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घरों की खूबसूरती बढ़ाने वालों के पास ही नहीं है अपना घर

7 वर्ष पहले
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भास्कर न्यूज - जांजगीर

एक तरफ सुविधाभोगी वर्ग और अधिक आधुनिक होता जा रहा है, वहीं दूसरी ओर एक वर्ग ऐसा है जिनकी जिंदगी फुटपाथ पर ही मूर्तियां बनाते गुजर रही है। यह वर्ग खानाबदोश की जिंदगी जीने मजबूर है। न तो स्थाई घर है और न ही कारोबार। आज यहां तो कल कहीं और इनका डेरा होता है।

सरकार चाहे जितनी भी नई योजना लागू कर ले, पर इस वर्ग के लिए शायद किसी भी सरकार के पास कोई योजना नहीं है। मूर्ति बनाने वाले परिवार से जुड़े बच्चों को भी परिजनों के काम में हाथ बंटाते हुए देखा जा सकता है। यानि शिक्षा-दीक्षा और भरण-पोषण के अभाव में एक नया खानाबदोश समूह तैयार हो रहा है। बारिश का मौसम समाप्त होते ही अलग-अलग क्षेत्रों में राजस्थान व मध्यप्रदेश के अलावा कुछ अन्य स्थानों से आए लोगों का तंबू चौक-चौराहों में लग जाता है। हाथ में कला होने के बावजूद खानाबदोश अपनी रोजी-रोटी की जुगाड़ में हाड़तोड़ मेहनत करते नजर आ रहे हैं। कड़ी मशक्कत के बाद उन्हें दो जून की रोटी नसीब हो रही है। यह हाल सिर्फ शहरी क्षेत्र में ही देखने को नहीं मिलता, बल्कि ग्रामीण क्षेत्र में भी देखा जा सकता है।

दीगर राज्य ही नहीं अपितु प्रदेश के ही कुछ हिस्सों के लोग खानाबदोश की जिंदगी जी रहे हैं। ऐसा ही एक परिवार अभी पिछले सप्ताह भर से शहर के कचहरी चौक के पास फुटपाथ पर डेरा डाला हुआ है। ये लोग प्लास्टर आफ पेरिस की मूर्ति बनाकर बेचने का काम कर रहे हैं। दीगर राज्यों में पूरे 8-9 महीने कमाने खाने के बाद होली के समय यह परिवार वापस अपने गांव पहुंचता है।

कचहरी चौक के पास फुटपाथ पर डारा डेला



अलग योजना

की जरूरत

खानाबदोश जीवन जीने वाले परिवार के बच्चों को शिक्षा दीक्षा मिल सके, इसके लिए अलग से योजना की जरूरत है। वास्तव में ऐसा परिवार साल के 8 माह दीगर क्षेत्र में चला जाता है। ऐसे में परिवार के बच्चों को घर में रहकर पढ़ाई करना मुश्किल होता है। घूम-घूमकर जीविकोपार्जन की वजह से वे स्कूल तक नहीं पहुंच पाते। खास बात यह है कि ऐसे बच्चों के सामने शासन की ओर से दी जाने वाली मुफ्त शिक्षा का भी कोई औचित्य नहीं है।



होती है स्कूल

जाने की इच्छा

ऐसे बच्चों के मन को टटोले जाने से कहीं न कहीं उनकी लालसा स्पष्ट हो जाती है। राजस्थान के पाली मूर्ति बनाने शहर के कचहरी चौक के पास फुटपाथ पर पिछले सप्ताह भर से आए हुए परिवार में शामिल 12 वर्षीय लक्ष्मी नामक बालिका से चर्चा की गई, तो न पढ़ पाने की टीस उसके चेहरे से साफ झलक उठी। उसने बताया कि उसके दो और भाई बहन हैं। उन्हें भी अन्य बच्चों की तरह स्कूल जाने की इच्छा तो होती है, लेकिन खानाबदोश जिंदगी व परिवार की आर्थिक स्थिति इसके आड़े आ जाती है। हालांकि परिवार के बड़े सदस्य से चर्चा करने पर उसने बच्चों को स्कूल जाने लायक होने पर घर में छोड़े जाने का जिक्र किया।





पढऩे की उम्र में बच्चे कर रहे जीतोड़ मेहनत, सप्ताह भर से शहर के कचहरी चौक में डाला है डेरा, घर न होने की वजह से घूम- घूम कर काम करना है मजबूरी