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समलैंगिक रिश्तों पर फैसला नहीं बदलेगा

7 वर्ष पहले
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एजेंसी - नई दिल्ली
सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक समुदाय को फिर झटका दिया है। कोर्ट ने 11 दिसंबर के अपने फैसले पर पुनर्विचार करने से इनकार कर दिया है। यानी समलैंगिक रिश्ते आईपीसी की धारा 377 के तहत अपराध के दायरे में ही माने जाएंगे। इस अपराध के लिए उम्रकैद तक की सजा का प्रावधान है।
केंद्र सरकार, मशहूर फिल्म निर्माता श्याम बेनेगल और समलैंगिक अधिकारों के लिए लडऩे वाले नाज फाउंडेशन ने याचिका लगाई थी। इनमें शीर्ष कोर्ट से उसके फैसले पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया गया था। लेकिन जस्टिस एचएल दत्तू और एसजे मुखोपाध्याय की बेंच ने याचिका खारिज कर दी। अपने संक्षिप्त आदेश में बेंच ने कहा, ‘हमने सभी कागजों को देखा है। इसमें हमें फैसले पर पुनर्विचार करने का कोई कारण नहीं मिला है। इस वजह से याचिका खारिज की जाती है।’ कोर्ट ने इन याचिकाओं पर मौखिक सुनवाई से भी इनकार कर दिया। सामान्य तौर पर बेंच ही तय करती है कि पुनर्विचार याचिका पर संबंधित पक्षों को मौखिक दलीलें पेश करने की अनुमति दे या नहीं। इससे पहले दो जुलाई 2009 को दिल्ली हाईकोर्ट ने आपसी सहमति से समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर माना था। लेकिन बाद में इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया।