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पहलवान बेटियों की ‘तानों’ को पटखनी

7 वर्ष पहले
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पानीपत. प्रदेश में लिंग अनुपात चाहे 1000-864 का हो और लड़कियों को उम्मीद के मुताबिक अभी तक वो तव्वजो नहीं मिल रही है, जिनकी वे हकदार हैं। इस सबके बीच दो शख्स ऐसे भी हैं, जिन्होंने बेटियों को बेटों से कम नहीं समझा। उन्होंने अपने रिश्तेदारों, पड़ोसियों और परिजनों के विरोध की परवाह न करते हुए अपनी बेटियों को कुश्ती के खेल में उतारा।

उनकी तमन्ना थी कि बेटी कुश्ती में उस मुकाम तक पहुंचे, जिस तक वे नहीं पहुंच पाए। बेटियों ने उनकी उम्मीदों पर खरा उतरते हुए नेशनल कुश्ती प्रतियोगिता में मेडल जीते। उन्हें सिवाय माता-पिता के किसी ग्रामीण से सम्मान नहीं मिला। इस तरह के हालात से पानीपत के कारद गांव की नीरज और फतेहाबाद के नहला गांव की पूनम को रूबरू होना पड़ा है। ये दोनों पहलवान पानीपत में राज्यस्तरीय स्कूल कुश्ती कैंप में शामिल हैं।

नीरज 55 और पूनम 59 किलोग्राम भाग वर्ग में 29 जनवरी से 2 फरवरी तक उत्तरप्रदेश के कानपुर में होने वाली राष्ट्रीय स्कूल कुश्ती चैंपियनशिप में चुनौती पेश करेंगी। इन पहलवानों ने दैनिक भास्कर से संघर्ष से लेकर सफलता तक के बारे में बातचीत की।

पिता जिद न करते तो नहीं बन पाती पहलवान
पांच बहनों में सबसे छोटी और दो भाइयों से बड़ी हूं। पिता श्रीनिवास पहलवान रहे हैं। दादा भलेराम भी नामी पहलवान रहे हैं। उन्हें से प्रेरित होकर कुश्ती की इच्छा जाहिर की। रिश्तेदारों ने विरोध जताया, लेकिन पिता ने जिद कर ली कि वह बेटी को पहलवान ही बनाएंगे। उन्होंने दो साल पहले कुश्ती के अभ्यास के लिए रोहतक के छोटू राम स्टेडियम में भेज दिया। राज्य व राष्ट्रीयस्तर पर कुश्ती प्रतियोगिता में गोल्ड मेडल जीता।’ -पूनम, पहलवान, नाहला गांव, फतेहाबाद

पापा की वजह से मिली जीत
मेरा नाम लड़कों वाला है। इसके पीछे भी कहानी है। किसान पिता राजेश कुमार पहलवान नहीं बन पाए। उनकी इच्छा थी कि उनकी पहली संतान का नाम नीरज होगा और वे उसे पहलवान बनाएंगे। इसलिए मेरा नाम नीरज रख दिया। रिश्तेदारों ने पिता को कहा कि बेटी को पढ़ा लें। फिर शादी कर देना। कुश्ती लड़कों का खेल है। पिता ने इस पर ध्यान नहीं दिया और मुझे खेलने के लिए प्रेरित किया।

पिता ही घर से बाइक पर अखाड़े लाते-ले जाते थे। कोच अनुज अभ्यास कराते हैं। ओपन व स्कूल स्टेट कुश्ती प्रतियोगिता में दो गोल्ड, एक सिल्वर, एक ब्रॉन्ज और नेशनल में सिल्वर व ब्रॉन्ज मेडल जीत चुकी हूं। मुझे किसी की परवाह नहीं। मैं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मेडल जीतना चाहती हूं। -नीरज, पहलवान, कारद गांव, पानीपत