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भतीजी दंग रह गई जब पता चला कि स्कूल बुक में चाचू हैं!

8 वर्ष पहले
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दो हफ्ते पहले विशाल को बैंक ने अवॉर्ड दिया। उन्हें खुशी इस बात कि थी कि फंक्शन में विक्रम का वीडियो दिखाया गया। अपनी टीम को मोटीवेट करते हुए विशाल हमेशा सोल्जर का उदाहरण देते हैं।
विशाल कहते हैं आज वह मेरी पहचान है। मेरी क्या मेरे परिवार, रिश्तेदार यहां तक कि दोस्त और साथ काम करनेवाले भी विक्रम से नाता होने पर गर्व करते हैं। एयरपोर्ट, मॉल जैसी जगहों पर लोग उन्हें देखकर पूछने लगते हैं, आप ये दिल मांगे मोर से रिलेटेड हैं क्या? इस पहचान से सबसे ज्यादा खुशी मिली विशाल की बेटी को। उसकी हिंदी बुक में विक्रम पर पूरा चैप्टर था। मेडम को जब पता चला तो चैप्टर पढ़ाने से पहले उसे हर क्लास में ले कर गई। भांजे पार्थ सेठी ने इसी साल इलाहाबाद में सेना का इंटरव्यू दिया। पार्थ जब वहां पहुंचा तो देखा बिल्डिंग के बाहर उसके मामा का नाम लिखा था। उसने तुरंत फोटो खींचकर भेजी। यहीं 1996 में विक्रम ने इंटरव्यू दिया था।
पिता बीमार रहते हैं, बायपास सर्जरी हो चुकी है। बेटे की उपलब्धियां उन्हें जुबानी याद हैं। कहते हैं जो शहीद होते हैं न, वे एक्स्ट्राऑर्डिनरी ही होते हैं। उन्हें आज भी याद है जब बेटे ने पहली चोटी फतह कर उन्हें फोन किया था। कहते हैं, मेरे बेटे ने 21 हजार फुट ऊंची चोटियों को फतह किया था। उन ऊंची चोटियों को देखने के लिए मुझे इतना पीछे झुकना पड़ेगा की शायद गिर ही जाऊं। आखिरी लड़ाई के समय सूबेदार रघुनाथ विक्रम के साथ थे। उन्हें रोककर विक्रम खुद दुश्मनों के सामने पहुंच गए थे। रघुनाथ का परिवार विक्रम को भगवान मानता है।
आखरी मुलाकात 9 मार्च 1999 को हुई थी। जब वह कमांडो ट्रेनिंग पूरी कर लौटे थे, और अगले दिन ड्यूटी पर जा रहे थे। अपनी जख्मी पीठ विक्रम ने विशाल को दिखाई थी। जब विशाल ने पूछा कि कमांडो में प्रहार फिल्म जैसा होता है क्या, तो बोले उससे हजार गुना ज्यादा होता है।
देशभक्ति की फिल्में देख उन्हें रोना आ जाता है। विक्रम की मौत के दो साल बाद तक वह उसका जिक्र आते ही रो देते थे। 14 मिनट बड़े भाई के सभी फर्ज आज जब उन्हें निभाने पड़ते हैं तो दिल रोता है। ऐसा कोई दिन नहीं जाता जब किसी न किसी तरह घर में विक्रम का जिक्र न हो। पालमपुर के चौक में विक्रम का स्टैच्यू है। जब भी पालमपुर जाना होता है विशाल वहां घंटो अकेले बैठकर विक्रम से बाते करते हैं। उस स्टैच्यू के नीचे पत्थर पर जो लिखा है वह याद हो चुका हैं। लेकिन बार-बार पूरा पढ़ते हैं।



ऑपरेशन ब्लैक टॉर्नेडो पर जाने से पहले संदीप छुट्टी पर गए थे। शहादत से चार महीने पहले वे हम्पी घूमने गए थे।

मशीनगन थामे विक्रम का यह आखिरी फोटो था। अखबारों में छपे इस फोटो को विक्रम ने तो नहीं देखा लेकिन इसका अपने अंतिम पत्र में जिक्र जरूर किया था।

भले ही पापा मैं हूं, लेकिन सिखाता हमेशा संदीप ही था

जैकेट का शेष

इस साल जरूर सजेगा डैरिल का लाया हुआ क्रिसमस ट्री



ये तस्वीर ज्योति के लिए बेहद खास है। डैरिल इसमें सेंटा क्लाज बने दिखाई दे रहे हैं। पिछले साल क्रिसमस के मौके पर। वे आसपड़ौस में घर-घर गए थे। खुद बच्चों को चॉकलेट बांटी थी। यही शख्सियत थी डैरिल की। बच्चों के बीच बच्चों जैसे। दोस्तों में गए तो जमकर हुड़दंग। लेकिन जिम्मेदारियों के प्रति बेहद संजीदा।

उन्नीकृष्णन कहते हैं संदीप का पापा मैं था लेकिन मैंने हमेशा उससे कुछ न कुछ सीखा है। वह मुझे सिखाता था कि किससे कैसे व्यवहार करो। लोगों की मदद करो। लोगों से कैसे बात करो। गेस्ट हाउस में रूको तो वहां का सामान इस्तेमाल मत करना। शेविंग क्रीम और टूथपेस्ट खुद लेकर जाना। आधा फौजी तो उसने मुझे भी बना दिया था। कहते हैं मेरा बेटा कितना स्ट्रांग था ये जानने के लिए उससे हाथ मिलाना जरूरी था।

संदीप की मौत से दो साल पहले उसके एक दोस्त की सड़क हादसे में मौत हो गई थी। मां धनलक्ष्मी ने हफ्ते भर खाना नहीं खाया। संदीप तब मां को डांटने लगा, बोला- कभी मैं चला गया तो आप कितने दिन खाना नहीं खाओगी। संदीप के नाम से उन्नीकृष्णन एक ट्रस्ट चलाते हैं। एक बार गुजरात से एक पूर्व सैनिक पैदल उनके घर बैंगलुरु आया। उसने ट्रस्ट के लिए 105 रुपए दान दिए। उन्नीकृष्णन कहते हैं, वे ट्रस्ट के लिए किसी से दान नहीं लेते। लेकिन जो जज्बा उस पूर्व सैनिक ने दिखाया उसकी कीमत खुद उनके 25 लाख से भी ज्यादा थी। इस ट्रस्ट में हर साल अपनी पेंशन का थोड़ा हिस्सा और संदीप के पैसों का पूरा हिस्सा जोड़ा जाता है। जिससे कैंसर, हार्ट पेशेंट्स की मदद की जाती है। मां आज भी याद करती हैं कैसे संदीप अपनी पूरी पॉकेट मनी गरीबों और जरूरतमंदो को दे देता था।

संदीप चाहता था मां साइकिल चलाना सीखें। इसलिए 59 साल की उम्र में धनलक्ष्मी ने साइकिल चलाना सीखी। कहती हैं, बेटा मां को बहादुर बनाना चाहता था। वह 2009 में उस स्वीमिंगपूल में स्वीमिंग करने पहुंचे जहां संदीप करता था। मां को स्वीमिंग पहले से आती थी। लेकिन सभी जंप करने की उनकी जिद से डर रहे थे। उन्होंने 10 फीट वाली गहराई पर भी जंप किया। बेटे की याद में के उन्नीकृष्णन ने 2010 में इंडिया गेट से गेटवे ऑफ इंडिया तक साइकिल पर गए। पता चला रास्ते पर चलने वाला आम इंसान भी संदीप को जानता है।

संदीप से जुड़ी चीजों को मां ने संभालकर रखा है। फिर चाहे वह बचपन के कपड़े हो या उसकी खिलौने और किताबें। आज भी ऊपर वाला कमरा संदीप का ही है। उसकी कार पापा ने किसी मेडल से कम नहीं सहेजी। ऑपरेशन से पहले वह मानेसर में था। वहां से उसका सारा सामान वह साथ ले आए हैं। उसकी शेविंग रेजर, डियो अभी भी अलमारी में रखे हैं। मां ने बचपन में जो कविताएं सिखाई थी वह उसी की आवाज में एक कैसेट में सहेजी हैं। आज भी उन्हें सुनती हैं। संदीप नहीं होता, डांस करने के लिए।



पिछले साल डैरिल खुद के बराबर ऊंचाई वाला क्रिसमस ट्री खरीद लाए थे। तय किया था कि इस बार क्रिसमस पर इसे खूब सजाएंगे। पत्नी ज्योति ने इस क्रिसमस पर अपना दर्द छुपाते हुए बच्चों को क्रिसमस मनाने अपने माता-पिता के पास मैंगलोर भेज दिया था। उस क्रिसमस ट्री को संभालकर रख दिया है। अगली बार सजाएंगे। पिछली क्रिसमस पर डैरिल सांता क्लाज वाली ड्रेस खरीदकर लाए थे। फिर उसे पहनकर पूरी बिल्डिंग के बच्चों को गिफ्ट और चॉकलेट बांटी थी। और कहा था कि अब वे ऐसा हर साल करेंगे।

एअरफोर्स की न्यू इयर पार्टी पर पूरे यूनिट में डैरिल और ज्योति सबसे ज्यादा डांस करते थे। 2013 का वेलकम रात 3 बजे तक डांस कर किया था दोनों ने। दोस्त उन्हें कैस्टो बुलाते थे। ज्योति याद करती हैं कि जब डैरिल फेसबुक पर प्रोफाइल बना रहे थे, तो मैंने नाम सुझाया था दयावान। ज्योति कहती हैं, उत्तराखण्ड जाते समय वे मजाक में कहकर गए थे कि देशसेवा के लिए जा रहा हूं। हेलिकॉप्टर का मलबा मिला तो सबसे पहले डैरिल के शव की पहचान हो पाई। उसके गले की चेन से। चेन का वह टुकड़ा ज्योति हमेशा साथ रखती हैं।

डैरिल से ज्योति की शादी को दस साल हुए थे। बताती हैं, हम दोनों दसवीं क्लास तक एक ही स्कूल में पढ़े। लेकिन ये हमें शादी के बाद पता चला। जहां भी पोस्टिंग होती मैं उनके साथ ही जाती थी। दोनों बच्चों को आज भी याद है कि पापा के हेलिकॉप्टर क्रैश की बात उन्हें अपने दोस्त अथर्व और उष्मा के घर पर न्यूज देखकर पता चली थी। अथर्व और उष्मा उनके पापा के कमांडिंग ऑफिसर के बच्चे हैं। ईथन कहता है न्यूज देखकर उसे थोड़ा रोना आया था। अगली सुबह मम्मी पैकिंग करने लगीं। कहने लगी हमें मुंबई जाना है। मैंने पूछा भी हम बैरकपुर वापस आएंगे ना? तो मम्मी ने हां, बोला। लेकिन वो झूठ बोल रहीं थी। हम तो यहीं मुंबई में रह गए। मुंबई आकर ईथन ने नानी से पूछा था। सब क्यों कहते हैं कि मेरे पापा अमर हो गए? एंजेलिना ने अब सब्जियां खाना बिल्कुल बंद कर दिया है। पहले पापा डंडा लेकर बैठते थे और उसे सब्जियां खिलाते थे। अब जब मम्मी जिद करती हैं तो वह साफ मना कर देती है। उसे तो पापा की सबसे ज्यादा याद तब आती है जब घर की डोरबेल बजती है। जब पापा घर आते थे तो वह दोनों दरवाजा खोलने के लिए लड़ते थे।



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