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सिटी सरकार-!-कई पार्षद मालामाल, बाकी सब ठन-ठन गोपाल
भास्कर न्यूज.अम्बाला सिटी
महापौर व पार्षदों की मानें तो नगर निगम चलाने के लिए सरकार ने एक रुपया भी नहीं दिया। महापौर को निगम की ओर से कोठी के लिए 15000 रुपए भत्ते के रुप में 5000 रुपए और पेट्रोल के लिए भी लगभग 5000 रुपए मिलते हैं। इस लिहाज से अपनी नगर निगम महापौर पर करीब 2 लाख खर्च कर चुकी है। इसी प्रकार पार्षदों को हर महीने भत्ते में 2500 रुपए मिल रहे हैं। अब तक पार्षदों पर 3 लाख से ज्यादा खर्च हो चुके हैं। बैठकों पर जो खर्च होता है वह अलग है। अब सवाल यह है कि यह राशि आई कहां से। जाहिर सी बात है कि यह जनता का पैसा है। पार्षद खुद कह रहे हैं कि वे नगर निगम से असंतुष्ट हैं। उनके पास विकास कार्य के लिए पैसा नहीं है। कुछ पार्षद इसलिए संतुष्ट हैं क्योंकि सिटी के विधायक वही वरदहस्त हैं। उन्हीं के फंड से विकास कार्य हुए हैं। दुखी वे पार्षद हैं जो विधायक के करीब नहीं हैं या फिर विपक्ष में हैं। कुल मिलाकर यह नगर निगम लोगों पर ही भारी पड़ रही है।
एकजुटता का अभाव
शहर व कैंट के कई वार्डों में विकास कार्य न होने का एक कारण यह भी है कि पार्षदों में एकजुटता नहीं है। जनता ने बड़ी उम्मीदों के साथ अपना प्रतिनिधि चुना था। अब जनता व पार्षद दोनों दुखी हैं। सवाल यह है कि वार्डों का विकास कैसे होगा। जनता को इससे सरोकार नहीं है कि किस पार्षद की विधायक से बन रही है। उसे सिर्फ विकास चाहिए।
आरटीआई में मांगूंगी कितना विकास करवाया
वार्ड-10 की पार्षद हरदीप कौर कहती हैं कि 7 महीने बीत जाने के बावजूद उनके वार्ड में एक ईंट तक नहीं लगी। सिर्फ 100 स्ट्रीट लाइटों का लालीपॉप दिया था। उनमें से भी आधी खराब हो चुकी हैं। निगम के अब तक के कामकाज में मैं पूरी तरह असंतुष्ट हूं। मैं आरटीआई के जरिए निगम अधिकारियों से पूछूं गी की कितना विकास करवाया है।
3 करोड़ के विकास हुए
वार्ड-11 के पार्षद दिलीप चावला बिटटू निगम से बेहद खुश हैं। चावला के मुताबिक उनके वार्ड में करीब 3 करोड़ रुपए के विकास कार्य हो चुके हैं। दो ट्यूबवेल लग चुके हैं। कई सड़कें बन चुकी हैं। नाले-नालियों के निर्माण का भी काम हो रहा है। सफाई के लिए भी पर्याप्त कर्मचारी मिल चुके हैं। बचे काम भी हो जाएंगे।
25 से ज्यादा सड़कें बनी
वार्ड-1 की पार्षद सोनिया रानी भी नगर निगम की कार्यशैली से संतुष्ट हैं। उन्होंने बताया कि 7 महीने में उनके वार्ड में 3 करोड़ रुपए से ज्यादा के विकास कार्य हो चुके हैं। सीवरेज डल चुका है। पानी की पाइपलाइन भी बिछ चुकी है। 25 से ज्यादा सड़कें बन चुकी हैं। सफाई पर्याप्त हो रही है। विधायक विनोद शर्मा के फंड से ही पूरा काम हो रहा है।
4 दिन का काम 4 महीने में हो रहा
वार्ड-7 के पार्षद दलजीत सिंह भाटिया भी नगर निगम कर्मचारियों से बेहद दुखी हैं। उन्होंने कहा कि वार्ड में विकास तो हुआ लेकिन दिक्कतें बढ़ रही हैं। छोटे काम के लिए लंबा इंतजार करना पड़ रहा है। कर्मचारी जानबूझकर छोटे कार्यों को लटका रहे हैं। इससे जनता भी बेहाल हो रही हैं। इस स्थिति से मैं खुश नहीं हूं।
अफसरों को हुआ फायदा
वार्ड-8 के पार्षद हरीश शर्मा ने कहा कि नगर निगम बनने का फायदा अफसरों को हुआ। जनता को तो मुसीबतें ही मिली हैं। मेरे वार्ड में अब तक जीरो विकास हुआ है। निगम में मनमर्जी चल रही है। अफसर उनकी नहीं सुन रहे। मैं तो दुखी हूं साथ में जनता भी दिक्कतें झेल रही हैं। मुझे मालूम नहीं कि हमारे साथ ऐसा बर्ताव क्यों हो रहा है।
चुनाव लड़कर दुखी हूं
वार्ड-17 के पार्षद सुरेंद्र बिंद्रा ((डब्बू)) ने कहा कि वह तो पार्षद का चुनाव लड़कर ही पछता रहे हैं। वार्ड का दायरा बड़ा हो गया। विकास हो नहीं रहा। टैक्स लेने के लिए कर्मचारी आ जाते हैं। काम करने के लिए कोई नहीं आता। कोई सफाई नहीं करता। लोगों के काम नहीं हो रहे। जानबूझकर उन्हें परेशान किया जा रहा है।
लावारिस हो गए गांव
वार्ड-14 के पार्षद जसबीर जस्सी ने कहा कि निगम की हद में आए गांव लावारिस हो गए हैं। वहां विकास के नाम पर एक ईंट तक नहीं लगी। न वहां सफाई हो रही है। न ही सड़कें बन पाई। स्ट्रीट लाइट भी बदहाल है। ग्रामीण भी निगम अधिकारियों से दुखी हैं। मैं खुद परेशान हूं। तभी तो टैक्स को लेकर विरोध बढ़ रहा है।
अफसर हमें पहचानते भी नहीं
वार्ड-15 की पार्षद स्वर्ण कौर कहती हैं कि अफसर तो उन्हें पहचानते तक नहीं। विकास के मामले में मेरा वार्ड सबसे पिछड़ा है। कोई काम नहीं हो रहा। न सफाई हो रही है न ही कोई सड़क बन पाई। लोग भी हम से नाराज होने लगे हैं। इसका दुष्प्रभाव आने वाले चुनावों में पड़ेगा। कांग्रेस के नाम पर लोग वोट नहीं देंगे।
काम मुश्किल हो गया
वार्ड-18 के पार्षद परमिंद्र पाल सिंह परी ने बताया कि तत्कालीन डीसी केएम पांडुरंग ने विकास को गति देने के प्रयास किए थे। वे उनके वार्ड में भी आए थे। कुछ विकास होने लगा था लेकिन उनके जाते ही काम ठप हो गया। नए डीसी को अभी समय लगेगा। निगम कर्मियों से हाथ जोड़कर काम करवाना पड़ रहा है।
बढऩे लगा वार्ड में अपराध
वार्ड-20 के पार्षद ललता प्रसाद ने कहा कि विकास के नाम पर उनके वार्ड में कुछ नहीं हुआ। उल्टा अपराध बढऩे लगा है। महिलाएं असुरक्षित महसूस कर रही हैं। रात को लोग घरों से बाहर निकलने में डर रहे हैं। सुरक्षा के लिए पुलिस बंदोबस्त तक नहीं है। हम विपक्षी पार्टी के पार्षद हैं शायद इसलिए हमारी सुनवाई नहीं हो रही।
काम में पारदर्शिता नहीं है
वार्ड-9 के पार्षद हिम्मत सिंह ने कहा कि नगर निगम के काम में पारदर्शिता नहीं है। सिर्फ सीएम की घोषणा वाले काम ही हो रहे हैं। अब तक सब कमेटियां नहीं बन पाई। निगम की ओर से सिर्फ 100 स्ट्रीट लाइटें दी गई थी। अपने सामथ्र्य से ही मेरे वार्ड का विकास हो रहा है। मैं चाहता हूं कि जो राहुल जी की सोच है उसके आधार पर ही काम हो।
प्रशासन लगाए जनता दरबार
वार्ड-5 की पार्षद रुपम गुगलानी भी निगम अधिकारियों की कार्यशैली से खुश नहीं है। वे कहती हैं कि फाइलों पर अफसर साइन नहीं करते। लोग चक्कर काटकर तंग आ चुके हैं। अफसर अपनी सीटों से गायब रहते हैं। उनके साथ लोगों को भी उनकी जानकारी नहीं दी जाती। वार्ड में सफाई की स्थिति भी खराब है।
बेहाल सफाई व लाइट व्यवस्था
वार्ड-2 की पार्षद दर्शना मेहता ने नगर निगम के 7 महीने के कामकाज को जीरो नंबर दिया है। उनके मुताबिक अभी तक निगम सफाई व स्ट्रीट लाइट व्यवस्था में ही सुधार नहीं कर पाया। विकास के दूसरे पहलु भी संतोषजनक नहीं है। बड़ी उम्मीदों से हमनें लोगों से वोट मांगे थे। मगर अब दुख हो रहा है।
25 से ज्यादा सड़कें बनी
पार्षद सोनिया रानी नगर निगम की कार्यशैली से संतुष्ट हैं। उन्होंने बताया कि 7 महीने में उनके वार्ड में 3 करोड़ रुपए से ज्यादा के विकास कार्य हो चुके हैं। सीवरेज डल चुका है। पानी की पाइपलाइन भी बिछ चुकी है। 25 से ज्यादा सड़कें बन चुकी हैं।
- नगर निगम की कार्यशैली असंतुष्ट हैं ज्यादातर पार्षद
- विकास न होने पर जनता व पार्षद दोनों दुखी
भास्कर न्यूज - अम्बाला सिटी
महापौर व पार्षदों की मानें तो विकास के लिए नगर निगम ने एक रुपया भी नहीं दिया। महापौर को निगम की ओर से कोठी के लिए 15000 रुपए, भत्ते के रूप में 5000 रुपए और पेट्रोल के लिए भी लगभग 5000 रुपए मिलते हैं। इस लिहाज से नगर निगम महापौर पर करीब 2 लाख खर्च कर चुका है। इसी प्रकार पार्षदों को हर माह भत्ते में 2500 रुपए मिल रहे हैं। अब तक पार्षदों पर करीब सवा तीन लाख खर्च हो चुके हैं। बैठकों पर जो खर्च होता है, वह अलग है। अब सवाल यह है कि यह राशि आई कहां से। जाहिर सी बात है कि यह जनता का पैसा है। पार्षद खुद कह रहे हैं कि वे नगर निगम से असंतुष्ट हैं। उनके पास विकास कार्य के लिए पैसा नहीं है। कुछ पार्षद इसलिए संतुष्ट हैं, क्योंकि सिटी विधायक का उन पर हाथ है। उन्हीं के फंड से विकास कार्य हुए हैं। दुखी वे पार्षद हैं जो विधायक के करीब नहीं हैं या फिर विपक्ष में हैं। कुल मिलाकर यह नगर निगम लोगों पर ही भारी पड़ रहा है।
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