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कश्मीर पर मीडिया के लिए संयम बरतना जरूरी

8 वर्ष पहले
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भोपाल. जम्मू कश्मीर मीडिया में तभी दिखाई पड़ता है जब वहां गोलीबारी, बर्फबारी, प्रदर्शन या हिंसा की घटनाएं होती हैं। वहां के संबंध में आ रही नकारात्मक खबरों के कारण नई पीढ़ी के मन में यह विचार पनपने लगा है कि देश के जिस हिस्से में इतनी समस्याएं हैं उसे देश से अलग कर देने में कोई दिक्कत नहीं है। मीडिया को जम्मू कश्मीर से जुड़ी खबरों पर तर्कपूर्ण, तथ्यपरक एवं सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए, ताकि इस मुद्दे पर सही जनचेतना विकसित हो। यह विचार शनिवार को मप्र काउंसिल ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी ((मेपकास्ट)) में ‘जम्मू कश्मीर की वास्तविकता एवं प्रतिमाएं- मीडिया की भूमिका’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय संगोष्ठी के दूसरे दिन वरिष्ठ पत्रकार एवं इंडियन मीडिया सेंटर, नई दिल्ली के निदेशक केजी सुरेश ने व्यक्त किए। संगोष्ठी माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विवि, जम्मू कश्मीर अध्ययन केन्द्र, नई दिल्ली तथा इंडियन मीडिया सेंटर, नई दिल्ली द्वारा आयोजित की गई थी।

की गई के दूसरे दिन जम्मू- कश्मीर अध्ययन केंद्र, नई दिल्ली के सचिव आशुतोष भटनागर ने बताया कि बिना युद्ध के लद्दाख हिस्से की हजारों वर्गमीटर की जमीन चीन के हिस्से में जा चुकी है। लद्दाख क्षेत्र के सीमांत इलाके के लोग भारतीय सरकार की उपेक्षा का व्यवहार झेल रहे हैं, जिसका चीन फायदा उठा रहा है। जम्मू कश्मीर से आए काशीनाथ पंडित ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जम्मू कश्मीर की गलत तस्वीर पेश कर इस्लामिक संगठन इस राज्य को भारत से अलग करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। यह चिंता का विषय है। अटल बिहारी हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. मोहनलाल छीपा ने कहा कि जम्मू- कश्मीर के समस्या के समाधान की दिशा में कार्य कर रहे विभिन्न संगठनों को एक बहुआयामी व्यूह रचना बनानी होगी। वक्ता केएल भाटिया एवं संत कुमार शर्मा ने जम्मू -कश्मीर में अनुच्छेद 370 के विभिन्न पक्षों पर प्रकाश डाला। एमपी हाईकोर्ट के एडवोकेट पुष्पेंद्र कौरव ने कहा कि इस अनुच्छेद के कारण उस राज्य के नीति निर्माण में आम लोगों की भावनाओं को शामिल नहीं किया जा रहा है। आलोक बंसल ने जम्मू -कश्मीर मुद्दे को सुरक्षा परिदृश्य एवं वैश्विक चुनौतियों से जोड़ते हुए अपने विचार रखे। वरिष्ठ पत्रकार राजेन्द्र शर्मा ने इस मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप एवं मीडिया की भूमिका विषय पर अपने विचार रखे। संगोष्ठी में जम्मू -कश्मीर अध्ययन केन्द्र के विभिन्न राज्यों से आए पदाधिकारी एवं इंडियन मीडिया सेंटर, नई दिल्ली के सदस्य तथा माखन लाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के प्रोफेसर तथा विद्यार्थी शामिल थे।