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जहां-जहां पांव पड़े ‘संतन’ के तहां-तहां बंटाधार

7 वर्ष पहले
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धनबाद :९

आउटसोर्सिंग पर नेतागिरी का मकसद सिर्फ रंगदारी में हिस्सेदारी है। नेता अपनी औकात के अनुसार यहां से हर माह वसूली करते हैं। आउटसोर्सिंग कंपनी को गलत देना होता है, इसलिए वह गलत करता है। कोयला चोरी किया जाता है। दो हजार मजदूरों से काम कराया जाता है और पीएफ सिर्फ दो सौ लोगों का कटता है। सारे गलत काम आउटसोर्सिंग कंपनी करती है। अगर वह ऐसा नहीं करेगी, तो नेताओं, पुलिस अफसरों और बीसीसीएल अफसरों को खुश कैसे रखेगी। एसएन सिंह, रिटायर अफसर, बीसीसीएल

एक्सपर्ट व्यू

आउटसोर्सिंग मजदूरों के साथ अब तक सिर्फ अन्याय हुआ था। साल 2005 से आउटसोर्सिंग शुरू हुआ, उसी समय से नेतागिरी भी शुरू हुई। पर नेताओं ने यहां से सिर्फ रंगदारी वसूला। मजदूरों को उसकी सही मजदूरी भी नहीं दिलाई। अब जब वे मजदूरों को सही हक दिलाने का प्रयास कर रहे हैं, तो लोगों को खराब लग रहा है। उनके प्रयास से मजदूरों को आज सही मजदूरी मिल रहा है। उनका कोई भी आंदोलन आउटसोर्सिंग को बंद कराने के लिए नहीं होता, मजदूरों को न्याय दिलाने के लिए होता है। कंपनी उन्हें सही हक दे, तो उन्हें आंदोलन की जरूरत ही नहीं है। सारे नियमों को ताक पर रखकर मजदूरों से काम लिया जा रहा है।

नीरज सिंह, डिप्टी मेयर, धनबाद

आउटसोर्सिंग कंपनी में माहौल बिगडऩे का मुख्य कारण रोजगार है। रोजगार को लेकर कंपनी को एक नीति बनानी होगी। तय करना होगा कि कितना रोजगार देना है। किसे रोजगार देना है। होता यह है कि हर नेता आउटसोर्सिंग कंपनी में अपना आदमी रखना चाहता है। इसे लेकर वर्चस्व का जंग शुरू हो जाता है। कई बार प्रतिष्ठा ही तनाव का कारण बन जाता है। पर जल्द माहौल बदलेगा। कंपनी में नया नियम आने वाला है। इसके तहत आउटसोर्सिंग कंपनी को टेंडर में हिस्सा लेने के दौरान उन्हें मजदूरों की सूची सौंपनी होगी। बताना होगा कि उनके पास कितने मजदूर है। इससे कुछ हद तक तनाव की स्थिति दूर होगी। कंपनी को ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि अधिक से अधिक लोग रोजगार से जुड़े। रंगदारी के लिए कोई आंदोलन नहीं करता।

संजीव सिंह, महामंत्री, जनता मजदूर संघ

क्या कहते हैं जिम्मेदार

अशोक कुमार

कभी ऐना तो कभी राजापुर। कभी लोदना तो कभी कुसुंडा। आउटसोर्सिंग कंपनियां जहां भी काम कर रही हो, नेतागिरी की परेशानियां उन्हें घेरे हुए है। अधिकांश आउटसोर्सिंग कंपनियों का माहौल नेताओं ने अशांत कर रखा है। जिन आउटसोर्सिंग कंपनियों में शांति दिख रही है, वहां समझ लीजिए कि समझौता एक्सप्रेस दौड़ रहा है। दरअसल नेता तू चल, मैं आई के तर्ज पर काम कर रहे हैं। मतलब यह है कि आउटसोर्सिंग कंपनी में पहले एक नेता इंट्री मारता है और फिर उसके पीछे - पीछे कई नेता आ जाते हैं। देखते ही देखते नेताओं का जमघट लग जाता है। जिन मजदूरों को काम मिलता रहता है, वह एक नेता के साथ एकजुट हो जाते हैं और जिन्हें काम नहीं मिलता, वह दूसरे नेता के साथ खड़े हो जाते हैं। फिर नेता अपने - अपने मजदूरों को काम दिलाने की मांग शुरू करते हैं। कोई बाहरी का नारा लगाता है तो कोई भीतरी का। नेता धरना शुरू करते हैं। मजदूरों को भूख हड़ताल पर बैठाते हैं। आउटसोर्सिंग कंपनी का चक्का जाम होता है। पेट की आग में जल रहे मजदूर देखते ही देखते एक - दूसरे के दुश्मन बन जाते हैं। जहां वह रोटी की चाह में जुटते है, उसी को कुरुक्षेत्र का मैदान बना देते हैं। पुलिस को माहौल शांत करने में कई दिन लग जाते हैं। नेताजी की राजनीति अंतत: आउटसोर्सिंग कंपनी का बंटाधार कर देती है। परेशान कंपनी अपना बोरा - बिस्तर समेटने लगता है।





भूमि पूजन हुआ। आउटसोर्सिंग कंपनी आई। उत्खनन करने वाली बड़ी - बड़ी गाडिय़ां और मशीनें खड़ी हो गईं। काम का माहौल बना तो रोजगार का असर दिखा। सैकड़ों मजदूरों का चेहरा खिल गया। तब तक सबकुछ ठीक चला, जब तक किसी नेता ने यहां इंट्री नहीं मारी। जैसे ही नेताओं ने अपनी गिद्ध नजर आउटसोर्सिंग कंपनी पर डाली, स्थिति बदल गई। एक के बाद एक नेता आते गए और उत्खनन स्थल का माहौल बिगड़ता गया। बाहरी - भीतरी के नारे ने ऐसी आग लगाई कि उसमें जलकर मजदूर एकता और शांति भस्म हो गई। यह हाल आज हर उस आउटसोर्सिंग कंपनी की है, जहां - जहां नेताओं के चरण पड़े। मुंह पर मजदूर हित और दिल में कमाई की इच्छा लेकर आए नेताओं ने आउटसोर्सिंग कंपनी को ऐसा दर्द दिया, जिसकी टीस बेरोजगार हो चुके सैकड़ों मजदूर महसूस कर रहे हैं। नेताओं की जंग में न तो संजीव सिंह पीछे रहे और न ही नीरज सिंह। कभी लाल झंडा लहराया तो कभी कांग्रेस के हाथ ने कमीज की बांह चढ़ाई। चंद नेता तमाम आउटसोर्सिंग कंपनियों का बंटाधार कर रहे हैं।



बीसीसीएल की आउटसोर्सिंग कंपनियां नेतागीरी से परेशान

विक्षुब्ध मजदूरों का इस्तेमाल - पहले से जमे यूनियन को कमजोर बनाने के लिए नेता मजदूरों का ही इस्तेमाल करते हैं। नेता वैसे मजदूरों की तलाश करते हैं, जो आउटसोर्सिंग कंपनी से नाखुश हैं, जिन्हें रोजगार नहीं मिल रहा हो। रोजगार दिलाने की बात कहकर अपने साथ जोड़ लेते हैं। उन्हीं के माध्यम से नेतागिरी करते हैं।

निशाना होता है जेब - आउटसोर्सिंग कंपनी में नेतागिरी का संबंध जेब से है। वह बात तो मजदूर हित की करते हैं, पर उनका असली निशाना वहां से आने होने वाली कमाई पर होती है।

वर्चस्व साबित करने के लिए दोनों नेताओं के समर्थकों का इस तरह उलझना कितना उचित था?

यहां पहले भी स्थानीय लोग ही काम कर रहे थे, फिर स्थानीय को रोजगार देने के नाम पर आंदोलन का क्या मतलब था?

एक ही जगह पर चार लोग नेतागिरी करने पहुंचे, क्या यही सबसे अधिक मजदूरों की समस्या है?

इस उग्र आंदोलन के पीछे कौन था? क्या स्थानीय लोगों को कंपनी के खिलाफ भड़काया गया था?

ट्रेंच कटिंग शुरू कराने के लिए आउटसोर्सिंग कंपनी क्यों बंद कराई गई थी? काम पूरा नहीं हुआ, फिर आंदोलन क्यों बंद हो गया?



उठे जो सवाल?

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उठे जो सवाल?

उठे जो सवाल?

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क्या हुआ हासिल?

क्या हुआ हासिल?

क्या हुआ हासिल?

क्या हुआ हासिल?

क्या हुआ हासिल?

कई मजदूरों की मजदूरी बढ़ गई, पर अभी भी सौ से अधिक मजदूर पुराने रेट पर भी काम कर रहे हैं।

कंपनी को हजारों तक टन कोयले के नुकसान हुआ। रोजगार के नाम पर सिर्फ आश्वासन मिला।



कई लोगों को नौकरी मिला, पर अधिकांश मजदूर अब भी नेताओं के आश्वासन पर झंडा ढो रहे हैं।



आंदोलन के बाद शिमलाबहाल के लोगों को कंपनी में रोजगार मिला। लोग आज काम कर रहे हैं।

आंदोलन पर ट्रेंच कटिंग शुरू भी हुआ और बंद भी। अब इसके लिए नीरज सिंह आंदोलन नहीं कर रहे।

धनुडीह एनसी प्रोजेक्ट

यहां भी डेको कंपनी आउटसोर्सिंग के तहत उत्पादन कर रही है। मजदूरों की मजदूरी बढ़ाने के नाम पर राजनीति शुरू हुई। नीरज सिंह ने आंदोलन कर उत्पादन बंद करा दिया। दूसरी तरफ शंकर विश्वास नामक नेता बंद काम को चालू कराने की जिद पर अड़ गया। स्थिति ऐसी बिगड़ी की गोली तक चला। मारपीट हुई, बवाल मचा। कई दिनों तक यहां उत्पादन बंद रहा। पुलिस और कंपनी कई दिनों तक टेंशन में रही।



यहां डेको कंपनी आउटसोर्सिंग के तहत उत्पादन करती है। शुरू से रणविजय सिंह और मथुरा महतो की राजनीति चली। पर नीरैऐज भी इससे दूर नहीं रह पाए। उन्होंने जैसे ही इंट्री मारै2ी माहौल बदल गया। स्थानीय को नौकरी देने के सवाल पर आंदोलन शुरू हो गया। 11 मई 2013 से 28 मई 2013 तक आउटसोर्सिंग कंपनी में काम बंद रहा। पुलिस यहां के तनाव से परेशान रही। मजदूरों के बीच भेदभाव बढ़ा।

एटी लिब्रा कंपनी द्वारा यहां उत्पादन शुरू हुआ। इस प्रोजेक्ट में सबसे पहले बीसीकेयू पहुंचा। इसके बाद झामुमो ने इंट्री मारी। कुछ ही दिन में वहां नीरज सिंह पहुंच गए। उनके पीछे - पीछे संजीव सिंह भी पहुंचे। अभी यह प्रोजेक्ट राजनीति का अखाड़ा बन गया है। आंदोलन और तनाव यहां अब आम बात है। कंपनी परेशान है और पुलिस भी। धरना - प्रदर्शन का दौर थमने का नाम नहीं ले रहा है। कंपनी का उत्पादन हमेशा प्रभावित होता रहा है।



यहां डेको ने काम शुरू किया है। कुछ ही दिनों में नेतागिरी शुरू हो गई। शिमलाबहाल के लोगों ने आउटसोर्सिंग कंपनी के खिलाफ प्रदर्शन किया और प्रबंधन को पीटा भी। इस घटना से कंपनी के अधिकारी, बीसीसीएल और पुलिस हैरान रह गई। कंपनी और स्थानीय लोगों के बीच 10 दिनों तक तनाव रहा। आश्चर्य की बात यह थी कि स्थानीय लोगों को किसी भी बड़े नेता का साथ नहीं था। किसी भी नेता ने सामने आकर आंदोलन में हिस्सा नहीं लिया। पर परदे के पीछे के खिलाड़ी पुलिस की नजर से छुप नहीं पाए।

यहां सीआईसी नामक आउटसोर्सिंग कंपनी काम कर रही है। जनता मजदूर संघ के कुंती गुट का यहां कब्जा रहा है। संजीव सिंह यहां के मजदूरों के सबसे बड़े नेता हैं। इसी बीच डिप्टी मेयर नीरज सिंह ने यहां इंट्री मारी। बहाना बना ट्रेंच कटिंग। ट्रेंच कटिंग का काम शुरू कराने के लिए नीरज सिंह के समर्थकों ने आउटसोर्सिंग कंपनियों में काम बंद करा दिया। इसे लेकर स्थिति ऐसी बिगड़ी कि गोली - बारी हुई। 4 दिनों तक काम बंद रहा।



ऐसे समझें आउटसोर्सिंग कंपनियों का हाल

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