साहित्य ने दिखाई नई राह : यादव
भास्कर संवाददाता - रांची
वर्तमान दौर साहित्यिक प्रयोग और परिवर्तन का है। इसी दौर के कारण दलित विमर्श, स्त्री विमर्श और आदिवासी विमर्श जैसे हाशिए के लोगों की पीड़ा सामने आ पाई है। हिंदी साहित्य कभी भक्ति के योग्य था, जब कबीर और रैदास जैसे विद्वतजनों ने अपनी लेखनी से समाज को नई राह दिखाई।
उक्त बातें बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में पीजी हिंदी विभाग के पूर्व एचओडी डॉ. चौथी राम यादव ने कहीं। वे मंगलवार को रांची विवि के हिंदी विभाग की ओर से ‘आधुनिक हिंदी साहित्य में सांप्रतिक प्रयोग और परिवर्तन’ विषय पर केंद्रीय पुस्तकालय सभागार में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में बोल रहे थे।
लखनऊ विश्वविद्यालय के डॉ. सूरज थापा ने कहा कि विमर्शों के इस दौर में हमें सावधानी बरतनी होगी कि ये विभेदकारी नहीं हों। हमें मिलकर मार्ग तलाशना होगा। इससे पहले अतिथियों का स्वागत एचओडी डॉ. वीवीएन पांडेय ने किया। संचालन डॉ. मिथिलेश और धन्यवाद ज्ञापन डॉ. अरुण कुमार ने किया। मौके पर डॉ. श्रवण कुमार गोस्वामी, डॉ. महाराज सिंह, डॉ. मीरा सिंह, डॉ. यशोधरा राठौड़, डॉ. वीणा पाठक, प्रो. प्रीति मुर्मू, प्रो. नुपूर मिंज सहित अन्य मौजूद थे। संगोष्ठी को सफल बनाने में इम्तियाज, अवध, अभिषेक, डॉ. एच कुशवाहा, डॉ. अर्चना कुमारी का योगदान रहा।
साहित्य में प्रयोग का अभाव : वीसी
रांची यूनिवर्सिटी के वीसी डॉ. एलएन भगत ने कहा कि साहित्य में प्रयोग का अभाव दिखता है। इसके बाद भी हमारा साहित्य काफी समृद्ध है। साहित्य को युवा आकांक्षाओं का प्रतिबिंब बनाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि भविष्य में होने वाले राष्ट्रीय सेमिनार का उद्घाटन समारोह आर्यभट्ट ऑडिटोरियम में होगा।
पीजी हिंदी विभाग में ‘आधुनिक हिंदी साहित्य में सांप्रतिक प्रयोग और परिवर्तन’ पर संगोष्ठी शुरू
रांची विवि हिंदी विभाग की ओर से आयोजित संगोष्ठी में बोलते वीसी डॉ. भगत।