फाइलों के नीचे दम तोड़ती व्यवस्था
नेट की दुनिया पर उपलब्ध सर्वश्रेष्ठ कंटेंट एक जगह वेब भास्कर में...
 अभिव्यक्ति
सहिष्णुता मन का सबसे बड़ा तोहफा है। इसमें मस्तिष्क साइकिल पर संतुलन साधने जैसे प्रयास करता है।
-हेलन केलर
बात पते की
, धनबाद
गुरुवार. 23 जनवरी, २०१4
सबके नहीं होते फिंगरप्रिंट्स
एडरमाटोग्लाइफिया एक ऐसा जेनेटिक डिसऑर्डर है, जिससे पीडि़त लोग बगैर फिंगरप्रिंट्स के जन्म लेते हैं। हालांकि यह डिसऑर्डर काफी रेयर है। 2011 में शोधकर्ताओं के दल ने इसके पीछे के जनेटिक यूटेशन को समझाया था। इनमें से एक त्वचा विशेषज्ञ पीटर इन से इसी बीमारी से ग्रस्त महिला ने संपर्क किया था। उस महिला को यूएस बॉर्डर पर इमीग्रेशन एजेंट ने रोक लिया था, क्योंकि वे उसके फिंगर प्रिंट्स नहीं ले पा रहे थे। क्चड्ढशद्बठ्ठद्दड्ढशद्बठ्ठद्द.ठ्ठद्गह्ल
जोगिंदर सिंह
सीबीआई के पूर्व डायरेक्टर
द्भशद्दद्बठ्ठस्रद्गह्म्ह्यद्बठ्ठद्दद्धष्ड्ढद्बञ्चद्दद्वड्डद्बद्य.ष्शद्व
गलत मुद्दों पर मतदान से लेकर अदालतों में लंबित मामलों तक कई बातें अनियमितता के लिए जिम्मेदार
एक महत्वपूर्ण राज्य में मुझे उद्योगपतियों के समूह ने बोलने के लिए आमंत्रित किया। मैंने उन्हें देश को भ्रष्टाचार से मुक्त कराने का आह्वान किया। तब मुझे बताया गया कि हर माह उनके कारखानों में विभिन्न विभागों के 65 इंस्पेक्टर मुआयने के लिए आते हैं। इसमें से प्रत्येक के पास कारखाना बंद करने के अधिकार हैं, हालांकि वे सारे नियमों व निर्देशों का पालन करते हैं।
मैंने उनसे पूछा कि जब सबकुछ नियम-कायदों से हो रहा है तो वे रिश्वत देते क्यों हैं। जवाब था चेकिंग इंस्पेक्टर के शब्द ही कानून है, क्योंकि कोई अधिकारी उनके खिलाफ शिकायत नहीं सुनता। रिश्वत में उनका भी हिस्सा जो होता है। मैंने पूछा कि क्या इस वसूली में ऊपर वालों का भी हाथ रहता है तो सवाल किया गया कि क्या मेरा मतलब मंत्री से है। मेरे हां कहने पर उनका कहना था कि मंत्री के अपने बिचौलिये होते हैं, क्योंकि वे आमतौर पर रिश्वत के मामले में सीधे दखल नहीं देते।
तब मुझे एक किस्सा याद आया जो मेरी जानकारी के मुताबिक सच ही है। एक बिकानेसमैन को नया उद्योग लगाने के लिए कोई मंजूरी चाहिए थी। रकम तय हुई और मंत्री महोदय ने मंजूरी देते हुए फाइल पर अंग्रेजी में ‘अप्रूव्ड’ लिख दिया। जब निर्धारित समय में पैसा नहीं पहुंचा तो मंत्री ने फाइल बुलवाई और अप्रूव्ड के आगे अंग्रेजी शब्द ‘नॉट’ लगा दिया यानी मंजूरी नहीं। बेचारा बिकानेसमैन मुसीबत में फंस गया। उसने दूसरा बिचौलिया खोजा। उसने कहा कि अब दुगना पैसा देना होगा, क्योंकि मंत्रीजी की प्रतिष्ठा दांव पर लग गई है। सौदा हो गया तो मंत्री ने फाइल बुलवाई नॉट के अंग्रेजी अक्षर ‘ई’ लगाकर उसे नोट कर दिया। नोट, अप्रूव्ड यानी ध्यान दें, मंजूरी दे दी गई है!
प्रधानमंत्री पद के लिए भाजपा के उम्मीदवार ने पर्यावरण मंत्रालय से जयंती नटराजन को हटाने का परोक्ष उल्लेख किया। पणजी की रैली में मोदी ने कहा, ‘मैंने दिल्ली में जयंती टैक्स के बारे में पहली बार सुना, जिसे चुकाए बिना पर्यावरण मंत्रालय में कोई फाइल नहीं हिलती थी। यह किस तरह की व्यवस्था वे विकसित कर रहे हैं।’ जयंती नटराजन ने इन आरोपों को निराधार बताते हुए कहा, ‘गुजरात में पर्यावरण कानूनों का घोर उल्लंघन हो रहा था। वे पर्यावरण को नष्ट कर रहे थे। मैंने इसका विरोध किया।’ हालांकि नटराजन ने किसी परियोजना या प्रस्ताव का नाम नहीं लिया। खबरों के मुताबिक वीरप्पा मोइली ने जब पर्यावरण मंत्रालय का प्रभार संभाला तो उन्हें 350 फाइलें मिलीं जिन्हें नटराजन ने रोक रखा था। इनमें से 180 फाइल उनके घर से 22, 23 व 24 दिसंबर को बिना हस्ताक्षर लौटी थीं। किंतु 119 फाइलों पर तो उनके हस्ताक्षर होने के बाद भी किसी वजह से उन्हें रोका गया था। उनके हस्ताक्षरों वाली 50 अन्य फाइलें उनके स्टाफ ने रोक रखी थीं। नटराजन ने हरियाणा की महत्वपूर्ण 2800 मेगावाट की परमाणु बिजली परियोजना भी बिना कारण दिए सालभर से रोक रखी थी। इसे मोइली ने 27 दिसंबर को हरी झंडी दी है और 6 जनवरी 2014 को प्रधानमंत्री ने इसकी आधारशिला रखी।
जब कर्नाटक में मैं एक जिले का एसपी था तो मैंने जान जोखिम में डालकर एक अपराधी को पकडऩे में घायल हुई मुस्लिम युवती को कांस्टेबल से पदोन्नत कर हेड कांस्टेबल बना दिया। चूंकि मेरा जिला छोटा था तो एक माह में मैं सारे थानों के दौरे कर लिया करता था। अगले दौरे में मैंने पाया कि वह युवती अब भी कांस्टेबल ही है। मेरे हस्ताक्षरों वाला पत्र एक माह बाद भी जारी नहीं हुआ था। मैंने एक सीआईडी अधिकारी को जांच के लिए कहा। दो दिन बाद मुझे रिपोर्ट मिली कि मेरे ऑफिस का डिस्पेच क्लर्क लेटर जारी करने के लिए 100 रुपए मांग रहा था। मैंने उसे बुलाया तो काम के बोझ का बहाना बनाने लगा। रिकॉर्ड देखा तो उसके यहां से रोज 10 पत्र जारी हो रहे थे। फिर यही क्यों रोका गया। मैंने उसे निलंबित किया। बाद में उसे बर्खास्त ही करना पड़ा।
हमारी व्यवस्था में एक हायरार्की यानी पदानुक्रम होता है। सैद्धांतिक रूप से यह राजनीतिक व मंत्री स्तर पर भी मौजूद है। हालांकि, वास्तविक जीवन में स्थिति अलग ही है। मुझे मालूम है कि कैबिनेट में शामिल होने के दो साल बाद भी कई मंत्री कभी मौजूदा प्रधानमंत्री से मिलने नहीं गए। एक मंत्री ने तो बताते हैं कि यह टिप्पणी की कि प्रधानमंत्री उनसे कैसे सीनियर हुए। वे निर्वाचित होकर आए हैं जबकि प्रधानमंत्री तो राज्यसभा से आए हैं। मेरे एक वरिष्ठ सहकर्मी ने मुझे बताया था कि कुछ मंत्री तो प्रधानमंत्री के पत्र का जवाब देने की जहमत तक नहीं उठाते। बहुत बार तो वे सिर्फ ‘फाइल’ लिख देते हैं। यह मामला तो खबरों में भी आया है कि एक मंत्री या उसके परिवार के एनजीओ पर अनुदान के कुछ लाख रुपए खर्च न करने का आरोप लगा तो उनके अन्य सहयोगी मंत्री ने टिप्पणी की, ‘मुझे नहीं लगता कि उन्होंने ऐसा किया होगा, क्योंकि यह तो बहुत छोटी राशि है।’
मूल अधिकारों के नाम पर हमने सारे अधिकार अभियुक्त को दे दिए हैं और अपराध का शिकार हुए व्यक्ति को कुछ नहीं दिया है। वे बेचारे मामले निलंबित रहने से दशकों तक परेशानी भुगतते रहते हैं। अदालतों में कुल 3,32 करोड़ मामले लंबित पड़े हैं। कारण सीधा सा है- सरकार न्याय संबंधी आधारभूत ढांचे पर खर्च ही नहीं करना चाहती। फिर 1863 के प्राचीन कानूनों से आप 2013 के भ्रष्टाचार व अन्य अपराधों से नहीं निपट सकते। कुख्यात ‘निर्भया’ मामले से संबंधित जज के मुताबिक जमीनी स्तर पर कुछ भी नहीं किया गया है। मंत्री और ऊंचे पद पर बैठे लोगों के अलावा देश की जनता भी इस मामले में दोषी है, क्योंकि वह जाति, धर्म, क्षेत्र आदि के आधार पर वोट देती है। आखिर में नेता तो जनता में से ही चुने जाते हैं। गठबंधन के युग में किसी भी सरकार की प्राथमिकता प्रशासन में ईमानदारी या सच्चाई लाना अथवा उसे जनता के प्रति जवाबदेह बनाना नहीं, खुद को बचाए रखना है। राजनेताओं या राजनीतिक दलों का एक ही सिद्धांत है, सत्ता में बने रहना। जनता जाए भाड़ में। हमारे यहां ढेरों प्रकार के रेग्यूलेटर व इंस्पेक्टर हैं, जिनका मूल काम जनता को न्याय देना नहीं, जितना हो सके उतना पैसा वसूल करना है। फिर नेता लोग चाहे जितने बड़े-बड़े दावे करते फिरें। 1988 में राजीव गांधी ने कहा था कि रुपए में सिर्फ 15 पैसे जनता तक पहुंचते हैं और 2009 में राहुल गांधी ने बताया कि अब 10 रुपए में सिर्फ 10 पैसे अपने लक्ष्य तक पहुंचते हैं। आप चाहें तो इसे शासन कह सकते हैं।
अरस्तू ने कहा था, ‘जो चीज लोगों की बड़ी संख्या में आम हो जाती है, उसकी सबसे कम परवाह की जाती है। हर आदमी मुख्यत: अपने बारे में सोचता है। सबके हित के बारे में वह शायद ही कभी सोचता है। इस बारे में वह तभी सोचता है जब वह एक व्यक्ति के रूप में खुद चिंतित होता है। वजह यह है कि हम दूसरों से तो फर्का पूरा करने की अपेक्षा करते हैं जबकि खुद उसकी अनदेखी करते हैं। यह भारत पर बिल्कुल ठीक बैठता है।
जीवन दर्शन
आचार्य शुक्ल ने ठुकराई नौकरी
घटना उन दिनों की है जब हिंदी साहित्य के प्रथम इतिहासकार आचार्य रामचंद्र शुक्ल बनारस में रहते थे। नागरी प्रचारिणी सभा में क्रहिंदी विश्वकोषञ्ज का काम देखते थे। इस काम के लिए आचार्य शुक्ल को पच्चीस रुपए मासिक दिए जाते थे। एक बार आचार्य शुक्ल के एक मित्र उनसे मिलने आए। बातों-बातों में जब मित्र महाशय ने शुक्लजी का वेतन जाना तो वे बोले, क्रबंधु! यह तो काफी कम है। आपकी योग्यता तो राजदरबार के लायक है। मैं अलवर महाराजा के काफी निकट हूं। आपकी नौकरी के लिए उनसे बात कर लेता हूं।ञ्ज शुक्लजी अनिच्छुक थे, लेकिन मित्र के प्रबल आग्रह के समक्ष उन्हें झुकना पड़ा। मित्र ने उन्हें चौदह सौ रुपए मासिक पर अलवर राजदरबार में लगा दिया। उस जमाने में चौदह सौ रुपए आज के तीस हजार रुपए के लगभग थे। वेतन के अनुरूप रहने के लिए आचार्य शुक्ल को शानदार कोठी मिली और सवारी के लिए घोड़ा गाड़ी भी। अलवर में इस राजसी ठाठ-बाट से आचार्य शुक्ल तीन दिनों में ही ऊब गए। उन्होंने देखा कि वहां के सभी कर्मचारी महाराज की चापलूसी में लगे रहते हैं और अपना काम बनाते हैं। वस्तुत: वहां बने रहने के लिए यह चापलूसी अनिवार्य योग्यता थी, जो शुक्लजी के वश की बात नहीं थी। चौथे ही दिन वे बिना किसी को कुछ कहे-सुने बनारस लौट आए और पुन: अपनी पच्चीस रुपए मासिक वाली नौकरी करने लगे। उन्होंने अपने मित्र को एक पत्र लिखकर अपना स्वभाव और राजदरबार की प्रतिकूलता के विषय में स्पष्ट रूप से बता दिया। स्वाभिमानी व्यक्ति अपने परिश्रम के बल पर अपनी आजीविका कमाता है। किसी की चाटुकारिता के सहारे जीवन यापन उसके लिए असहनीय होता है।
जीने की राह
अनकही को सुनना भी महत्वपूर्ण
अधिकतर देखा गया है कि जो हमारा इरादा होता है हम वैसा बोल नहीं पाते हैं। हमारे विचार ठीक से अभिव्यक्ति नहीं हो पाते। कई बार हम अच्छे से जानते हैं कि हमें बोलना क्या है, लेकिन फिर भी मूल विषय के दाएं-बाएं ही अपने शब्द फेंकते रहते हैं। जैसे अच्छा तीरंदाज निशाने के इधर-उधर तीर फेंकता रहे। इसके पीछे चार कारण होते हैं। सामने वाले को बुरा न लग जाए, अपन कहीं नासमझ या बेवकूफ न मान लिए जाएं और अपने ही विचार पर सही या गलत होने का संदेह। चौथी बात शब्दों को लेकर लापरवाही की आदत ही पड़ गई हो। यदि ऐसा है तो हमें सावधान होना पड़ेगा। जो कहना चाहिए वह नहीं कह पा रहे हैं तो यह हमारे व्यक्तित्व का दोष है। चलिए आज विचार करें कि जब ऐसे व्यक्तियों से हमारा सामना हो, तब हम क्या करें? हमें अपने भीतर एक खूबी निखारना चाहिए और वह है अनकही को सुनना। आप पाएंगे कि जानवर अनकही को भी सुनता है। मनुष्य इसमें चूक जाता है। अभ्यास करें सामने वालों के शब्दों के अर्थ को ही न पकड़ें, बल्कि पीछे के इशारों, संकेतों को भी समझें। किसी के भीतर क्या चल रहा है यह पकडऩा सीखें। वह क्या बोल रहा है यह दूसरी बात है, क्योंकि कभी-कभी अनकही, जो कहा जा रहा है उससे ज्यादा महत्वपूर्ण होती है। यदि किसी की अनकही को पकडऩा है तो एक प्रयोग करें। वार्तालाप के दौरान प्रेमपूर्ण हो जाएं। जितना आप प्रेम से भरे होंगे, उतना ही आप दूसरे को बोलने का मौका दे पाएंगे। यदि सामने वाला घुमाना भी चाहेगा, तब भी आप अनकही की गूंज सुन लेंगे।
-पं. विजयशंकर मेहता - द्धह्वद्वड्डह्म्द्गद्धड्डठ्ठह्वद्वड्डठ्ठञ्चद्दद्वड्डद्बद्य.ष्शद्व
2द्गड्ढ:द्धड्डद्वड्डह्म्द्गद्धड्डठ्ठह्वद्वड्डठ्ठ.ष्शद्व
व्यवस्था बदलने के नाम पर समाचार माध्यमों के लोग राजनीति में उतर रहे हैं। मिली हुई चुनौतियों को छोड़कर नई भूमिका तलाशने की यह कोशिश कितनी ईमानदार और सार्थक है?
ञ्चलक्ष्मी प्रसाद पंत
राजनीति और पत्रकारिता के बीच पनप रहे सियासी गठबंधन ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। समाज हक्का-बक्का है और राजनीतिक दलों के प्रति पत्रकारों की वफादारी से हैरान भी। दर्शक, पाठक और श्रोता एक अज्ञात भय से ग्रस्त हैं। चिंताएं ये हैं कि राजनीति की कुटिल चालों के शिकंजे में यदि काली स्याही भी फंस गई तो सच और उसके सरोकारों को कौन जिंदा रखेगा। बेलाग-बेदाग सवाल आखिर उठाएगा कौन?
इन दिनों पत्रकार पार्टियां जॉइन कर रहे हैं। पहले भी करते रहे हैं, लेकिन इस बार उन्हें जवाब देना पड़ रहा है। ऐसे प्रश्नों के जवाब में चतुर तर्क यह है कि यह फैसला निजी राजनीतिक उद्देश्यों के लिए नहीं, बल्कि राजनीति का मुहावरा बदलने के लिए है। सियासी दोस्ती के इन नए रूपक-उपमाओं के उलट सवाल यह है कि क्या भूमिकाएं बदलने से बदलाव हो सकते हैं? सत्ता के साथ साझेदारी पत्रकारिता के पेशे के प्रति ईमानदारी कैसे हो सकती है?
सियासत में आना गलत नहीं है। पत्रकार भी वोटर है, किसी सियासी दल का शैदाई हो सकता है। लेकिन अगर यदि आप संपादक है, चैनल हैड हैं या राजनीतिक पत्रकार-विश्लेषक हैं, तो पहली जिम्मेदारी निष्पक्षता की है। परंतु यह निष्पक्षता तब सवालों के घेरे में आती है जब आप पत्रकारिता छोड़ राजनीतिक दल जॉइन कर लेते हैं। जाहिर है कि आपने अपने राजनीतिक झुकाव का पत्रकारिता में जाने-अनजाने इस्तेमाल किया ही होगा। निजी राजनीतिक उद्देश्य के लिए खबरें बनाईं और चलाईं होंगी। जिन प्रश्नों का उत्तर आप एक पत्रकार के तौर पर दे सकते हैं, सियासी दल में शामिल होने के बाद आपका हर बयान-तर्क सियासी ही होगा, क्योंकि राजनीति और राजप्रासाद आपको सियासी वफादारी के लिए ही मिला है।
पत्रकार रहते राजनीतिक पार्टियों के प्रति वफादारी भी पेड न्यूज ही है। पार्टी का प्रवक्ता, राजनीतिक-मीडिया सलाहकार बनना, किसी खास सत्तासीन दल के निगम, आयोग का अध्यक्ष कोई यूं ही नहीं बना देता। जाहिर है कि लक्ष्मण-रेखा लांघी गई होगी। राजनीतिक महत्वाकांक्षा, दल और व्यक्तियों के प्रति भावुकता ही सियासत के जादुई कालीन पर बैठने के मौके उपलब्ध कराती है। यह शुद्धअवसरवादी सोच है।
पत्रकारिता दरअसल, सिर्फ खबर नहीं बताती उसके अर्थ भी ढूंढ़ती है। मानवीय प्रतिबद्धता पत्रकारिता का बीजगणित है। पत्रकार भ्रष्ट शासन-प्रशासन की कुर्सी के नीचे बारूदी सुरंग की तरह काम करता है। सियासी प्रलोभन और प्रशस्ति इस धार को कमजोर करते हैं। चौथा स्तंभ अगर पहले स्तंभ के चुंबकीय आकर्षण में खिंचता रहा तो पत्रकारिता के खरेपन की बुनियाद हिलने लगेगी। पत्रकारिता छोड़कर राजनीति में जाकर पूरे सिस्टम को बदलने की सोच बेतुके और बेलिबास सवाल की तरह है। और हमारी बेचैनी तो यह कि जो लोग मिली हुई चुनौतियों को छोड़कर नई भूमिकाएं तलाशते हैं, उनके सपने भले ही बड़े और भव्य हों, लेकिन वे कभी पूरे नहीं होते।
लेखक दैनिक भास्कर, राजस्थान के स्टेट एडिटर हैं।
श्चड्डठ्ठह्लञ्चस्रड्डद्बठ्ठद्बद्मड्ढद्धड्डह्यद्मड्डह्म्द्दह्म्शह्वश्च.ष्शद्व
भूमिकाएं बदलने से बदलाव नहीं आता
सरकारी देरी
का परिणाम
मृत्यु दंड पर सर्वोच्च न्यायालय के नए निर्णय का परिणाम यह होगा कि बड़ी संख्या में ऐसे अपराधी उस सजा से बच जाएंगे, जो उनके जुर्म की जघन्यता के कारण उन्हें अदालतों ने सुनाई थी। इस फैसले से देविंदर सिंह भुल्लर जैसे आतंकवादी और राजीव गांधी के हत्यारों के भी फांसी से बच जाने की संभावना बन गई है। इस स्थिति के लिए सीधे तौर पर वर्तमान एवं पिछले दशकों की सरकारें जिम्मेदार हैं। दया याचिकाओं पर फैसला लेने में उनके टालू रवैये ने एक अस्वीकार्य हालत पैदा कर दी। अगर किसी को सजा-ए-मौत सुनाई जाती है तो उसकी जिंदगी का क्या होगा इस असमंजस को वर्षों तक नहीं खींचा जा सकता। दया दिखाते हुए अपराधी की सजा को उम्र कैद में बदलना है या उसे फांसी के तख्ते तक पहुंचाना है, यह निर्णय शीघ्र होना चाहिए। अगर मृत्यु दंड देना है तो उस क्रम में तय प्रक्रियाओं का उचित भावना के साथ पालन हो, यह अपेक्षा बिल्कुल वाजिब है। चूंकि इन मामलों में सरकारों ने गंभीरता एवं संवेदनशीलता नहीं दिखाई, नतीजतन अब सर्वोच्च न्यायालय को इस बारे में कायदे तय करने पड़े हैं। मसलन, अब दया याचिका के निपटारे में बेवजह देर हुई तो वह सजा-ए-मौत को उम्र कैद में बदलने का आधार बनेगा और मानसिक रोग से पीडि़त मृत्यु दंड पाए कैदियों की सजा घटाई जा सकेगी। इसके अलावा फांसी देने से पहले अपराधी को परिजनों से मिलने का अवसर देना अनिवार्य कर दिया गया है। साथ ही कोर्ट ने यह प्रावधान भी किया है कि दया याचिका खारिज होने और फांसी की सजा देने में 14 दिन का अंतर होना अनिवार्य है। इन प्रावधानों के अस्तित्व में आने से फांसी का प्रावधान आपराधिक दंड विधान में मौजूद रहने के बावजूद भारतीय न्यायिक व्यवस्था की अधिक मानवीय छवि बनेगी। दरअसल, ऐसे मामलों में पहल की अपेक्षा सरकारों और विधायिका से होती है, लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि अपने देश में सरकारें सुधार संबंधी कदम उठाने में हिचकती हैं और कई बार यह जिम्मेदारी न्यायपालिका पर टाल देती हैं। इस मामले में भी ऐसा ही हुआ है। इसीलिए सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला कार्यपालिका- और एक हद तक विधायिका की भी- कार्यशैली पर एक प्रतिकूल टिप्पणी है।
2013 में न्यूयॉर्क टाइस की सबसे पॉपुलर स्टोरी एक इंटर्न ने की थी
न्यूयॉर्र्क टाइस ने हाल में 2013 की अपनी सबसे ज्यादा देखी और पढ़ी जाने वाली स्टोरीज़ की सूची जारी की है। न्यूयॉर्क टाइस में जो स्टोरी सबसे ज्यादा पढ़ी गई वह इंटर्नशिप कर रहे एक छात्र ने लिखी थी। यह पूरी लिस्ट ट्वीट भी की गई है। लोग आश्चर्य में हंै कि इस छात्र ने कई पुलिट्जर प्राइज विजेताओं को भी पीछे छोड़ दिया है। जोश कैट्ज नामक इस छात्र की ‘हाऊ येल यूज एंड यू गायज़ टॉक’ शीर्षक से प्रकाशित यह स्टोरी उसके ग्रेजुएशन के दिनों में हार्वर्ड डायलेक्ट पर हुए एक सर्वे से प्रेरित थी। इसमें बताया गया था कि किसी व्यक्ति की बोली से पता चलता है कि वह कहां से आया है। कुछ सवाल-जवाब भी किए गए थे। यह स्टोरी दिसंबर में वायरल हो गर्ई थी। इंटर्नशिप पूरी होने के बाद अब उसे न्यूयॉर्क टाइम्स में स्टाफ एडिटर की नौकरी मिल गई है। क्चड्ढह्वह्यद्बठ्ठद्गह्यह्यद्बठ्ठह्यद्बस्रद्गह्म्.द्बठ्ठ
पोलैंड की राजधानी वारसा में बने इस घर को आर्किटेक्ट्स की टीम ने दुनिया का सबसे सुरक्षित घर बनाने की कोशिश की है। एक बटन दबाते ही यह घर हर तरफ से कंक्रीट की दीवारों से बंद हो जाता है। फिर यह किसी किले या कंक्रीट के एक क्यूब की तरह दिखता है। इस मोड में लाख कोशिश के बाद भी कोई इस घर में प्रवेश नहीं कर सकता है। बटन दबाते ही दरवाजे सील हो जाते हैं, खिड़कियां, दरवाजे सब कंक्रीट की दीवारों से कवर हो जाते हैं। कहा जा रहा है कि इस तरह बंद होने के बाद यह घर परमाणु हमला झेलने में भी सक्षम है। लॉक मोड में जाने के बाद इस घर में प्रवेश के लिए सिर्फ सेकंड लोर पर बने ब्रिज का इस्तेमाल किया जा सकता है। वह भी अगर मकान मालिक चाहे तो। पूरी प्रॉपर्टी के आसपास भी दीवारें खड़ी हो जाती हैं। पोलिश आर्किटेक्चर फर्म केडल्यूके प्रोस का कहना है हमारे क्लाइंट को मैक्सिमम सिक्योरिटी चाहिए थी, जो हमने दी है। इस मजबूत और सुरक्षित घर का इंटीरियर भी खूबसूरत है। ओपन मोड में मूविंग वॉल्स और शटर्स स्लाइड हो जाते हैं और खिड़कियां खुल जाती हैं। घर के बाहर एक स्विमिंग पूल भी है, जिसे कवर नहीं किया जाता है। कंक्रीट के अलावा मेटल शटर इस घर को एक्स्ट्रा सुरक्षा देते हैं। - द्बश९.ष्शद्व
पोलैंड का यह घर बन जाता है किला
१९६० में शिशु के जन्म लेने के बाद पांच साल की आयु तक मरने की आशंका 20 फीसदी थी। आज यह घटकर पांच प्रतिशत हो चुकी है। 2035 तक यह 1 फीसदी के करीब होगी। चौंकाने वाला तथ्य है कि पिछले वर्ष दुनिया में 60 लाख बच्चों की मौत हुई, मगर इस बार यह आंकड़ा अब तक का सबसे कम रहा है।
दुनिया की 10 तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्थाओं में से 7 अफ्रीका में हैं। यहां स्कूली बच्चों की संया भी 1970 की तुलना में दोगुनी हो गई है।
१९६० से अब तक सब सहारन अफ्रीकी देशों में महिलाओं की औसत आयु 16 वर्ष बढ़ी है। यह 41 से बढ़कर 57 हो चुकी है।
1960 से चीन की प्रति व्यक्तिआय में आठ गुना इजाफा हुआ है। वहीं भारत में लोगों की प्रति व्यक्तिआय चार गुना और ब्राजील में पांच गुना बढ़ी है। जो अर्थव्यवस्था के लिहाज से अच्छे संकेत हैं। क्चद्बठ्ठड्डद्दद्बह्यह्ल.ष्शद्व
अमेरिका अपने बजट का सिर्फ एक फीसदी ही सहायता राशि के रूप में पिछड़े देशों को देता है, जबकि यह 10 फीसदी होना चाहिए। सर्वे में पाया गया कि लोग सोचते हैं अमेरिका 25 फीसदी बजट विदेशों में सहायता के लिए देता है।
1990 की तुलना में दुनिया में बेहद गरीब लोगों की संख्या देखें तो पाएंगे इनकी आबादी 50 फीसदी कम हो गई है।
माइक्रोसॉट के संस्थापक बिल और उनकी पत्नी मेलिंडा गेट्स ने मंगलवार को गेट्स फाउंडेशन का एनुअल लेटर पिलश किया। इसमें उन्होंने ग्राफिक,चाट्र्स और तथ्यों की तुलना के जरिये यह साबित करने कि कोशिश की कि यह दुनिया पहले से काफी बेहतर है। हम विकास की ओर बढ़ रहे हैं और बढ़ते रहेंगे।
बिल और मेलिंडा गेट्स बता रहे हैं, क्यों है यह दुनिया पहले से बेहतर
न्यूजीलैंड से लगातार दूसरा मैच हारकर टीम इंडिया ने नंबर वन टीम होने का खिताब भी गंवा दिया। इससे टीम इंडिया के फैन्स निराश तो हैं, लेकिन उन्हें फिर नंबर वन बनने की उम्मीद भी है। इस पर ट्वीट।
ञ्चटीम इंडिया खराब नहीं खेल रही, बल्कि न्यूजीलैंड बेहतर खेल रही है। उनका टीम प्रबंधन और सामूहिक प्रयास हमसे
अच्छा है।-शिवाजी सिंह, कोलकाता
ञ्चअपने देश में तो कोई भी खेल सकता है। टीम इंडिया के ‘शेर’ बाहर जाते ही ढेर होने लगते हैं।-मनोज आहुजा, दिल्ली
ञ्चहारना किस टीम को अच्छा लगता है। उम्मीद रखें। टीम दो मैच हारी, लेकिन अभी भी पूरी सीरिज जीत सकती है।
-सुरेश रैना फैन क्लब
केंद्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल को पागल करार दिया।
ञ्चक्या अब केजरीवाल वह फिल्मी डायलॉग कहेंगे। हां-हां मैं पागल हूं, इस देश के लिए पागल हूं।-नरेन बालाजी
ञ्चकेंद्रीय गृह मंत्री को ऐसी भाषा शोभा नहीं देती। अब कह दिया है तो......। ऐसी भाषा वाले नेता कांग्रेस को जिताएंगे आम चुनाव?-रविंद्र अग्रवाल, हैदराबाद
ञ्चशिंदे केजरीवाल को पागल कह रहे हैं खुद के बारे में भी तो बताएं।
-ऋतुराज, बेंगलुरू
ञ्चशिंदे को उसी पागलपन की भाषा में जवाब देगी ‘आप’।-अक्षय गावरे
न्यूजीलैंड से हार के बाद भारत ने खोया नंबर वन का खिताब