बात भी उठी कि मामले की रिपोर्ट देर से दर्ज कराई गई। इस मामले में विशेष न्यायधीश ने सर्वोच्च न्यायालय के न्यायदर्शन का उदाहरण देते हुए कहा कि प्रकरण को देखने से स्पष्ट है कि पीडि़ता आदिवासी अंचल के पिछड़े क्षेत्र की है, जो अनुसूचित जनजाति की सदस्या है। स्वभाव से आदिम जाति, अनुसूचित जनजाति संकोची और अपने पर होने वाले शोषण व अपराधों पर त्वरित और उग्र प्रतिक्रिया नहीं करते हैं। पुन:बालात्संग के प्रकरण में पीडि़ता का स्वत: का चरित्र एवं भविष्य दांव पर लगा होता है और भारतीय परिस्थितियों में कोई भी लड़की या महिला अपने चरित्र पर लांक्षण बर्दाश्त नहीं कर पाती है। इसलिए पीडि़ता का अंर्तेंदों से उबरकर अभियुक्त के विरूद्ध वैधानिक कार्रवाई हेतु प्रथम सूचना प्रतिवेदन दर्ज कराए जाने में हुआ विलंब सामान्य प्रतीत होता है और मात्र यह कारण ही प्रकरण के प्रार्थी के कथनों की विश्वसनीयता को प्रभावित नहीं करता है।और न ही उसके द्वारा बताए गए घटना क्रम को असत्य बनाता है।