वतन से ज्यादा प्यारा लगे है रुपया
भास्कर न्यूज - भिवानी
‘दिल्ली तेरे पास आई, तू क्यूं दूर हो गया, लाल किला पूछता वो लाल कहां खो गया, तेरा नाम नेताओं ने कर दिया बदनाम रे, नेता सता सुंदरी के नशे में खो गया, वतन से ज्यादा प्यारा लगे है रुपया आजा रे सुभाष पुकारे तेरी मैय्या’ यह शब्द जब कवि गजेंद्र सोलंकी ने कहे तो पूरा गोबिंदराम टिबड़ेवाल सभागार में कहे तो पूरा सभागार तालियों की गडग़ड़ाहट से गूंज उठा। मौका था जनतंत्र मोर्चा के तत्वावधान में हुए नेता जी सुभाष चंद्र बोस की जयंती समारोह का।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि डॉ. पवन सिन्हा एस्ट्रो अंकल आजतक व लेफ्टिनेंट जरनल डीपी वत्स, आई जी रणवीर शर्मा और ग्रह मंत्रालय की सहायक निदेशिका कुमारी चित्रलेखा रही तो कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रमुख समाज सेवी पंडित बसेसर लाल बापोड़ा ने की। इनके अलावा कार्यक्रम में मोर्चा युवा विंग के प्रधान व राष्ट्रीय सैनिक संस्था के राज्याध्यक्ष नवीन जय हिंद, नारायण प्रकाश जेई, केसी वर्मा, वीना शर्मा व शहर की 82 सामाजिक संस्थाएं व 100 गांव के चुने हुए प्रतिनिधियों के अलावा अनेक श्रोतागण उपस्थित थे।
कार्यक्रम में दिल्ली से पधारे कवि राजेश चेतन, विनय विनम्र, बलजीत कौर व गजेंद्र सोलंकी ने तीन घंटों तक उपस्थित श्रोताओं को खूब गुदगुदाया। शुरुआत करते हुए सभी कवियों ने पहले नेता जी सुभाष चंद्र बोस को श्रद्धांजलि दी व बाद में भ्रष्ट नेताओं को आड़े हाथों लिया।
अपनी कविता की शुरुआत राजेश चेतन ने सबसे मजाकिया अंदाज में श्रोताओं को कहा कि ’ अपने अपने मोबाइल को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह मोड़ पर लगा लो इसके बाद उन्होंने आप पार्टी को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि ‘बात बात में से बात निकालना उनके बस की बात नहीं घर के लोगों को समझाना उनके बस की बात नहीं, एक रोगी वेंटिलेटर पर तो दूजा आक्सीजन पर है आम बीमारी से बच पाना उनके बस की बात नहीं’। कांग्रेस पार्टी पर चुटकी लेते हुए चेतन ने कहा कि ‘राजा जी ने मंगलग्रह पर यान उतारा हो बेशक राजमहल में मंगल लाना उनके बस की बात नहीं’। इसी प्रकार आज के महात्माओं पर कटाक्ष करते हुए उन्होंने कहा कि ‘बापू जी की आशा टूटी बेटा भी है दुखी-:दुखी लोहे की सलाखें तोडऩा उनके बस की बात नहीं’।
इसी प्रकार विनय विनम्र ने नेता जी को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि ‘देशभक्ति पूर्ण खोज आजाद हिंद फौज माटी ममता से भरे लोग जुड़ जाते थे, भय के प्रभाव से फिरंगियों के भाव घटे बोस नाम सुनते ही होश उड़ जाते थे’ ‘हम सौंपकर धरोहर जा रहे खोना नहीं हम देश पर मर कर अमरता पा रहे रोना नहीं, वह बीज जो वृक्ष बनकर धरा पर छा गया वो मातृभूमि पर गुलामी का दाग लगा गया, तो फिर कभी जयचंद बनकर तुम उसे बोना नहीं हम देश पर मर कर अमरता पा रहे तुम रोना नहीं’।