• Hindi News
  • Jharkhand
  • Senha
  • प्रवासी पक्षियों का बसेरा बना झील व छड़वा डैम
विज्ञापन

प्रवासी पक्षियों का बसेरा बना झील व छड़वा डैम

Dainik Bhaskar

Dec 13, 2013, 03:00 AM IST

Senha News - मुरारी सिंह -!-हजारीबाग हजारीबाग में शीतकालीन प्रवासी पक्षियों ((माइग्रेटरी बर्ड)) का दल पहुंच गया है। हजारीबाग...

प्रवासी पक्षियों का बसेरा बना झील व छड़वा डैम
  • comment
मुरारी सिंह -!-हजारीबाग
हजारीबाग में शीतकालीन प्रवासी पक्षियों ((माइग्रेटरी बर्ड)) का दल पहुंच गया है। हजारीबाग झील, छड़वा डैम और गोंदा डैम को प्रवासियों ने शीतकालीन बसेरा बनाया है। तिब्बत और लद्दाख क्षेत्र से राजहंस ((बार हेडेड गूज)), लालसर ((रेड हेडेड डक)) और सुर्खाब ((रडी शलडक)), लेसर व्हीसलिंग टील, ग्रेट कॉरमोरेंट यहां पहुंचे हैं। इनके अलावा कॉमन टील को हजारीबाग झील मे आसानी से देखा जा सकता है। इस वर्ष पिछले वर्ष की तुलना में कम पक्षी आए हैं। नवंबर से दिसंबर के महीने में इनका आगमन होता है। पूरा शीतकाल यहां बिताने के फरवरी से मार्च के बीच प्रवासी अपने मूल निवास स्थान में लौटते हैं। दिन भर जलाशय में समय बिताने के बाद पक्षी पास के जंगल की ओर चले जाते हैं। सुबह और शाम फसल कटे हुए खेत में इन्हें धान चुगते हुए भी देखा जा सकता है। जलाशयों में आते-जाते आसमान में देखकर भी इन्हें पहचाना जा सकता है। राजहंस उड़ते समय अंग्रेजी के वी लेटर की अनुकृति बनाते हैं। सबसे आगेवाल पक्षी लीड बर्ड होता है। इनकी खास बात यह है कि पक्षी पिछले साल प्रवास में जहां आए थे, वहां ही जाते हैं। स्थितियां विपरीत नहीं हो पुरानी जगह को ही शीतकालीन प्रवास बनाते हैं।
सैकड़ों पक्षी प्रवास में आते हैं : भारत में हर साल सैंकड़ो प्रवासी पक्षी आते हैं। कुछ पक्षी शीत काल और कुछ ग्रीष्मकाल में आते हैं। शीतकाल में आनेवालों में वृक्षवासी, मैदानी पक्षी, झाडिय़ों में वास करनेवाले पक्षी और जलचर होते हैं। लोग तालाब, झील और डैम में आनेवाले जलचर पक्षियों के बारे में ही जानते हैं। हजारीबाग में शीतकालीन प्रवासियों में हिमालयन ग्रिफॉन वल्चर ((हिमालयी गिद्ध)), श्वेत खंजन ((व्हाईट वेगटेल)), पीला खंजन, क्रेस्टेड लार्क ((बगेरी)), पतसुगिया ((ग्रीन बी ईटर)), किलकिला ((किंगफिशर)), बड़ा पनकौआ ((ग्रेट कॉरमोरेंट)) सहित अन्य पक्षी हजारीबाग पहुंचे हैं। शीतकाल में भारत के एक हिस्से से दूसरे हिस्से मे भी पक्षी प्रवास करते हैं। इन्हें स्थानीय प्रवासी ((लोकल माइग्रेटरी)) कहा जाता है।
खंजन को विनोबा भावे विश्वविद्यालय परिसर में घास का दाना चुगते देखा जा सकता है।
झारखंड नहीं आते साइबेरिया से प्रवासी : जल में बसेरा बनानेवाले प्रवासी पक्षियों को तौर पर लोग साइबेरियन के नाम से जानते हैं। इन्हें साइबेरिया से प्रवास पर आया बताया जाता है। झारखंड में पिछले तीन साल के सर्वे में साइबेरिया से आया एक भी प्रवासी नहीं दिखा है। इंडियन बर्ड कंजर्वेशन नेटवर्क के झारखंड स्टेट कॉ ऑर्डिनेटर सत्य प्रकाश बताते हैं कि साइबेरिया से कोई पक्षी झारखंड नहीं आ रहा है। देश के अन्य बर्ड सेंचुरी में साइबेरिया से आए पक्षी दिखते हैं। आइबीसीएन के बर्ड वाचर साल दिसंबर जनवरी में बर्ड सर्वे करते हैं। साइबेरिया के पक्षी की पुष्टि नहीं हुई है। साइबेरिया से आनेवालों में मुख्य रुप से क्रेन, फ्लेमिंगो हैं। हजारीबाग, चतरा, रांची, बोकारो, धनबाद साहेबगंज में आनेवाले प्रवासी हिमालय, लद्दाख और तिब्बत क्षेत्र से पहुंचते हैं।

X
प्रवासी पक्षियों का बसेरा बना झील व छड़वा डैम
COMMENT
Astrology

Recommended

Click to listen..
विज्ञापन
विज्ञापन