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स्थिरता नहीं, योग्यता की जरूरत होगी

8 वर्ष पहले
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ञ्चरहीस सिंह
बीते दिनों भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने वर्ष 2013 की वित्तीय स्थिरता पर अपनी रिपोर्ट जारी करते हुए वर्ष 2014 में होने वाले राजनीतिक परिवर्तन पर आशंका जाहिर की। यही नहीं उन्होंने यह अपेक्षा भी जताई कि चुनाव का परिणाम चाहे जो रहे लेकिन भावी सरकार ऐसी नहीं होनी चाहिए जिससे दुनिया के समक्ष भारत को लेकर नीतिगत अस्थिरता का संदेश जाने का खतरा हो। लेकिन क्या वास्तव में सरकार की अस्थिरता ही मात्र ऐसा कारण है जो भारत में आर्थिक वातावरण के अनुकूलन में मुश्किलें पैदा कर रही है या दुनिया के समक्ष भारत के नीतिगत दबदबे को कायम नहीं होने दे रही है? क्या वास्तव में मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए दो की सरकार यूपीए एक के मुकाबले अस्थिर रही? अगर वैश्विक परिदृश्य पर नजर डालें तो यह सवाल भी उठेगा कि क्या अमेरिका में जब सब-प्राइम संकट आया था, तब वहां किसी राजनीतिक अस्थिरता का दौर था? क्या लीमैन ब्रदर्स तथा अमेरिकन इंटरनेशनल ग्रुप ((एआईजी)) के ढहने के साथ ‘सेकंड ग्रेट डिप्रेशन’ की जो शुरुआत हुई थी वह सरकार की अस्थिरता का परिणाम थी? क्या ऐसा ही कुछ यूरोप के आर्थिक संकट के संदर्भ में स्वीकार किया जा सकता है?
उपर्युक्त प्रश्नों का उत्तर तो स्पष्ट तौर से न में ही होगा। यह भी सच है कि विगत 5 वर्षों से कभी भी सरकार के समक्ष अस्तित्व का संकट नहीं उत्पन्न हुआ, लेकिन इसके बावजूद देश की अर्थव्यवस्था में चौतरफा संकट एवं निराशा का वातावरण दिखा। आर्थिक विकास दर केंद्रित आर्थिक नीति होने के बावजूद विकास दर लडख़ड़ा गई, रुपया लम्बे समय तक डूबता-उतराता रहा, ट्विन डेफिसिट अर्थात राजकोषीय घाटे के साथ-साथ चालू खाता घाटा, बेहद नकारात्मक स्थिति में पहुंच गया। सरकार अधिकांश नीतिगत मोर्चों पर अहम निर्णय लेने में कमजोर दिखी और आर्थिक सुधारों के ठप होने की वजह से अर्थव्यवस्था की साख गिरती गई। फलत: जो निवेशक कुछ समय पहले तक भारत पर दांव लगाने को तैयार थे वही किनारा करने लगे।
दरअसल प्रगतिशील व समृद्ध अर्थव्यवस्था के लिए सरकार का स्थिर होना उतना जरूरी नहीं होता है जितना कि सक्षम, दक्ष, पारदर्शी और सुशासन का होना। यही कारण है कि शीर्ष स्तर पर पहुंचने से पहले दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं ने ‘गवर्नेंस स्ट्रक्चर’ को कुशल और पारदर्शी बनाने पर अधिक जोर दिया। हालांकि वहां भी यह स्थिति पूरी तरह से बरकरार नहीं रह पाई। इस मामले में भारत की स्थिति कुछ ज्यादा ही असहज करने वाली रही। वैश्विक प्रतिस्पर्धा रिपोर्ट 2013 तथा इंटरनेशनल फाइनेंस कार्पोरेशन की डूइंग बिजनेस रिपोर्ट 2012 बताती हैं कि भारत व्यावसायिक नैतिकता, वस्तु और श्रम बाजार की क्षमता, अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी की उपलब्धता, मैक्रो इकोनॉमिक वातावरण, इनोवेशन, कानून और व्यवस्था, कार्पोरेट एकाउंटिबिलिटी के मामले में काफी कमजोर रहा। इसलिए आर्थिक वातावरण के अनुकूलन हेतु सरकार को स्थिरता की ही जरूरत नहीं होगी बल्कि उक्त मोर्चों पर भी आगे बढऩे का साहस जुटाना होगा।