विकलांगों को कमजोर ना समझें : मीरा
भास्कर न्यूज - पटना
राजधानी के 20 गंगा घाट दो साल में स्वच्छ-सुंदर बनेंगे। लेकिन तब तक यहां गंगा बचेगी, यह कहना मुश्किल है। अभी जिन घाटों का सौंदर्यीकरण होना है, उनमें छह घाटों से गंगा दूर जा चुकी हैं। जिस तरह से गंगा लगातार उत्तर की ओर खिसक रही हैं, उससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि आने वाले दो वर्षों में बाकी घाटों से भी दूर चली जाएंगी। गंगा के सौंदर्यीकरण के लिए अभी तक जो योजना तैयार है, उनमें इसके करीब लाने की कोई विस्तृत योजना नहीं है। ऐसे में सौंदर्यीकरण होते-होते सुंदर घाट तो होंगे, पर गंगा उनके करीब नहीं रह जाएगी। कलेक्ट्रेट घाट पर तो हाल में नये प्लेटफॉर्म व सीढिय़ों का निर्माण कराया गया है, लेकिन गंगा की धारा दूर चले जाने के कारण ये अब किसी काम के नहीं बच गये हैं। वर्तमान में इन घाटों पर कूड़े कचरे का अंबार लगा रहता है। कई घाटों के किनारे मृत पशु भी फेंक दिए जाते हैं।
क्या है योजना
कलेक्ट्रेट से नौजर घाट के बीच स्थित 20 घाटों पर पार्क, फुटपाथ व नये भवन का निर्माण कराया जायेगा। 24 महीने में ये कार्य पूरे कर लिये जाने हैं । इनके विकास पर करीब 221 करोड़ रुपये खर्च करने की योजना है। योजना का डीपीआर सेन एंड लाल कंसल्टेंट द्वारा तैयार किया गया है। अब घाटों के निर्माण व सौंदर्यीकरण के लिए एजेंसी चयन की प्रक्रिया शुरू की गयी है। सौंदर्यीकरण के तहत कलेक्ट्रेट एवं भद्र घाट पर सोशियो कल्चर सेंटर का निर्माण कराया जाना है। इसके अलावा इन घाटों को सुंदर बना यहां फल-फूल के सुंदर पौधे, लोगों के बैठने के लिये सीमेंटेड टेबल और केंटीन बनाने की भी योजना है।
कलेक्ट्रेट से गायघाट तक वाकिंग फुटपाथ का निर्माण
विभाग द्वारा कलेक्ट्रेट से गाय घाट तक वाकिंग फुटपाथ के निर्माण भी योजना बनायी गई है। इस फुटपाथ के निर्माण होने से लोग सुबह-शाम यहां टहल सकेंगे। इस पर वाहनों के परिचालन की अनुमति नहीं होगी। इस फुटपाथ की चौड़ाई छह मीटर के करीब होगी. पहले चरण में कलेक्ट्रेट से गांधी घाट तक और दूसरे चरण में गांधी घाट से नौजर तक फुटपाथ के निर्माण की योजना है। इसकी कुल लंबाई 6.6 किमी है।
पहले गंगा पास आये, तब हो सौंदर्यीकरण
गंगा पर काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता गुड्डू बाबा का कहना है कि पहले गंगा को घाटों के पास लाने की जरूरत है। हर वर्ष उत्तर की ओर खिसकती जा रही है। इस पर किसी का ध्यान नहीं है। गंगा घाटों का सौंदर्यीकरण का तब तक कोई मतलब नहीं है, जब तक कि वह शहर के करीब नहीं आ जाए। 2003 में गंगा को शहर के करीब लाने के लिए एक योजना बनी थी, जिसमें गंगा में भरे गाद को साफ करना था। 20 फीट गहराई व 100 फीट चौड़ाई तक गंगा की सफाई की जानी थी। 22 जून 2003 को इस पर काम भी शुरू हुआ, लेकिन 13 जुलाई को बाढ़ आने के बाद बंद कर दिया गया। इसके बाद कोई प्रयास नहीं हुए। हरिद्वार में भी गंगा शहर से दूर जा रही थी, लेकिन सरकार के पहल के बाद उस पर काम शुरू हुआ और काफी हद तक स्थिति सुधरी।
ये घाट जिनका सौंदर्यीकरण होना है
गंगा से दूर जा चुके घाट : कलेक्ट्रेट घाट, अंटा घाट, बीएन कॉलेज घाट,अदालत घाट, मिश्री घाट
गंगा के करीब घाट : टीएन बनर्जी घाट, भरवा घाट, रानी घाट, घाघा घाट, रौशन घाट, चौधरी टोला घाट, पथरी घाट, आलमगंज घाट, नौरवा घाट, हनुमान घाट, राजा घाट, गाय घाट, भद्र घाट, महावीर घाट, नौजर घाट
शव बहाने के कारण दूषित हो रहा पानी
बीएन कॉलेज((पटना विश्वविद्यालय)) के प्रोफेसर रणवीर नंदन के शोध के अनुसार पटना के गंगा जल में आक्सीजन की घुलित न्यूनतम मात्रा 5 मिलीग्राम प्रतिलीटर ही रह गई है। जो जलीय पर्यावरण के लिए गंभीर चेतावनी है। प्रो.नंदन कहते हैं कि गंगा जल में प्रदूषण बहुत तेजी से बढ़ा है। इसमें मृत पशुओं का शव बहाया जाना सबसे महत्वपूर्ण कारक है।
न्यायालय की फटकार
गंगा में मृत शवों को डालने पर पटना उच्च न्यायालय ने पटना नगर निगम और बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण पर्षद को फटकार भी लगाया है। न्यायालय ने समाजसेवी विकास चन्द्र उर्फ गुड्डू बाबा की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए निगम को पशुओं के अंतिम संस्कार के लिए शहर से दूर जमीन चिन्हित करने और आधारभूत संचरना विकसित करने का निर्देश दिया है। वर्ष 2010 में दिए गए अपने निर्देश में न्यायालय ने साफ शब्दों में कहा था कि गंगा तट पर या गंगा नदी में मृत पशुओं को बहाने की किसी को इजाजत नहीं है। लेकिन निर्देश के तीन साल बाद भी निगम जमीन चिन्हित करने में असफल रहा।
प्रतिदिन 350 मिलियन लीटर प्रदूषित जल बहाया जा रहा
गंगा में 350 मिलियन लीटर प्रतिदिन((एमएलडी)) प्रदूषित जल बहाया जा रहा है। केवल पटना शहर में गंगा नदी में बीस नालों का पानी गिर रहा है। इससे गंगा जल का प्रदूषण जलीय जीवों और गंगा के किनारे रहने वाले लोगों के लिए काफी खतरनाक स्तर तक पहुंच गया है। गंगा के प्रदूषण में 74 फीसदी सीवरेज, 20 फीसदी इंडस्ट्रियल वेस्ट की हिस्सेदारी है। डॉल्फिन मैन प्रो.आर के सिन्हा कहते हैं कि घाटों की सुंदरता से अधिक महत्वपूर्ण गंगा की अविरलता और शुद्धता को बनाए रखना है। गंगा में गंदे पानी, ठोस कचरा और मृत जानवरों को बहाने पर पाबंदी लगानी होगी। प्रवाह की कमी के कारण गंदगी की समस्या ज्यादा उभर गई है। प्रो सिन्हा ने कहा कि बालू और ईंट भट्ठा के कारण राजधानी से गंगा नदी रूठ गई है। दीघा के पास बन रहे पुल के कारण गंगा की धार को अवरूद्ध किया गया। इसके अलावा सोन नदी मुहाने पर बालू के अंधाधुंध व्यवसायिक दोहन ने भी राजधानी से गंगा की धार को दूर धकेलने का काम किया है। उन्होंने कहा कि अगर सचमुच गंगा को राजधानी के नजदीक लौटाना है तो ईंट भट्ठा को गंगा नदी से दूर करना होगा। उन्होंने कहा कि गंगा में लाखों टन सॉलिड वेस्ट फेंका जा रहा है। इसपर कड़ाई से रोक लगाना चाहिए।
गंगा का संकेत
प्रोफेसर सिन्हा ने कहा कि गंगा को जबरन राजधानी तट पर नहीं लाया जा सकता है। गंगा नदी की गाद उड़ाही संभव नहीं है। लगभग दस-बारह साल पहले असफल प्रयोग किया जा चुका है। गंगा के मार्ग का अवरोध हटाकर ही इसे वापस ला सकते हैं। इस वर्ष गंगा नदी एक बार फिर पटना की तरफ लगभग डेढ़ किलोमीटर मुड़ी है। अगर दीघा पुल का निर्माण कार्य समाप्त हो जाए तो संभव है गंगा, पटना लौट आए।
पटना पहुंचते-पहुंचते हो जाता है 400 से 15 सौ क्यूसेक पानी
गंगा स्वच्छता आंदोलन से जुड़े गुड्डू बाबा कहते हैं कि राजधानी तक पहुंचते-पहुंचते गंगा गायब हो जाती हैं। उन्होंने कहा कि राज्य में प्रवेश((बक्सर)) करते समय गंगा नदी में 400 क्यूसेक पानी होती है। जबकि राज्य से बाहर((पीरपैंती))निकलते समय गंगा में 1500 क्यूसेक पानी होता है। यह 1100 क्यूसेक प्रदूषित जल ही है।
पायलट चैनल योजना
उन्होंने कहा कि गंगा को राजधानी के किनारे लाने के लिए 22 जून 2003 को पायलट चैनल योजना तत्कालीन सीएम राबड़ी देवी ने शुरू की थी। इस योजना के तहत गंगा घाटों के किनारे सौ फीट चौड़ी और बीस फीट गहरी एक चैनल की खुदाई करनी थी। लेकिन इस योजना की शुरूआत बरसात के ठीक पहले की गई थी। गंगा नदी में पानी बढऩे के बाद यह योजना असफल घोषित कर दी गई। जबकि अगर यह योजना पानी उतरने के बाद शुरू की गई होती तो गंगा तट से दूर ही नहीं जाती। इस योजना का निर्माण तत्कालीन अभियंता प्रमुख भगवान दास ने किया था।