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भजन की ज्योति से संध्या हुई सात्विक

8 वर्ष पहले
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रांची। ‘संगीत, जो नसों में है। मिट्टी में है। यही प्राकृतिक होता है, इसी लोक से ही तो शास्त्रीय संगीत का जन्म हुआ।’ मुक्ताकाश मंच से शनिवार शाम भजन सम्राट अनूप जलोटा प्रकृति की गोद में बसे जिमखाना में रांची से रूबरू हुए। मौका था दैनिक भास्कर की मीडिया साझेदारी में आयोजित आइडिया जलसा का। समय दिन के ढलने के साथ चढ़ती शाम का। जिसे उनके मधुर स्वर में सजे भजनों ने सुरमई बनाया। ‘ऐसी लागी लगन, मीरा हो गई मगन....’ इस पहले भजन की स्वरज्योति ने सर्दी के धुंध को ऐसा लोप किया कि समूचा प्रांगण कृष्णमय हो गया। लोग गुनगुनाने, झूमने लगे, तो उन्होंने चुटिले ढंग में लंबी सांस का राज बाबा रामदेव के प्राणायाम को बताया।

भक्ति का यह ‘कान्हा अंदाज’ सुन हंसी का फव्वारा भी फूटा। पर इस लगन को थोड़ी देर के लिए वह मन्ना डे की स्मृतियों में ले गए। ‘कस्मे वादे प्यार वफा सब बातें हैं, बातों का क्या..’ उनके स्वर में इसे सुनाकर अनूप ने इस नामचीन गायक को भावांजलि दी। उसके बाद तो उनकी भजनगंगा से कई अध्यात्मिक स्वरलहरियां जुगनुओं की तरह झिलमिलाती रहीं। इनमें ‘बोलो, राम-राम’ जैसे ख्यात भजन के अलावा ‘अच्युतम केशवम कृष्णण, दामोदरम राम चंद्रम’ जैसे नए भजन भी इस आत्मिक छांव के कारण बने।

अनूप के साथ गिटार पर धीरेंद्र कुमार, संतूर रोहन कृष्ण, तबला पर प्रदीप घोष ने संगत की। वहीं कोरस मुबई से आई प्रीति सेठ व रांची के सत्यम ने दिया। इस तरह गण पर्व की पूर्व संध्या में शास्त्रीय संगीत के दो उस्तादों ने सुरों का सतरंगंी जादू बिखेरा। संचालक व पंडित जसराज की बेटी ने कहा कि पिता की विरासत में मिले संगीत की पूंजी से आर्ट एंड आर्टिस्ट संस्था के माध्यम से संगीत प्रतिभाओं को प्रोत्साहन दे रही हैं। अब तक 14 शो कर चुकी हैं। पूर्व डीआइजी ईवी कुजूर बतौर मुख्य अतिथि व क्लब अध्यक्ष सुशील लहेरिया विशेष अतिथि थे।


शोले से भजन का गुर

तराना पं. रतन मोहन की ईजाद है। इसमें वह भजन के बीच अपने मुख से ढोल व तबले की ऐसी आवाज निकालते हैं, मानो रेल सुरंग से गुजर रही हो। उन्होंने कहा कि फिल्म शोले के गाने ‘महबूबा-महबूबा’ से इसकी प्रेरणा मिली। यहां आरडी बर्मन ने इसका प्रयोग किया था। पं. शर्मा को हैदराबाद की संस्था ने बादशाह-ए-तराना का खिताब दिया था।

तराना भजन का, झूमी रांची

कार्यक्रम का शुभारंभ मेवाती घराने के उस्ताद पंडित रतन मोहन शर्मा ने गायत्री मंत्र से किया। उसके बाद हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत का समा बांधा। आप पंडित जसराज के शिष्य के साथ उनकी बहन के सुपुत्र भी हैं। उन्होंने राजस्थान में विवाह अवसरों पर गाया जाने वाला लोकगीत ‘बन्ना रे बागा में झूला झाला..’ सुनाकर तालियां बटोरीं ही, वहीं इस ‘बादशाह-ए-तराना’ ने रविशंकर के पखावज और शैलेंद्र मिश्र के तबले पर तराना की खूब जुगलबंदी की। हारमोनियम पर मंदर दीक्षित थे।